डायबीटीज से रहें जरा बचकर
आज वर्ल्ड डायबीटीज डे है और यह दिन आपको अपनी जीवनशैली के बारे में अलर्ट करने के मकसद से मनाया जाता है।


आज वर्ल्ड डायबीटीज डे है और यह दिन आपको अपनी जीवनशैली के बारे में अलर्ट करने के मकसद से मनाया जाता है। एक्सपर्ट्स से बात करके डायबीटीज के बारे में पूरी जानकारी दे रही हैं नीतू सिंह : 

मोटे तौर पर समझने की कोशिश करें तो डायबीटीज हॉर्मोंस के असंतुलन, मोटापा और अस्वस्थ जीवनशैली का एक मिला-जुला नतीजा है। इन कारणों से भोजन से मिला कार्बोहाइड्रेट, जिसे हमारी कोशिकाओं में जाकर ऊर्जा देने का काम करना चाहिए, खून में ही घूमता रहता है। इससे खून में शुगर की मात्रा तो जरूरत से ज्यादा मिलती ही है, शरीर के सभी अंगों की नसों पर भी प्रभाव पड़ने लगता है। 

डायबीटीज के टाइप 
टाइप 1 डायबीटीज 
यह बचपन में या किशोर अवस्था में अचानक इंसुलिन के उत्पादन की कमी होने से पैदा होने वाली बीमारी है। इसमें इंसुलिन हॉर्मोन बनना पूरी तरह बंद हो जाता है। ऐसा किसी एंटीबॉडी की वजह से बीटा सेल्स के पूरी तरह काम करना बंद करने से होता है। ऐसे में शरीर में ग्लूकोज की बढ़ी हुई मात्रा को कंट्रोल करने के लिए इंसुलिन के इंजेक्शन की जरूरत होती है। इसके मरीज काफी कम होते हैं। 

टाइप 2 डायबीटीज 
आमतौर पर 30 साल की उम्र के बाद यह धीरे-धीरे बढ़ता है। इससे प्रभावित ज्यादातर लोगों का वजन सामान्य से ज्यादा होता है या उन्हें पेट के मोटापे की समस्या होती है। यह कई बार आनुवांशिक होता है तो कई मामलों में खराब जीवनशैली से संबंधित होता है। इसमें इंसुलिन कम मात्रा में बनता है या पेंक्रियाज सही से काम नहीं कर रहा होता है। डायबीटीज के 90 फीसदी मरीज इसी कैटिगरी में आते हैं। एक्सरसाइज, बैलेंस्ड डाइट और दवाइयों से इसे कंट्रोल में रखा जा सकता है। 

कौन-कौन से टेस्ट 
ब्लड टेस्ट 
अगर ब्लड शुगर 170 से ज्यादा नहीं है तो पेशाब में नहीं आएगी, इसलिए ब्लड टेस्ट जरूरी है। ब्लड टेस्ट दो बार किया जाता है - खाली पेट और नाश्ता या ग्लूकोज लेने के बाद। 
ध्यान रखें : 
1. इस टेस्ट से तीन-चार दिन पहले से कार्बोहाइड्रेट से भरपूर खाना खाना चाहिए। 
2. टेस्ट से पहले कॉलेस्ट्रॉल कम करनेवाली नाइसिन टैब्लेट, विटामिन-सी, ऐस्प्रिन, गर्भ-निरोधक दवाइयां आदि का बिल्कुल इस्तेमाल न करें। इनसे पेशाब में शुगर लेवल कम आ सकता है, जिससे सही रीडिंग नहीं आ पाएगी। 
3. जिस व्यक्ति को 75 ग्राम ग्लूकोज खाकर दो घंटे बाद टेस्ट देना है, उसे कहीं नहीं जाना चाहिए बल्कि वहीं ठहरना चाहिए। एक-डेढ़ घंटे घूम आएं, ऐसा नहीं करना चाहिए। इससे टेस्ट के रिजल्ट पर असर पड़ता है। 

