जानें क्या होती हैं एफडीसी दवाएं, जिन पर बैन लगा है
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केंद्र सरकार ने 300 से अधिक दवाओं पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है. इसमें ज्यादातर दवाएं एफडीसी हैं. भारत में ज्यादा एफडीसी बगैर क्लिनिकल ट्रायल के ही बाजार में बिकती हैं. डॉक्टर भी इन्हें धडल्ले से लिखते हैं. इनमें कुछ एफडीसी ऐसी हैं, जो बहुत लोकप्रिय रही हैं. माना गया कि ये दवाएं हमारी सेहत के साथ खिलवाड़ तो कर ही रही हैं, साथ ही इन्हें लेना नुकसानदायक भी हो सकता है. इनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मानव शरीर पर बुरा असर पड़ता है.

क्या होती हैं एफडीसी दवाएं ?
- एफडीसी का मतलब है फिक्स्ड डोज कांबिनेशन. ये दवाएं दो या ज्यादा दवाओं का कांबिनेशन होती हैं. अमेरिका और कई अन्य देशों में एफडीसी दवाओं की प्रचुरता पर रोक है. जितनी ज्यादा एफडीसी दवाएं भारत में बिकती हैं, उतनी शायद ही किसी विकसित देशों में इस्तेमाल होती हों. इन दवाओं के अनुपात और इनसे होने वाले असर पर काफी सवाल उठते रहे हैं.

जिन दवाओं पर बैन लगाया गया है, उसमें लोकप्रिय दवाएं कौन सी हैं?

- दर्दनिवारक सैरेडॉन, स्किन क्रीम पैंडर्म, कॉबिनेशन मधुमेह की दवा ग्लूकोनॉर्म पीजी, एंटिबयोटिक ल्युपिडिक्लोक्स, टैक्सिम एजेड.

क्या आपको मालूम है कि पैरासिटामोल की कितनी एफडीसी दवाएं बाजार में हैं?
- इनकी संख्या करीब 28 है. पैरासिटामोल के साल्ट के साथ काफी ज्यादा एफडीसी दवाएं बनाई जाती हैं

किन दवाओं पर बैन का खतरा मंडरा रहा है?
- ऐसी करीब 15 दवाएं हैं, जिसमें पेंसिडिल कफ सिरप, डी कोल्ड टोटल, कोरेक्स सिरप शामिल हैं.

एफडीसी दवाओं के कांबिनेशन किस तरह हो सकते हैं, इनका पता कैसे चलेगा?
- हर दवा के ऊपर उसका फार्मेशन यानि जेनेरिक नाम लिखा होता है. इसमें ये साफतौर पर बताया जाता है कि ये दवा किन साल्ट का मिश्रण है. मसलन सैरिडॉन पैरासिटामोल, प्रोफिफेनाजोन और कैफीन का मिश्रण है. इसी तरह के कुछ कांबिनेशन इस तरह हैं- सेफिक्लाइम और एजिथ्रोमाइशिन, एफ्लॉक्सिन, ओनिडोजोल और ऑर्डिडाजोल सस्पेंशन, मेट्रॉनाइडोजोल और नॉरफ्लाक्सिन का मिश्रण. यानि जब भी आप दवा खरीदें तो इसके ऊपर इसके कांबिनेशन जरूर देख लें. हां भी ध्यान रखें जिन एफडीसी पर बैन लगाया गया है, वो सिंगल दवा के रूप में प्रतिबंधित नहीं हैं, उनका इस्तेमाल किया जा सकता है.

