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ख़तने जैसी कुप्रथा पर प्रहार करती प्रज्ञेश की फिल्म शिनाख्त (shinaakht) की कुछ झलकियां आज सूरा वी होटल में दिखाई गयी
सुरुवात के दो मिनट में ही आपको विचलित कर देगी प्रज्ञेश सिंह की ४० मिनट की फिल्म शिनाख्त की कुछ जलकिया होटल सूरा वी में दिखाई गयी


लखनऊ: भारतीय सिनेमा के शुरुवाती दौर में फिल्में समाज का आईना होती थी, जब सत्यजीत रे ने पथेर पांचाली तो महबूब खान जैसे निर्देशकों ने मदर इंडिया जैसी फिल्मो का निर्माण किया | इस लिस्ट में तामस, नीम का पेड़, तीसरी कसम जैसे कुछ फिल्म और नाटकों का नाम भी जुड़ जाता है, जिसने समाज को एक अच्छा सन्देश देने की कोशिश की, ये वो दौर था, जब फिल्मों को ही अच्छा नही माना जाता था | फिल्मों के सार्थक सन्देश ने जहाँ फिल्मों की स्वीकार्यता बढाई, वही फिल्मों के व्यावसायिक युग की सुरुवात भी हुई और बदलते वक़्त के साथ फिल्मे दर्शकों के लिए मनोरंजन तो फिल्मकारों के लिए भारी भरकम आय का साधन बनती चली गयी | नब्बे के दशक में सार्थक फिल्मो का अकाल सा पड गया था, आज का पढ़ा लिखा दर्शक सार्थक और फिल्मों में खोजी विश्व को तबज्जो देता नजर आ रहा है, इस बदलाव ने अच्छे सन्देश या बौद्धिकता के स्तर पर फिल्मों को मौका दिया | ऐसी ही एक हालिया फिल्म है शिनाख्त(Shinaakht) जो खतना की समस्या को बेबाकी से उजागर करती है |


कंपनी सेक्रटरी से फिल्मकार बने लखनऊ के प्रज्ञेश सिंह का ध्यान हमेशा सामाजिक समस्यायों और कुरूतियो पर रहता है | विगत के वर्षो में छोटी सी गुजारिश जैसी २८ मिनट की फिल्म बनाकर चर्चा में रह चुके प्रज्ञेश सिंह ने हाल में खतना जैसी कुप्रथा पर एक फिल्म का निर्माण व् निर्देशन किया | प्रज्ञेश को सामाजिक मुद्दों पर फिल्म निर्माण करना व्यावसायिक स्तर पर भले ही फायदे का सौदा न हो, परन्तु उनकी फिल्म को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हमेशा सराहना मिली | खतने पर आधारित ४० मिनट की अवधि की फिल्म शिनाख्त को अब तक २४ अंतर्राष्ट्रीय फिल्म उत्सव में प्रदर्शित किया जा चूका है | जिसमे से शिनाख्त अभी तक १० से अधिक पुरस्कार अपने नाम कर चुकी है | उत्तर प्रदेश में फिल्म को बढ़ावा देने की नीति का असर प्रदेश के फिल्मकारों को प्रोत्साहित कर रहा है | अमेठी में जन्मे प्रज्ञेश सिंह को २०१८ में कला संस्कृति क्षेत्र में लोकमत सम्मान से सम्मानित किया गया था तो २०१९ में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल श्री राम नाइक के हाथो रंग भारती सम्मान से अलंकृत किया गया|

