जिसे बाॅलीवुड ने भुला दिया था, 'वो' अभिनेत्री अपने दम पर हिट करा ले गई फिल्म
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आयुष्मान खुराना की फिल्म ‘बधाई हो’  एक स्लीपर हिट की तरह बॉक्स ऑफिस पर आई और छा गई. स्लीपर हिट क्या होती है आप समझते हैं ? ‘स्लीपर हिट’ यानि वो फिल्म जिसके हिट होने की बहुत उम्मीद नहीं होती, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर वो झंडे गाड़ दे. आयुष्मान की पिछली फिल्म ‘अंधाधुन’ के साथ जो हुआ, उसके बाद ‘बधाई हो’ को लेकर भी लोग खासे उत्साहित नहीं थे. उनकी फिल्म ‘अंधाधुन’ को तारीफ मिली थी, लेकिन दर्शक नहीं और इस फिल्म के बारे में भी लोगों ने ये मान लिया था, हालांकि दूसरी बार अनुमान गलत निकले.

‘बधाई हो’ ने कमाल कर दिया, पांच दिनों में 50 करोड़ पार और वो भी एक ऐसे चेहरे की बदौलत जिन्हें आप ‘स्टार’ नहीं कह सकते.अगर आप आयुष्मान खुराना के बारे में सोच रहे हैं, तो आप का अनुमान ग़लत है. ‘बधाई हो’ का पोस्टर याद कीजिए, इस पोस्टर पर सबसे बड़ा चेहरा किसका है ? आयुष्मान का? नहीं वो चेहरा है नीना गुप्ता का. बॉलीवुड की भीड़ में कहीं खो सी गईं नीना गुप्ता , इस फिल्म में वो फ्रेशनेस लेकर आती हैं जिसकी सख्त ज़रूरत थी.

लंबे समय से मेन स्ट्रीम फिल्मों में मां का किरदार किरण खेर और सीमा पाहवा निभा रहे थे. नीना गुप्ता ने इस मोनोटॉनी को ब्रेक किया है और एक गर्भवती अधेड़ महिला के किरदार में उन्होंने जान डाल दी. सोशल मीडिया पर उनकी तारीफों के पुल बांधे जा रहे हैं और लोग उन्हें बधाई संदेश भेज रहे हैं, लेकिन समय की रफ्तार देखिए, ये वही नीना गुप्ता हैं जिन्हें कुछ वक्त पहले सोशल मीडिया पर लिखना पड़ा था कि उन्हें काम की ज़रुरत है. बॉलीवुड की चमक में उनके अपने ही लोग उन्हें भूल गए थे, पर वो वापसी कर चुकी हैं और एक किस्से से पता चलता है कि ये वापसी उनके लिए कितनी ज़रूरी थी.


एक हफ्ते पुरानी बात है. फिल्म 'बधाई हो' का प्रमोशन चल रहा है. अहम रोल में हैं 59 साल की नीना गुप्ता. इनके नाम को किसी खास इंट्रोडक्शन की जरूरत नहीं है. 'मंडी', 'जाने भी दो यारों' और 'वो छोकरी' जैसी हिंदी फिल्मों में एक्टिंग के लिए अवॉर्ड जीत चुकी हैं. 'खानदान', 'भारत एक खोज', 'मिर्जा गालिब', 'गुमराह' और 'सांस' जैसे टीवी शोज से घर-घर में पहचान पा चुकी हैं. फिर भी फिल्म के प्रमोशन के दौरान नीना ऐसे बात करती हैं जैसे किसी नई एक्ट्रेस की पहली फिल्म रिलीज हो रही हो.

इतने ध्यान से रिपोर्टर्स के सवालों का जवाब देती हैं, जैसे किसी भी तरह से कोई चूक ना हो जाए. उनके जवाब देने के अंदाज से लेकर चेहरे की खुशी तक ये बात छिप नहीं पाती कि ये फिल्म उनके लिए बहुत मायने रखती है. फिल्म से इतर कुछ सवाल पूछे जाने पर वो तुरंत कहती हैं

आप ये सब मत पूछिए...इतने समय बाद मुझे एक अच्छी फिल्म मिली है...ये रिलीज हो रही है...मैं बस इसे लेकर खुश होना चाहती हूं. कुछ और नहीं सोचना चाहती.

यहां कुछ और से क्या मतलब है...इसका पता तब चलता है जब नीना गुप्ता की जिंदगी में गहरे उतरते हैं. शुरुआत होती है दिल्ली से. दिल्ली में पली-बढ़ी नीना गुप्ता सन् 1981 में एक्ट्रेस बनने के लिए मुंबई पहुंचीं. कुछ ही समय बाद उन्हें फिल्मों में काम करने का मौका मिल गया.