किस तरह इन दवाओं पर प्रतिबंध की प्रक्रिया चली?
- स्वास्थ्य मंत्रालय का अपना ड्रग टैक्निकल एडवाइजरी बोर्ड (डीटीएबी) है. जो लगातार दवाओं की समीक्षा भी करता है. दवाओं पर सलाह भी देता है. डीटीएबी की एक उप समिति ने पिछले दिनों 300 से ज्यादा एफडीसी और दवाओं का अध्ययन किया था. उसी के निष्कर्षों के आधार पर केंद्र सरकार ने ये कदम उठाया. हालांकि ये मामला उससे कुछ ज्यादा पुराना है.
- सीके काकोटे पैनल की संस्तुतियों के आधार पर मार्च 2016 में 344 दवाओं को बैन किया था, जिसमें ज्यादा एफडीसी दवाएं थीं. सरकार के इस फैसले को दवा उत्पादकों ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी. जिस पर कोर्ट ने ये कहते हुए ये बैन उठा दिया कि केंद्र सरकार को पहले व्यवस्थित तरीके से इसकी समीक्षा करनी चाहिए. फिर ये मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा. दिसंबर 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को इसकी समीक्षा करने को कहा. उसके बाद ही केंद्र ने ये कदम उठाया.

डीटीएबी ने अपनी जो फाइनल रिपोर्ट दी, उसमें 328 दवाएं ऐसी पाईं गईं, जो खतरनाक साबित हो सकती हैं. बोर्ड ने इन दवाओं पर पाबंदी की संस्तुति दी. वहीं छह अन्य दवाओं के मामले में बोर्ड ने कहा कि इन दवाओं पर भी पाबंदी लगनी चाहिए. जिन 15 दवाओं पर बैन नहीं लगा, उनका निर्माण देश में 1988 से पहले से हो रहा है. लिहाजा वो फिलहाल बैन से बच गईं हैं.

केंद्र सरकार ने क्या कदम उठाया है?
- डीटीएबी की सलाह पर 328 एफडीसी और छह दवाओं को प्रतिबंधित कर दिया. 15 दवाओं की समीक्षा की जा रही है. उन पर भी प्रतिबंध लगाया जा सकता है.

क्या ये दवाएं बगैर ट्रायल के भी बाजार में बिक सकती हैं?
- नियम तो कहते हैं कि ऐसा नहीं होना चाहिए. हालांकि आशंकाएं जाहिर की जा रही हैं कि ऐसा हो रहा है. भारत का दवा बाजार इतना बड़ा और अनियंत्रित है कि इसमें कौन सी दवाएं किस तरह बिक रही है, ये कहना मुश्किल है.

- एक रिपोर्ट कहती हैं कि बाजार में ऐसी हजारों दवाएं बिक रही हैं, जो बगैर सरकार की मंजूरी और टेस्ट के बेची जा रही हैं. स्थानीय छोटी कंपनियों से लेकर बड़ी कंपनियां तक इन्हें बनाती हैं. डॉक्टरों से गठजोड़ के जरिए इन्हें धडल्ले से बेचा जाता है.

क्या राज्यों के भी इस मामले में अपने कोई नियम हैं?
- हां, हर राज्य इसके रेगुलेशन के नियम जरूर हैं लेकिन आमतौर पर वो शिथिल रहते हैं. देश में पुडुचेरी एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां बिना अनुमति की सभी एफडीसी और दवाओं पर वर्ष 2014 से ही रोक है. अन्य राज्यों में इस पर कोई कदम अब तक नहीं उठाया गया है.

- वैसे ये भी देखने में आया है कि राज्य सरकारों के स्तर दवा उत्पादकों को कई दवाएं बनाने के लाइसेंस आसानी से मिल जाते हैं

भारत में इन दवाओं का बाजार कितना बड़ा है?
- अगर फाइनेंशियल टाइम्स में छपी रिपोर्ट पर गौर करें तो देश में एफडीसी दवाओं का बाजार करीब 3000 हजार करोड़ का है. हालांकि ये भी सच है कि दवाएं जितने प्रचुर तरीके से हमारे देश में बिकती हैं, वैसा किसी विकसित देश में नहीं है. इन्हें लेकर ब्रिटिश और अमेरिकी मेडिकल जर्नल्स में सवाल भी उठे हैं.


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