लेखक की कलम से: निजीकरण समय की मांग,इसका विरोध गैर-जरूरी
लेखक की कलम से: निजीकरण समय की मांग,इसका विरोध गैर-जरूरी




                             लेखक:  संजय सक्सेना,लखनऊ


हमारे देश का यह दुर्भाग्य है कि यहां हर मुद्दे पर सियासत शुरू हो जाती है। सरकार काम करे तो मुश्किल, न करे तो परेशानी। सरकार जनहित में चाहें जितना अच्छा फैसला ले, कुछ कथित बुद्धिजीवी और विपक्ष हो-हल्ला मचाने और जनता को भड़काने लगते है। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि हमारे तमाम नेतागण और राजनैतिक पार्टियां सत्ता में रहते जिस विचारधारा और कार्यशैली के पक्ष में मजबूत तर्को के साथ खड़े नजर आते हैं, विपक्ष में जाते ही वह उसी विचारधारा और कार्यशैली की आलोचना शुरू कर देते हैं। याद कीजिए किस तरह से मनमोहन सरकार देशहित का हवाला देकर जीएसटी, राफेल विमान खरीद, विदेशी पूंजी निवेश को बढ़ावा देने, नागरिकता संशोधन बिल,  जैसे तमाम कानून को लागू कराने के पक्ष में खड़ी रहती थी।(यह और बात थी कि उसकी इच्छा पूरी नहीं हुई।)लेकिन जब इन्ही प्रावधानों को मोदी सरकार ने कानूनी रूप दे दिया तो कांगे्रसी छाती पीटने लगे। कांगे्रस हो या अन्य कोई दल अथवा व्यक्ति विशेष इस तरह का दोहरा चरित्र लेकर किसी को नहीं चलना चाहिए,लेकिन सच्चाई यही है कि आज के युग में इंसान अपना फायदा पहले सोचता है। हमारे नेता भी इसी सोच का हिस्सा हैं।

      खैर, इससे इत्तर देखा जाए तो हमारे राज नेताओं और सियासी दलों की मौकापरस्त सियासत और दोहरे चरित्र के चलते से देश और समाज का कोई भला न हो,लेकिन नेता और दल अपना भला तो कर ही लेते हैं। अयोध्या प्रकरण इसका सबसे बड़ा उदाहरण है,जिसके बल पर भाजपा ने दो से 300 सांसदों तक का आंकड़ा पार लिया। कौन भूल सकता है कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर बोफोर्स दलाली का आरोप लगाकर विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रधानमंत्री तक की कुर्सी हासिल कर ली थी। बाद में राजीव गांधी बेदाग साबित हो गए थे। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव,राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव, बसपा की मायावती भी ऐसे ही नेता थे, जिन्होंने दलित,मुस्लिम और पिछड़ो की सियासत के सहारे वर्षो तक सत्ता का स्वाद चखा।


   देश से बड़ा दल वाली नेताओं की घटिया सोच के चलते आजादी से आजतक देश कई तरह की अनचाही समस्याओं और संकट से जूझ रहा है। इसी दोहरे राजनीतिक चरित्र के चलते ही तमाम सरकारें चाहते हुए भी देश-समाज में सुधार के लिए जरूरी कदम उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाती हैं। परिणाम स्वरूप आजादी के बाद दशकों तक अयोध्या विवाद नहीं सुलझ पाता है। सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था भी ऐसा ही मसला है, जिसे चाहते हुए भी कभी कोई सरकार खत्म या इसमें सुधार नहीं कर पाई है। कौन भूल सकता है कि एक वृद्ध मुस्लिम महिला शाहबानों को 40-50 रूपए का गुजरा भत्ता देने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को तत्कालीन राजीव गांधी की सरकार ने संसद से कानून बनाकर पलट दिया था,ताकि मुसलमान वोटर उससे नाराज न हो जाए। मोदी सरकार द्वारा लाए गए ‘नागरिकता संशोधन कानून’ को भी इसी कड़ी में जोड़कर देखा जा सकता है,जिसका गैर-जरूरी विरोध किया जा रहा है। 

