लेखक की कलम से : जम्मू-कश्मीर में नजरबंदी के बाद राजनीतिक सक्रियता  
सियाराम पांडेय शांत


जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी ताकतें सक्रिय हो गई हैं। उन्हें चीन और पाकिस्तान से बढ़ावा मिल रहा है। नेशनल कांफ्रेंस के नेता फारुक अब्दुल्ला के बयान कमोबेश यही संकेत देते हैं। हाल ही में उन्होंने दावा किया कि जम्मू-कश्मीर में धारा 370 और 35-ए की बहाली अब चीन कराएगा। पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट की नेता महबूबा मुफ्ती सईद ने भी कहा है कि जबतक जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद -370 और 35 ए की पुनर्बहाली नहीं हो जाती तबतक वे राष्ट्रध्वज तिरंगा को हाथ में नहीं उठाएंगी।

पहले जम्मू-कश्मीर का संविधान था। अनुच्छेद -370 की मजबूरी थी कि वहां दो विधान-दो निशान वजूद में थे। फारूक और महबूबा को बदली व्यवस्था के तहत अब तिरंगा ही फहराना है। जम्मू-कश्मीर के झंडे का औचित्य नहीं रह गया है। 5 अगस्त, 2019 को 370 हटने के साथ ही जम्मू-कश्मीर राज्य का विशेष दर्जा खत्म हो गया और वहां भारतीय संविधान लागू हो गया। महबूबा मुफ्ती और फारूक अब्दुल्ला नजरबंद थे इसलिए वे राज्य के लोगों को भड़का नहीं पाए थे। दोनों अब नजरबंदी से बाहर आ गए हैं इसलिए एकबार फिर उन्होंने गुपकार घोषणा के बहाने जम्मू-कश्मीर की राजनीति को गरमाना आरंभ कर दिया। हालांकि इन नेताओं ने सफाई दी है कि वे भारत विरोधी नहीं हैं।

कश्मीरी हितों की दुहाई देने वाले इन नेताओं को इतना सोचना ही चाहिए कि उन्होंने कश्मीरियों के व्यापक हित में किया क्या है। वे अलगाववादियों और आतंकियों के हाथों की कठपुतली बने रहे। महबूबा मुफ्ती अगर यह कह रही हैं कि कश्मीर में सरकार गिरी तो इसलिए कि हमने पत्थरबाजों की रिहाई करवाई और आतंकियों के शव उनके परिजनों को लौटाए। इसी बात का बदला भाजपा ने कश्मीरियों से लिया। चीन ने पिछले दिनों भारत को चेतावनी दी थी कि अगर वह ताईवान के साथ व्यापारिक समझौता करेगा तो चीन जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी ताकतों को बढ़ावा देगा। जिस तरह जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी ताकतें हाल के दिनों में सक्रिय हुई हैं और वहां के दो प्रमुख राजनीतिक परिवारों के जिस तरह के बयान आ रहे हैं, उससे उनके भारत हितैषी होने का पता तो नहीं ही चलता है।

शिवसेना डोगरा फ्रंट के दर्जनों कार्यकर्ताओं ने पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती के तिरंगे झंडे संबंधी बयान को लेकर उनके खिलाफ रानी पार्क में प्रदर्शन किया। पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ नारेबाजी की और उनकी तस्वीरें जलाईं। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उन्हें पाकिस्तान एवं चीन भेज देना चाहिए क्योंकि भारत में उनकी कोई जगह नहीं है।

जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के आवास पर पीपुल्स अलायंस फॉर डिक्लेरेशन की बैठक और चेयरमैन समेत पदाधिकारियों की नियुक्ति को भी भारत के खिलाफ बगावती और जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद को हवा देने के रूप में देखा जा रहा है। अभीतक यह संगठन बिना किसी पद के चल रहा था। इससे पहले 15 अक्टूबर को फारूक के घर पर बैठक हुई थी जिसमें महबूबा मुफ्ती ने पहली बार भाग लिया गया था। महबूबा के घर हुई बैठक में फारुक का भाग लेना बताता है कि अनुच्छेद 370 के हटने के बाद से जनाधार खो चुकी पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस बौखलाई हुई है। दोनों पार्टियां एकजुट होकर केंद्र और जम्मू-कश्मीर राज्य प्रशासन को जवाब देना चाहती हैं। गौरतलब है कि जम्मू कश्मीर तथा लद्दाख में फिर से विशेष दर्जे की बहाली को लेकर गुपकार घोषणा की गई थी। बाद में इस सर्वदलीय बैठक को पीपुल्स अलायंस फॉर डिक्लेरेशन का नाम दे दिया गया। इस बैनर तले सभी दल एकसाथ मिलकर जम्मू- कश्मीर और लद्दाख में फिर से विशेष दर्जे की बहाली की मांग कर रहे हैं।

14 माह की नजरबंदी से बाहर आने के बाद इन नेताओं ने भाजपा पर संविधान और झंडे को अपवित्र करने का आरोप लगाया है, वहीं भाजपा ने कहा है कि दुनिया की कोई ताकत अब जम्मू-कश्मीर में अलग झंडा नहीं लगा सकती। जम्मू-कश्मीर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र रैना ने कहा है कि जम्मू कश्मीर में महबूबा मुफ्ती कोई झंडा उठाएं या नहीं, कोई फर्क नहीं पड़ता, जम्मू कश्मीर के लोगों के दिलों में तिरंगा झंडा बसा है। उनके मन में भारत माता बसती है। जम्मू-कश्मीर भारत का अटूट अंग था, है और हमेशा रहेगा। अगर महबूबा मुफ्ती को पाकिस्तान से इतना प्यार है तो वह भारत छोड़ जाएं।

फारुक अब्दुल्ला परिवार 8 दशक से जम्मू-कश्मीर की राजनीति कर रहा है। पीडीपी भी 21 साल से वहां राजनीति कर रही है। सवाल यह है कि अगर इन दोनों राजनीतिक परिवारों की संपत्ति में बेतहाशा वृद्धि हो सकती है तो कश्मीरियों के जीवन में वैसी ही सुख-समृद्धि आजतक नजर क्यों नहीं आई? अच्छा होता कि अलगाववादी फांस में फंसने के बजाय ये दोनों परिवार कश्मीरियों के व्यापक हितों के बारे में सोचते।

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