प्रज्ञेश ने बताया की कम बजट के चलते टीम ने कठिन महेनत की और ४० मिनट की अवधि की फिल्म शिनाख्त का शूट रिकॉर्ड दो दिन से पूरा किया गया, फिल्म में राजू खेर, शिशिर शर्मा, शक्ति सिंह, नवनी परिहार, आरफी लाम्बा, स्टेफी पटेल, मेजर बिक्रमजीत कंवरपाल और कृष्णा भट्ट जैसे नामचीन कलाकारों ने काम किया है, फिल्मिस्तान जैसी राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार फिल्म में काम कर चुके सुभ्रांशु दास ने फिल्म का कैमरा संभाला है | तो धार्मिक कट्टरवाद की अवधारणा को तोड़ते हुए सज्जाद अली चंदवानी ने फिल्म में संगीत दिया है | फिल्म की एडिटिंग हिमांशु रस्तोगी ने की है | फिल्म की लाइन प्रोडूसर कीर्तिका चौहान है। प्रज्ञेश सिंह और प्रणय विक्रम सिंह के सह लेखन के डायलाग फिल्म के विषय को अद्भुत रोचकता प्रदान करते है |


प्रज्ञेश सिंह ने बात करने के दौरान बताया की धार्मिक पहलू से जुड़े संवेदनशील विषयों पर फिल्म बनना एक जोखिम भरा कदम था, परन्तु इमानदारी से अपनी बात कहने की लगन और टीम के सहयोग से सब आसान होता चला गया | प्रज्ञेश सिंह ने बताया की फिल्म को भारतीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से यू श्रेणी में प्रमाणन मिलना मनोबल को बढाने वाला था, यह इस बात को दर्शाता है की हम एक साफ़ सुथरी फिल्म  | खतना नाम कि यह प्रथा अत्यंत क्रूर और अमानवीय ही नहीं वरन उस समाज और देश के कानून और संविधान की भी खिल्ली उड़ाता नजर आता है। बता दें कि महिलाएं और पुरूषों दोनों में खतना किया जाता है।


तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था और देश की बदलती तस्वीर में जहाँ भारत को विश्व की अर्थ व्यवस्था में अग्रणी होने का खवाब देख रही है भारत में महिलाओं का खतना बोहरा मुस्लिम समुदाय में प्रचलित है, जिनकी आबादी दस लाख से थोड़ी ही अधिक है. उत्तरी मिस्र को अपनी उत्पत्ति का मूल स्रोत मानने वाले एक समुदाय विशेष के लोग महिला खतना को अपनी परम्परा और पहचान मानते हैं। ये समुदाय इस्मायली शिया समुदाय का एक उप समुदाय है,पश्चिमी भारत और पाकिस्तान में भी बड़ी संख्या में रहता है। यही वजह है कि पश्चिमी भारत और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में स्त्रियों का खतना करने का रिवाज आज भी जारी है।
 
मासूमा रानाल्वी एक एफजीएम-विरोधी कार्यकर्ता और एक बोहरा मुस्लिम हैं, उन्हें भी ऐसी ही परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था, जब वह महज 7 साल की थीं.ब्रिटेन में 1985 से महिला खतना प्रतिबंधित है ब्रिटेन में महिला खतना का दोषी पाए जाने पर 14 साल की सजा का प्रावधान है.'हराम की बोटी'... दाऊदी बोहरा समुदाय में बच्चियों के योनि के एक हिस्से को यही नाम दिया गया है. वे बड़ी होकर 'भटके' न इसलिए इस हिस्से को काट दिया जाता है. इस अमानवीय प्रथा पर अब सुप्रीम कोर्ट ने बैन लगाने को कहा है. महिला खतना को अंग्रेजी में फीमेल जेनिटल म्यूटेशन कहते हैं. इसमें योनि के क्लिटोरिस के एक हिस्से को रेजर या ब्लेड से काट दिया जाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, यह खतना चार तरह का हो सकता है- क्लिटोरिस के पूरे हिस्से को काट देना, कुछ हिस्सा काटना, योनि की सिलाई या छेदना. इस दर्दनाक और अमानवीय प्रथा से कई बार यौन संक्रमण संबंधी बीमारियां हो सकती है. मानसिक पीड़ा का असर सारी उम्र रहता ही है. अपनी हालिया टिप्पणी में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं का अपने शरीर पर अधिकार की वकालत की. केंद्र ने इस प्रथा पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका का समर्थन किया. कोर्ट में इस समुदाय के प्रतिनिधियों की पैरवी करते हुए सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि यह इस समुदाय की बुनियादी परंपरा है और कोर्ट इस समुदाय के धर्म से जुड़े अधिकार में हस्तक्षेप नहीं कर सकता. इस दलील का अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने विरोध किया. वेणुगोपाल ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की बेंच से कहा, "इस प्रथा पर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और कई अफ्रीकी देशों में रोक लग चुकी है. इस पर कानूनी प्रतिबंध लगना चाहिए."