     हद तो तब हो जाती है जब सियासतदारों को देश के मान-सम्मान की भी चिंता नहीं रहती है। अपनी सियासी गोटियां सेंकने के लिए हमारे तमाम नेता पाकिस्तान और चीन के सुर से सुर मिलाने में भी शर्मिंदगी महसूस नहीं करते हैं। ऐसी ही सियासत तब भी देखने को मिलती है जब कोई सरकार आर्थिक सुधारों के लिए कोई ठोस कदम उठाती अथवा भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए कोई नया कानून बनाती है। ऐसा ही एक मसला देश को सरकारीकरण से निकल कर निजीकरण की ओर ले जाना, ताकि सरकार रेल गाड़िया, बसें, फैक्ट्रियां चलाने के जंजाल से निकल कर देश की सीमाओं पर ज्यादा घ्यान दें। सरकार का काम माॅनीटरिंग का होना चाहिए न की बिजनेसमैन की तरह वह धंधा-पानी संभालती रहे। आवश्यक से अधिक सरकारीकरण कभी फायदेमंद नहीं रहता है। देश का अनुभव तो यही है कि सरकारीकरण से विकास की गति कम होती तो भ्रष्टाचार बढ़ता है, जिस देश में आधे घंटे में आपके घर पिज्जा पहुंच जाता हो,वहां आपकी इमरजेंसी एम्बुलेंस पहुंचने में दो घंटे लगा दे तो सरकार सिस्टम क्षमता पर सवाल तो उठेगें ही। विपक्ष को गैर-जरूरी तौर पर निजीकरण की राह में  रोड़ा नहीं बनना चाहिए,लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं रहा है।

    दरअसल, जब से देश मेें मोदी और राज्यों में बीजेपी सरकारें आई है, तब से कई सरकारी सेवाओं के निजीकरण की मुहिम सी चल गई है। ऐसा नहीं है कि मोदी से पहले की सरकारें नहीं चाहती थीं कि देश में रेलवे, दूरसंचार, पेट्रोलियम,विमानन सेवाओं जैसी तमाम सेवाओं का निजीकरण हो,लेकिन इसके लिए तमाम सरकारें हिम्मत नहीं जुटा पाईं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भी निजीकरण ने थोड़ा-बहुत जोर पकड़ा था,लेकिन उनकी सरकार ही चली गई।मोदी के साथ ऐसा नहीं है। वह फैसला लेते समय नफा-नुकसान के बारे में नहीं सोचते हैं। यह उनकी सफलता का मूल मंत्र भी हो सकता है। मोदी आत्मविश्वास से लबालब रहते हैं इसी लिए तो 1969 में देश में इंदिरा गांधी सरकार ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था, लेकिन अब मोदी सरकार एक बार फिर से 51 साल बाद पुराने दौर में लौटने की तैयारी में है। केंद्र सरकार ने भारत पेट्रोलियम, शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, कंटेनर काॅर्पोरेशन, नाॅर्थ ईस्टर्न इलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड व टीएचडीसी इंडिया के शेयर बेचने की अनुमति दे दी है। विनिवेश के लिए सरकार ने डिपार्टमेंट ऑफ इंनवेस्टमेंट एंड पब्लिक असेट मैनेजमेंट (दीपम) बनाया है। एक और बात, मोदी सरकार सिर्फ घाटे में चल रही कंपनियों में विनिवेश नहीं कर रही। शुरुआती जिन पांच कंपनियों-बीपीसीएल, कॉनकोर, सीएसआई, नीपको और टीएचडीसी को विनिवेश के लिए चुना गया है, इनमें से तीन लाभ में चल रही हैं।  

    हो सकता है, मौजूदा दौर सरकारी उपक्रमों का सबसे बड़ा निजीकरण करने के लिए हमेशा याद रखा जाए। मोदी सरकार ने ही अपने पिछले कार्यकाल में देश की पहली प्राइवेट ट्रेन तेजस को हरी झंडी दिखाने के बाद  50 रेलवे स्टेशनों और 150 ट्रेनों के निजीकरण की प्रक्रिया शुरू कर दी है। मोदी सरकार के इस कदम का कई कर्मचारी संगठन विरोध भी कर रहे हैं। देश में कई अलग-अलग स्थानों पर धरने-प्रदर्शन आयोजित कर विरोध किया गया,लेकिन न मोदी झुके न टूटे।