डायबीटीज के मरीज हैं तो इन टेस्टों को कराते रहें : 
- खाली पेट ब्लड शुगर (नॉर्मल रेंज 100-120) और खाने के 2 घंटे बाद (नॉर्मल रेंज 130-160) हफ्ते में कम-से-कम एक बार 
- एचबीए1सी टेस्ट हर तीन से चार महीने बाद कराएं। 
- इस टेस्ट में आपको खाली पेट और खाने के दो घंटे बाद का ब्लड सैंपल देने का झंझट पालने की जरूरत नहीं है। कभी भी, किसी भी लैब में जाकर एचबीए1सी (ग्लाइकोसिलेटेड हीमोग्लोबिन) टेस्ट के लिए सैंपल दे सकते हैं। 
- यह टेस्ट सिर्फ डायबीटीज के मरीज ही नहीं, बल्कि सामान्य और प्री-डायबीटिक लोग भी करा सकते हैं। एचबीए1सी से सही समय पर डायबीटीज की सही स्थिति का पता लगाया जा सकता है। इससे ऐसे बिना डायबीटीज वाले मरीजों के मामले में कन्फ्यूजन भी खत्म हो जाता है जिनका इमरजेंसी में किए गए टेस्ट में ब्लड ग्लूकोज लेवल ज्यादा आया हो। 
-इस टेस्ट से पिछले तीन महीने की ऐवरेज स्थिति का पता लग जाता है। हीमोग्लोबिन रेड ब्लड सेल्स से बनता है और जब इसमें ग्लूकोज मिलता है तो ग्लाइकोसिलेटेड हीमोग्लोबिन बनता है। एचबीए1सी टेस्ट पिछले तीन महीने का ऐवरेज ब्लड शुगर लेवल बता देता है। इसकी नॉर्मल रेंज 4 से 6 पर्सेंट तक मानी जाती है, लेकिन 5.7 से 6.4 पर्सेंट होने का मतलब है आपकी सेहत के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है। यह प्री-डायबीटीज की स्टेज होती है, जो आगे चलकर डायबीटीज में बदल सकती है। डायबीटीज के मरीजों में एचबीए1सी 6.5 से 7 पर्सेंट तक रहे तो डायबीटीज नियंत्रण में मानी जाती है। 

और कौन-सी जांच 
खून में कॉलेस्ट्रॉल व चर्बी की मात्रा के लिए लिपिड प्रोफाइल टेस्ट 
ईसीजी व टीएमटी टेस्ट आंखों की जांच 
वजन का रेकॉर्ड 
पैरों की जांच ब्लडप्रेशर की जांच 
किडनी का टेस्ट 
ये सभी जांच साल में एक बार करा लें। 

सभी अंगों पर असर डायबीटीज का असर 
किडनी पर कुछ साल बाद ही शुरू हो जाता है। इसे रोकने के लिए ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर दोनों को नॉर्मल रखना चाहिए। ब्लड शुगर के स्तर को नियंत्रण में रखकर आंखों की मोतियाबिंद जैसी बीमारियों से बचा जा सकता है। डायबीटीज के मरीजों में अकसर 65 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते दिल के दौरे की समस्या शुरू हो जाती है। इससे बचने के लिए ग्लूकोज स्तर नियंत्रण में रखने के साथ-साथ ब्लड प्रेशर, कॉलेस्ट्रॉल और तनाव पर नियंत्रण भी जरूरी है। 

दूसरी बीमारियां 
हार्ट अटैक, स्ट्रोक्स, लकवा, इन्फेक्शन और किडनी फेल्योर 
स्किन व आंखों की बीमारियां 
पैरों की समस्याएं 
दांतों की बीमारियां 
पुरुषों में नपुंसकता और महिलाओं में बांझपन 
फ्रोजन शोल्डर या कंधे का जाम होना 

क्या कहती हैं नई रिसर्च 
- डायबीटीज नियंत्रण के लिए जीवन शैली में सुधार किसी भी नई या पुरानी दवाओं से ज्यादा कारगर है। 
- अगर आपको दिल के दौरे का ज्यादा खतरा है तो कुछ दवाएं बचाव की जगह नुकसान पहुंचा सकती हैं। 
- दिल का दौरा आने के बाद ब्लड शुगर ज्यादा कम रखना भी खतरनाक है। ऐसे में फास्टिंग ब्लड शुगर 120 और खाने के 2 घंटे बाद का ब्लड शुगर लेवल 180 से कम न होने दें। 
- नई इंसुलिन पर रिसर्च चल रही है। इसे सूंघकर या टैब्लेट के रूप में लिया जा सकता है। इसके आ जाने के बाद डायबीटीज के मरीजों की जिंदगी बेहद आसान हो जाएगी। लगातार ब्लड शुगर स्तर को मॉनिटर करने के लिए नया मॉनिटरिंग सिस्टम जिसे सीजीएम कहते हैं, इंसुलिन पंप एम अन्य नया डिवाइस है जिससे नियमित रूप से इंसुलिन सीधे शरीर में लिया जा सकता है। 

