सुप्रीम कोर्ट का 'इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्ट्सी कोड' पर बड़ा फैसला, बरकरार रखी संवैधानिकता
file photo


सुप्रीम कोर्ट ने इंसॉल्वेंसी कोड को बरकरार रखा है. इस फैसले के बाद IBC (इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्ट्सी कोड) की संवैधानिक मान्यता बरकरार रहेगी. सुप्रीम कोर्ट ने IBC को चुनौती देने वाली सभी याचिकाएं रद्द कर दी है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बैंकिंग सचिव का कहना है कि SC का फैसला सकारात्मक है. इस फैसले से क्रेडिट व्यवहार में सुधार आएगा. अब तक IBC के तहत 70,000 करोड़ रुपये की रिकवरी हुई है.आपको बता दें कि आईबीसी का आगाज जून 2017 में हुआ, जब आरबीआई ने बैंकों को निर्देश दिया कि वे 12 बड़े कर्जदारों का मामला नेशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल में ले जाएं. बैंकों के बकाया 8 लाख करोड़ रुपये का करीब 25 प्रतिशत हिस्सा इन 12 कंपनियों पर बाकी था. इनमें से केवल पांच का मामला अब तक सुलझ पाया है.

वेदांता ने इलेक्ट्रोस्टील स्टील्स को खरीदा, एयॉन-जेएसडब्ल्यू स्टील ने मॉनेट इस्पात की बोली जीती, टाटा स्टील ने भूषण स्टील को खरीदा जबकि लैंको इंफ्रा अब कुर्की की राह पर है.

एक्सपर्ट्स कहते हैं कि आईबीसी से कर्जदारों का रवैया बदलने लगा है. पेमेंट से जुड़ा अनुशासन बेहतर हुआ है क्योंकि रेगुलेटर ढिलाई बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है. आईबीसी लागू हो जाने और गड़बड़ी करने पर कंपनी पर ओनर्स का कंट्रोल खत्म हो सकने की स्थिति के कारण बर्ताव बदल रहा है. यह अच्छी बात है. प्रक्रिया में देर हो रही है, लेकिन बॉरोअर अब यह मानकर नहीं चल सकता कि क्रेडिटर उसका कुछ भी नहीं कर पाएंगे.

क्या होता है इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्ट्सी कोड - इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्ट्सी कोड के तहत अगर कोई कंपनी कर्ज नहीं देती है तो उससे कर्ज वसूलने के लिए दो तरीके हैं. एक या तो कंपनी को दिवालिया घोषित कर दिया जाए. इसके लिए एनसीएलटी की विशेष टीम कंपनी से बात करती है. कंपनी के मैनेजमेंट के राजी होने पर कंपनी को दिवालिया घोषित कर दिया जाता है और उसकी पूरी संपत्ति पर बैंक का कब्जा हो जाता है. बैंक उस असेट को किसी अन्य कंपनी को बेचकर कर्ज के पैसे वसूलता है. बेशक यह राशि कर्ज की राशि से कम होता है, मगर बैंक का पूरा कर्जा डूबता नहीं है.

कर्ज वापसी का दूसरा तरीका है कि मामला एनसीएलटी में ले जाया जाए. कंपनी के मैनेजमेंट से कर्ज वापसी पर बातचीत होती है. 180 दिनों के भीतर कोई समाधान निकालना होता है. कंपनी को उसकी जमीन या संपत्ति बेचकर कर्ज चुकाने का विकल्प दिया जाता है. ऐसा न होने पर कंपनी को ही बेचने का फैसला किया जाता है. खास बात यह है कि जब कंपनी को बेचा जाता है तो उसका प्रमोटर या डायरेक्टर बोली नहीं लगा सकता.

अधिक बिज़नेस की खबरें