सन् 1982 में रमन कौर की फिल्म 'साथ-साथ' से नीना गुप्ता ने हिंदी फिल्मों में डेब्यू किया. इसके बाद अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों में नीना सपोर्टिंग रोल भी करती नजर आईं. रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ में भी नीना गुप्ता को काम करने का मौका मिला. इसके बाद श्याम बेनेगल की ‘मंडी’ (1983) और ‘त्रिकाल’ (1985) में भी नजर आईं. ‘जाने भी दो यारों’ जैसी कमर्शियल फिल्म में भी उन्हें काम करने का मौका मिला.

साल 1994 में आई ‘वो छोकरी’ में विधवा का किरदार निभाने के लिए उन्हें नेशनल फिल्म अवॉर्ड भी दिया गया. लेकिन नीना गुप्ता का फिल्मी करियर उन ऊंचाइयों तक नहीं पहुंच सका. इसके बाद उन्होंने टीवी में हाथ आज़माया और यहां उनकी उड़ान को रोकने वाला कोई नहीं था. खुद नीना ने ये बात अपने कई इंटरव्यू में कही है कि फिल्मों में उन्हें अच्छे रोल नहीं मिले. उस दौर में सिर्फ स्मिता पाटिल और शबाना आजमी को मुख्य भूमिका मिलती थी. हमें सेकेंडरी रोल दिए जाते थे.

नीना गुप्ता और विवियन रिचर्ड्सइस दौरान नीना गुप्ता की प्रोफेशनल लाइफ में पर्सनल रिलेशनशिप्स का एंगल भी जुड़ चुका था. 80 के दशक की ही बात है, जब नीना वेस्ट इंडियन क्रिकेटर विवियन रिचर्ड्स के साथ रिलेशनशिप में थीं. इस रिलेशनशिप के बारे में सबको तब मालूम चला, जब नीना बेबी बंप के साथ नजर आईं और उन्होंने सिंगल मदर बनने का फैसला लिया. बिना शादी के मां बनने की बात उस वक्त इस तरफ फैली कि हर तरफ नीना गुप्ता की आलोचना शुरू हो गई. लेकिन अपने फैसले पर अड़ी नीना ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था-

ये बहुत मुश्किल था और मैं ऐसा करना चाहती थी. फिर भी सबको कहती हूं कि ये एक गलत फैसला था, क्योंकि एक बच्चे को अकेले पालना बहुत मुश्किल होता है. मैं काम करती रही, इसलिए शादी भी नहीं कर सकी. मेरे दोस्तों ने भी मुझसे कहा था कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए. मगर उस वक्त मेरी उम्र बहुत कम थी और मुझे एक नशा था, इसलिए मैं ऐसा कर बैठी. मुश्किल वक्त था, मगर मैंने अपनी तरफ से बेहतर करने की कोशिश की. मैंने खराब फिल्में भी कीं, क्योंकि मुझे उसे पालने के लिए पैसों की जरूरत थी.

ये जरूरत ही हो सकती है, जो नीना गुप्ता 'चोली के पीछे क्या है' जैसे आइटम नंबर पर डांस करती नजर आईं. उनकी इस फिल्म में कोई खास भूमिका नहीं थी, फिर भी उन्होंने ये डांस अपनी पूरी शिद्दत के साथ किया. उनके स्तर के कलाकार अक्सर ऐसे फैसले लेने से बचते हैं, मगर नीना गुप्ता ने फैसले लेने से पहले समाज और नियमों की बजाय अपने दिल और हालातों के हिसाब से सोचा. फिर ‘चोली के पीछे’ भी ऐसे बनकर तैयार हुआ कि सिनेमा की पॉपुलर कल्चर हिस्ट्री का एक अहम हिस्सा बन गया.

इसके बाद नीना गुप्ता का फिल्मी करियर एकदम से खत्म सा हो गया. मगर टेलीविजन की दुनिया ने उन्हें अपनाए रखा. टेलीविजन की दुनिया में नीना ने जो मील के पत्थर तय किए, वो आज भी मिसाल हैं. फिर चाहे वो दूरदर्शन पर आने वाला शो खानदान (1985) हो, श्याम बेनेगल का यात्रा (1986) और भारत एक खोज (1988) हो या फिर गुलजार का मिर्जा गालिब (1987) और डीडी मेट्रो पर आने वाला गुमराह (1995). इन सभी धारावाहिकों ने नीना गुप्ता को वो पहचान दिलाई जो उनके स्तर के कलाकार को बहुत पहले मिलनी चाहिए थी.

सन् 1998 में आए टीवी शो ‘सांस’ ने उन्हें वही स्टारडम दिलवाया जो बॉलीवुड से उन्हें मिलता. इस शो में नीना ने सिर्फ एक्टिंग ही नहीं की थी, उन्होंने ये शो लिखा भी था और डायरेक्ट भी किया था. वो इस बात को मानती भी हैं कि वो जो भी हैं, सिर्फ टीवी की बदौलत हैं, वर्ना बॉलीवुड ने तब भी उन्हें भुला दिया था.