साहियो नाम की एक गैर सरकारी संस्था महिला खतने के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुहिम चला रही है. भारत में साहियो की सह संस्थापक और पत्रकार आरेफा जोहरी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को आशा की किरण मानती है.विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, खतने के इस समय चार तरीके प्रचलित हैं. क्लिटोरिस के पूरे हिस्से को काट देना, कुछ हिस्सा काटना, योनि की सिलाई या अवच्छेदन. इस परंपरा के मुताबिक, महिला को शारीरिक संबंध का आनंद लेने का अधिकार नहीं है. यदि उसका खतना होता है तो वह अपने पति के प्रति वफादार रहेगी और घर के बाहर नहीं जाएगी.

मुस्लिम महिलाओं के शोषण का प्रतीक बन चुकी तीन तलाक, बहुविवाह जैसी कुप्रथाओं के साथ कांग्रेस पार्टी खड़ी रही है। अब कांग्रेस ने मुस्लिम बच्चियों के खतने जैसी क्रूर प्रथा का भी समर्थन किया है। दरअसल मुस्लिम समाज में मजहब के नाम पर खतना जैसी अमानवीय कुरीति को बंद करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पूछा कि आखिर किसी के शरीर के साथ हिंसक छेड़छाड़ क्यों होनी चाहिए? मजहब के नाम पर रिवाज के तहत किसी के जननांग को छूने की इजाजत कैसे दी जा सकती है? कोर्ट के इन सवालों का जवाब दाउदी बोहरा के धर्मगुरु की तरफ से कांग्रेस के सांसद व वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दिया है। सिंघवी ने कोर्ट से कहा है कि इस्लाम में खतना एक जरूरी रिवाज है। इस्लामिक दुनिया में हर पुरुष खतना कराते हैं, ऐसे में मुस्लिम महिलाओं के लिए खतना प्रतिबंधित क्यों? सिंघवी ने इस्लाम का खास रिवाज बताते हुए मुस्लिम महिला के खतना को वाजिब बताया है।

दुनिया भर में करीब 20 करोड़ महिलाएं खतना का शिकार हुई हैं. यह प्रथा अफ्रीका, मध्यपूर्व और एशिया के करीब 30 देशों में प्रचलित है. 6 फरवरी को महिला खतना के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है. संयुक्त राष्ट्र संस्था विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि महिला खतना मानवाधिकारों का गंभीर हनन है. संयुक्त राष्ट्र बाल कल्याण संस्था यूनीसेफ के अनुसार फीमेल जेनिटल म्यूटीलेशन एफएमजी कहे जाने वाले खतना से प्रभावित आधे से ज्यादा महिलाएं इंडोनेशिया, मिस्र और इथियोपिया में रहती हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने डॉक्टरों और चिकित्सीय कर्मचारियों से अपील की है कि वे इस तरह के ऑपरेशन न करें. इसका मकसद लड़कियों में सेक्स की इच्छा को दबाना या सीमित करना है. बहुत सी महिलाओं के लिए खतने के बाद सेक्स दर्द भरा होता है. संयुक्त राष्ट्र पॉपुलेशन फंड के अनुसार हालांकि खतने की प्रथा में धीरे धीरे कमी आ रही है लेकिन प्रभावित देशों में बढ़ती आबादी के कारण उसकी कुल संख्या में गिरावट नहीं आ रही.
 


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