    मोदी की तर्ज पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी कुछ ऐसा ही कर रहे हैं जिससे सरकारी भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सके। इसी लिए योगी सरकार के हुक्मरानों ने 30 साल की सेवा पूरी करने वाले कर्मचारियों को बैक टू पैवेलियन भेजने के लिए मंथन शुरू कर दिया है, जिससे सरकारी कार्यालयों में मानों सांफ सूंघ गया हो। बिजली, पानी शिक्षा व चिकित्सा सभी विभागों में कर्मचारियों डर के मारे पसीना-पसीना हैं। अभी उक्त मामला ठंडा भी नहीं हुआ था कि एक और चर्चा छिड़ गई है कि योगी सरकार एक नया कानून ला रही है जिसके तहत उत्तर प्रदेश में नई नौकरी पाने वालों की पहले पांच वर्ष के लिए संविदा पर तैनाती होगी। इन पांच वर्ष के दौरान भी हर वर्ष में छह-छह महीने में उनका मूल्यांकन होगा। उसमें भी हर बार 60 प्रतिशत अंक लाना यानी फर्स्ट डिवीजन में पास होगा बेहद जरूरी होगा। प्रदेश सरकार की अब प्रस्तावित नई व्यवस्था के तहत पांच वर्ष बाद ही मौलिक नियुक्ति की जाएगी। तय फार्मूले पर इनका छमाही मूल्यांकन होगा। इसमें भी प्रति वर्ष 60 प्रतिशत से कम अंक पाने वाले सेवा से बाहर होते रहेंगे। इसके तहत समूह ‘ख’ व ‘ग’ की भर्तियों में चयन के बाद पांच वर्ष तक संविदा कर्मचारी के तौर पर काम करना होगा। इस दौरान कर्मचारियों को नियमित सेवकों की तरह मिलने वाले अनुमन्य सेवा संबंधी लाभ नहीं मिलेंगे। प्रदेश में सरकारी नौकरी को लेकर नियुक्ति-कार्मिक विभाग इस प्रस्ताव को जल्द कैबिनेट के समक्ष लाने की तैयारी कर रहा है। हर विभाग से सुझाव मांगे जा रहे हैं। सभी विभागों से सुझाव लेने के बाद इसे कैबिनेट में लाया जा सकता है। इसके पीछे का तर्क यह है कि इस व्यवस्था से कर्मचारियों की दक्षता बढ़ेगी। इसके साथ ही नैतिकता देशभक्ति और कर्तव्यपरायणता के मूल्यों का विकास होगा। इतना ही नहीं सरकार पर वेतन का खर्च भी कम होगा।

  बहरहाल, योगी सरकार की मंशा सामने आते ही समाजवादी पार्टी, बसपा और कांगे्रस के नेताओं ने अपनी ‘तलवारें’ बाहर निकाल ली हैं। यह ऐसा मसला है जिसके सहारे तमाम राजनैतिक दल युवाओं को अपने पाले में खींच सकते हैं बेरोजगार के विषय को लगातार उठा रहे विपक्ष ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लपका है। योगी सरकार के इस प्रस्ताव को युवा विरोधी करार देते हुए सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने 2022 में सबक सिखाने की चेतावनी दे डाली है तो कांग्रेस महासचिव व उत्तर प्रदेश प्रभारी प्रियंका वाड्रा ने दो टूक कहा है कि युवाओं का आत्मसम्मान नहीं छीनने देंगे।  कांग्रेस महासचिव प्रियंका ने ट्वीट किया कि युवा नौकरी की मांग करते हैं और यूपी सरकार भर्तियों को पांच साल के लिए संविदा पर रखने का प्रस्ताव ला देती है। ये जले पर नमक छिड़ककर युवाओं को चुनौती दी जा रही है। गुजरात में यही फिक्स पे सिस्टम है। वर्षों सैलरी नहीं बढ़ती, परमानेंट नहीं करते। युवाओं का आत्मसम्मान नहीं छीनने देंगे। वहीं, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने बयान जारी कर कहा कि देश और प्रदेश में भयंकर रूप से बढ़ती बेरोजगारी और लगातार गिरती अर्थव्यवस्था से युवाओं का भविष्य खतरे में है। ऐसे समय में प्रदेश की योगी सरकार का नई नियुक्तियों को पहले पांच वर्ष संविदा पर रखे जाने का प्रस्ताव लाया जाना छात्र-छात्राओं और युवाओं के साथ ऐतिहासिक अन्याय जैसा कृत्य है। हालांकि राज्य के मुख्य सचिव आरके तिवारी ने स्पष्ट किया है कि सरकार के स्तर पर सतत सुधारात्मक विचार चलते रहते हैं। सरकारी नौकरी में संविदा को लेकर भी अभी कोई निर्णय नहीं हुआ है। जब भी निर्णय किया जाएगा, वह जनहित, युवाओं का हित और प्रदेश का हित देखते हुए किया जाएगा।

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