इंसुलिन का इस्तेमाल 
कई बार नियमित इंसुलिन की डोज लेने के बावजूद ब्लड शुगर लेवल नियंत्रण से बाहर रहता है। गलतफहमी में लोग इसे बेअसर मान लेते हैं और इंसुलिन का इस्तेमाल ही बंद कर देते हैं। ऐसे में समस्या और गंभीर हो जाती है। इंसुलिन खरीदते वक्त यह सुनिश्चित कर लें कि वह सही है या नहीं। हालांकि इसे देखकर असली-नकली का पता लगाना मुश्किल है। कई बार हम इंसुलिन के रंग से उसके असली-नकली होने का अंदाजा लगा सकते हैं। इस समस्या से बचने के लिए किसी अधिकृत केमिस्ट से ही इसे खरीदें और इसका बिल लें। इसके साथ ही यह भी जांच लें कि इंसुलिन के स्टोरेज में तापमान के मानक का ध्यान रखा गया है या नहीं। इसकी क्वालिटी बरकरार रखने के लिए इसे 8 से 10 डिग्री तापमान पर रखना चाहिए। केमिस्ट की दुकान से घर तक लाने और घर में इसे स्टोर करने में भी तापमान का ध्यान रखना जरूरी है। कई बार लोग इसे स्कूटर पर दूर-दूर से गर्मी में लेकर आते हैं या गाड़ी में इंसुलिन रख लेते हैं। पार्किंग में धूप में गाड़ी खड़ी रहने से इंसुलिन खराब हो जाता है। सही तापमान मेनटेन न होने से भी इंसुलिन का असर कम हो जाता है और इस्तेमाल के बावजूद आपकी समस्या बढ़ती रहती है। डायबीटीज को नियंत्रण में रखने के लिए डॉक्टर की सलाह पर इंसुलिन लेने से हिचकिचाएं नहीं, क्योंकि इसके बिना आपकी समस्या बढ़कर किडनी, लिवर, आंखों और हार्ट जैसे महत्वपूर्ण अंगों को अपनी चपेट में ले सकती है और आपका जीवन मुश्किल में डाल सकती है। 

किसे पड़ती है इंसुलिन की जरूरत? 
शुगर के वे मरीज, जिनको दिल की बीमारी हो या लकवा का अटैक हो चुका हो, आंखों की बीमारी हो, इन्फेक्शन हो, टीबी हो या ऑपरेशन होनेवाला हो। डायबीटीज से पीड़ित गर्भवती महिलाओं को। जब दवाओं से डायबीटीज कंट्रोल में न आ रहा हो। किसी वजह से मरीज सुबह या शाम को इंजेक्शन लगाना भूल जाता है तो मरीज को दो इंजेक्शन एक साथ कभी भी नहीं लगाने चाहिए। कभी मरीज को लगता है कि आज खाने पर कंट्रोल नहीं हो पाएगा तो वह इंसुलिन की मात्रा बढ़ा सकता है। 

इंसुलिन लेने का सही तरीका 
- डायबीटीज के मरीज सिरिंज और इंसुलिन की शीशी के बजाय इंसुलिन पेन का इस्तेमाल कर सकते हैं, क्योंकि इसे आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है। 
- इंसुलिन का इंजेक्शन हमेशा खाने से पहले लगाना चाहिए। सुबह नाश्ता करने से और रात में डिनर करने से 15-20 मिनट पहले इंसुलिन का इंजेक्शन लगाना चाहिए। दो इंजेक्शनों के बीच 10-12 घंटों का फासला होना जरूरी है। खाने के एकदम साथ न लगाएं क्योंकि ऐसा करने से ब्लड शुगर लेवल बढ़ सकता है। इंसुलिन को ठंडी और साफ जगह पर रखें। 

नियंत्रण के तरीके 
आयुर्वेद 
नीचे दिए दी गई दवाओं में से किसी एक का सेवन करें: 
- महामज्जक वटी दिन में दो बार लें। 
- बसंत कुसुमाकर का रस दूध से लें। 
- चंदप्रभा वटी पानी से दो बार ले सकते हैं। 

योग और प्राणायाम 
- कुछ खास योगासन और प्राणायाम ब्लड ग्लूकोज स्तर और ब्लड प्रेशर को कम करने में सहायक हैं, क्योंकि इनसे शारीरिक और मानसिक तनाव कम होता है। 
- कपालभांति क्रिया (5-7 मिनट), अग्निसार क्रिया (तीन बार) और उर्ध्वहस्तोतान आसन (तीन बार), पवनमुक्तासन (दो बार), भुजंगासन (दो बार), मंडूकासन (पांच-छह बार), अर्ध मत्स्येंदासन (दो बार), उड्यानबंद (दो-तीन बार), अनुलोम-विलोम प्राणायाम (पांच मिनट) और भस्त्रिका प्रणायाम (दो बार) पैंक्रियाज को एक्टिवेट करते हैं। 
- पैरों और आंखों के लिए अलग से सूक्ष्म क्रियाएं करें। उज्जायी प्राणायाम दिल को सेफ रखेगा तो अनुलोम-विलोम याददाश्त के लिए अच्छा है। (इन आसनों को खाली पेट सुबह करें या लंच के चार-पांच घंटे बाद करें।) 