इस सबके बावजूद साल 2017 में एक ऐसी पोस्ट आई, जो किसी को भी चौंकाने के लिए काफी थी. नीना ने इंस्टाग्राम पर लिखा- मैं मुंबई में रहती हूं. एक्टर हूं. काम की तलाश में हूं.

नीना गुप्ता की काम वाली पोस्ट को पढ़कर कई लोगों को झटका लगा. एक सीनियर कलाकार का इस तरह काम मांगना वाकई हैरान भी करने वाला था और शायद फिल्म इंडस्ट्री के लिए शर्मनाक भी. नीना ने इस पोस्ट को लिखने की वजह बताते हुए कहा था-

मैंने ये पोस्ट इसलिए लिखी क्योंकि सभी को ये लगता था कि शादी के बाद मैं दिल्ली शिफ्ट हो गई हूं और अब काम नहीं करती हूं. इस वजह से लोगों ने मुझे काम देने या मेरे बारे में रोल सोचना ही छोड़ दिया. ऐसा बार-बार हो रहा था, इसलिए मैंने ये पोस्ट लिखी.

दरअसल एक वक्त ऐसा था जब नीना सिंगल मदर के तौर पर पूरी तरह बेटी मसाबा की परवरिश में व्यस्त हो गईं. वो उस परवरिश के लिए जरूरी सारे काम करती गईं. नीना ने मसाबा से कभी उसके पापा के बारे में कुछ नहीं छिपाया. मसाबा जानती थीं कि नीना एक सिंगल मदर हैं और विवियन रिचर्ड उनके पापा. मसाबा के साथ नीना की बॉन्डिंग मां से ज्यादा दोस्त जैसी रही. मगर मसाबा बड़ी होने लगीं और नीना की जिंदगी में फिर एक अकेलेपन ने जगह बनानी शुरू कर दी.

साल 2008 में नीना गुप्ता ने चार्टर्ड अकाउंटेंट विवेक मेहरा से शादी कर ली. दोनों काफी साल से अच्छे दोस्त थे और जब विवेक ने नीना को शादी का प्रस्ताव दिया, तो वो मना नहीं कर सकीं. बताया जाता है कि विवेक और नीना की मुलाकात एक फ्लाइट के दौरान हुई थी. विवेक भी अपनी पहली शादी से अलग हो चुके थे.

शादी के बाद नीना ने एक इंटरव्यू में कहा था 'मैं सभी औरतों से ये कहना चाहती हूं कि अगर आप भारत में रहना चाहती हूं, तो आपको शादी जरूर करनी चाहिए.मैंने अपनी बेटी मसाबा से भी यही कहना कि तब अगर किसी से प्यार करती हो, तो तुम उसके साथ तब तक रहना शुरू नहीं करोगी, जब तक कि तुम उससे शादी नहीं करतीं, क्योंकि मैंने अपनी जिंदगी में इस वजह से बहुत कुछ सहा है.'

सिंगल मदर के तौर पर मसाबा की परवरिश और फिर शादी. इस सबके बीच नीना का करियर कहीं खो सा गया. मगर उनके भीतर की अदाकारा वहीं की वहीं अपने लिए एक अदद रोल का इंतजार करती खड़ी रही और मजबूरी में परेशान होकर नीना गुप्ता को इंस्टाग्राम जैसी सोशल मीडिया साइट पर काम मांगना पड़ा. इस पोस्ट का नतीजा ये हुआ कि नीना को बेहतरीन रोल्स मिलने शुरू हो गए. अनुभव सिन्हा की 'मुल्क' और 'बधाई हो' को भी इसी पोस्ट का नतीजा कहा जा सकता है.

इतना ही नहीं अब नीना गुप्ता डिजिटल वर्ल्ड में भी कदम रख चुकी हैं. आप शॉर्ट फिल्म्स के शौकीन हैं, तो जैकी श्रॉफ के साथ उन्हें खुजली में देखिए. बेहतरीन अदाकारी का एक और नमूना नजर आएगा.

हां, बस रह रह कर उन्हें एक टीस उठती है, लोग उनके ‘उस’ कल और उस 'कुछ और' (बिन ब्याहे मां बनना) को याद रखते हैं लेकिन उन्हें भूल गए और यही वजह है कि नीना गुप्ता अब अपनी शर्तों पर काम करती हैं. अब उनकी आने वाली फिल्मों में शामिल हैं विकास खन्ना की 'द लास्ट कलर', अश्वनी अय्यर तिवारी की 'पंगा' और दिबारकर बनर्जी की 'संदीप और पिंकी फरार'.

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