क्या खाएं 
फल: जामुन बेहद फायदेमंद हैं। आंवला, नीबू, संतरा, टमाटर, पपीता, खरबूजा, तरबूज, नाशपाती आदि खाने चाहिए। अमरूद, स्ट्रॉबेरी, अंजीर, मौसमी, मालटा, सिंघाड़ा भी खा सकते हैं। रोजाना 100-150 ग्राम फ्रूट्स खा सकते हैं लेकिन इन्हें मेन खाने से हटकर लें, ताकि खाने के साथ शुगर न बढ़े। 
सब्जियां: मेथी, पालक, करेला, बथुआ, सरसों का साग, सीताफल, ककड़ी, तोरई, टिंडा, शिमला मिर्च, भिंडी, सेम, शलजम, खीरा, ग्वार की फली, चने का साग, सोया का साग, गाजर आदि भी खा सकते हैं। लहसुन ग्लूकोज के लेवल को कम करता है। 
फाइबर व ओमेगा थ्री फैटी एसिड ज्यादा हो : ब्राउन व बिना पॉलिश चावल, छिलके वाली दालें, चोकर मिला आटा इस्तेमाल करें। सोयाबीन, साबुत चना, राजमा, लोबिया आदि लें। स्प्राउट्स ले सकते हैं। ब्राउन ब्रेड, ओट, दलिया खाएं। दिन भर में चार-पांच कटोरी सब्जियां कच्ची (सलाद) या पकी खाएं। 
जूस: करेला, गाजर, पालक, लौकी, शलजम, पत्ता गोभी आदि का जूस पी सकते हैं। वैसे, फलों का रस ज्यादा नहीं पीना चाहिए क्योंकि इनमें शुगर की मात्रा ज्यादा होती है। आधा गिलास तक दिन में। 

नॉन वेज: तंदूरी या उबले मुर्गे का मीट और मछली को उबालकर या भूनकर खा सकते हैं। दिन में एक-दो अंडे खा सकते हैं। हालांकि शाकाहारी खाना ही बेहतर है। 
घी-तेल: अलसी, सोयाबीन, सरसों, सूरजमुखी का तेल खाएं। सूरजमुखी और कोर्न ऑइल को सरसों को तेल में मिलाकर भी इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन कुल मिलाकर दिन में फैट 15-20 ग्राम (3-4 चम्मच) से ज्यादा न लें। महीने में आधा लीटर तेल काफी है। 
दूध से बनी चीजें: दूध, दही, पनीर लें लेकिन लो फैट रखें। डबल टोंड दूध का इस्तेमाल अच्छा है। दिन में दो-तीन कप चाय पी सकते हैं, लेकिन बिना शुगर वाली। नमकीन लस्सी-छाछ पीएं। मसाले व अन्य : मेथी, लहसुन व दालचीनी खून में ग्लूकोज लेवल कम करते हैं और गुड कॉलेस्ट्रॉल बढ़ाते हैं। एलोवेरा का जूस व जेल भी फायदेमंद है। ग्रीन टी से शरीर में ग्लूकोज अब्जॉर्ब करने की क्षमता बढ़ती है। (नोट : पांच-छह बार में थोड़ा-थोड़ा कर खाएं। महिलाएं 1500-1600 कैलरी और पुरुष 1700-1800 कैलरी ले सकते हैं।) 

किससे करें परहेज 
मीठी चीजें: चीनी, गुड़, मिठाई, टॉफी, चॉकलेट, आइसक्रीम आदि। मीठे फल : सेब, केला, चीकू, आम, शहतूत, अंगूर, लीची आदि। 
सब्जियां: आलू, अरबी, शकरकंद, कचालू जैसी स्टार्च वाली सब्जियां। 
घी-तेल: देसी घी, वनस्पति घी-तेल, नारियल तेल, मक्खन, क्रीम, खोया व पनीर। महीने में आधा किलो से ज्यादा घी या तेल नहीं खाना चाहिए। 
दूसरी चीजें: मैदा, चावल, शराब, बीयर आदि। बॉर्नवीटा, हॉरलिक्स, बूस्ट, मॉलटोवा, प्रोटीनेक्स आदि। 
मांसाहार: अंडे की जर्दी, कीमा, गुर्दे व लिवर का मीट, बकरे का मीट। अंडे का पीला वाला भाग। 
इनमें भी शुगर है: चाय, कॉफी, शेक, जूस आदि में शुगर कंटेंट होता है, इसलिए संयमित प्रयोग करें। पास्ता, वाइट ब्रेड आदि मीठे नहीं होते लेकिन इनमें भी शुगर होती है। 

आर्टिफिशल स्वीटनर का चक्कर 
ज्यादातर आर्टिफिशल स्वीटनर के फायदे और नुकसान दोनों होते हैं। इसके बुरे प्रभावों में अनजाने में ज्यादा मात्रा में कैलरी ले लेना, पकी हुई चीजों के टेक्सचर में बदलाव, अलर्जी या कार्सिनोजेनिक असर शामिल है। बाकी साइड इफेक्ट्स में सिरदर्द, घबराहट, मितली, नींद कम आना, याददाश्त कमजोर होना, जोड़ों में दर्द और घबराहट आदि शामिल हैं। 
नुकसानदायक: सैक्रीन (Saccharin), ऐसपारटेम (Aspartame) न्यूट्रल : सुक्रालोज (Sucralose), स्टीविया (Stevia) 

पैरों की सुरक्षा भी है जरूरी 
- रोजाना आइने में पैरों की जांच करें। 
- पैरों को साफ रखें, खासतौर से तलवों को। 
- नंगे पैर कभी न चलें। मंदिर में या घास पर भी नहीं। 
- जूते-चप्पल की रगड़ से अगर त्वचा सख्त पड़ गई हो तो डॉक्टर को दिखाएं। 
- धूम्रपान बिल्कुल न करें। 
- पैरों की गर्म सिकाई कभी न करें। 

बच्चों में बढ़ रहा है खतरा 
बच्चों में टाइप 2 डायबीटीज़ के मरीजों की तादाद बढ़ रही है क्योंकि उनमें मोटापा बढ़ रहा है। ऐसे तो डायबीटीज़ के सटीक कारण का पता नहीं है, पर ऑटोइम्यून मिकेनिज्म (इंसुलिन बनाने वाले पैनक्रियाज़ के कुछ हिस्से शरीर के अपने इम्यून सिस्टम से नष्ट हो जाते हैं), को एक कारण माना जाता है। आनुवांशिक और पर्यावरणीय कारण (मसलन सामान्य बीमारी आदि) भी महत्वपूर्ण है। इसके लक्षणों में ज्यादा पेशाब और प्यास लगना। अकसर वजन कम होना, कमजोरी और आलस्य, ज्यादा भूख लगना (कभी-कभी भूख मरना), रात में बिस्तर पर पेशाब जबकि पिछली 'रात में सूखा' रहना आदि शुरुआती लक्षण हैं जो बच्चे को लेकर अस्पताल आने से पहले एक सप्ताह से 6 माह तक माता-पिता को दिखते हैं। टाइप 1 के कुछ मरीजों (लगभग 25 फीसदी) में डायबेटिक कीटोएसीडोसिस (डीकेए) हो सकता है जो गंभीर लक्षण है। इसमें उल्टी, पेट दर्द और डिहाड्रेशन (मुंह, होंठ सूखना, आंख धंसना आदि) शामिल हैं। जानकारी हो तो माता-पिता जल्द लक्षण पकड़ लेते हैं और बच्चे को डीकेए की श्रेणी में जाने से बचा सकते हैं। 

मोटापा और डायबीटीज 
हमारे बच्चों की जीवनशैली स्वस्थ नहीं है। इसी तरह जंक फूड और नई-नई तकनीकों पर निर्भरता बनी रही, मेहनत पीछे छूटती गई तो नतीजे खतरनाक हो सकते हैं। टाइप 2 डायबीटीज जो पहले बच्चों में नहीं सुना जाता था, आजकल तेजी से बढ़ रहा है। वजन ज्यादा होना या मोटापा इसकी बड़ी वजह हैं। मोटापा इंसुलिन को बेअसर करता है। इससे इंसुलिन शरीर पर सही असर नहीं करता। इसके कुछ मुख्य कारण हैं : तेजी से बदलती जीवनशैली, आहार असंतुलन समेत बहुत ज्यादा कैलरी लेना, चीनी और तैलीय पदार्थों का ज्यादा इस्तेमाल और एक्सरसाइज न करना। भोजन और एक्सरसाइज पर सतर्कता से मोटापा और इसके खतरनाक नतीजों से बचा जा सकता है।


साभार : NBT

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