झपकी लीजिए, इमोशनली मज़बूत रहेंगे
नींद, हमारे दिन भर के अनुभवों पर आधारित जानकारी को एनकोड करने में अहम रोल निभाती है



घर का काम निपटाकर थोड़ी देर की झपकी आपकी सारी थकान मिटा देती है. बच्चा कितना भी खेलता रहे लेकिन दोपहर में अगर वो थोड़ा सा सो लेता है तो चिड़चिड़ा नहीं रहता. कुछ दफ्तरों में भी ‘नैप’ यानी झपकी लेने का प्रबंध है ताकि दिमाग ठीक से काम करे. वैसे भी आधी नींद में भरा व्यक्ति खाक़ ही काम करेगा. रिसर्च कहती है – दिन में झपकी या नींद नहीं लेने वाला बच्चा भावनात्मक रूप से व्यवस्थित नहीं रह पाता. मतलब झपकी हमारे इमोशन्स की मशीन को चलाने में वाकई मददगार होती है. आइए इसे ठीक से समझें.

नींद, हमारे दिन भर के अनुभवों पर आधारित जानकारी को एनकोड करने में अहम रोल निभाती है. इसलिए अपनी यादों को दिमाग में संजोकर रखने के लिए नींद ज़रूरी है. भावनात्मक यादें बहुत अनोखी होती हैं - जैसे कॉलेज का आखिरी दिन, पापा मम्मी के साथ मनाई छुट्टी, नाना के साथ बिताए पल. इमोशनल यादें इसलिए अनोखी होती हैं क्योंकि ये एमिगडाला को सक्रीय करती है जो कि दिमाग का इमोशनल हिस्सा होता है. स्पेंसर, यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स अमहर्स्ट में न्यूरोसाइंटिस्ट हैं. स्पेंसर के मुताबिक ‘एमिगडाला के सक्रीय होने से ही आप अपने ख़ास दिनों को, फिर वो किसी की शादी हो या किसी अपने का जाना, को ज्यादा बेहतर तरीके से याद रख पाते हैं.’

एमिगडाला इन यादों पर एक तरह से ‘स्पेशल’ का टैग लगा देता है ताकि नींद के दौरान इन्हें लंबे वक्त तक प्रोसेस किया जाए और छोटी यादों से ज्यादा इन्हें दोहराया जा सके. दूसरे शब्दों में कहें तो जब नींद के दौरान यादों को जरूरी और गैर जरूरी की तरह छांटने का काम होता है, तब एमिगडाला की बदौलत इन ख़ास यादों का ‘ख़ास’ ध्यान रख जाता है. लेकिन मेमरी या याद को प्रोसेस करने के साथ ही नींद हमारी मेमरी की ताकत को भी बदलती है. एक स्टडी में 8 से 11 साल के कुछ बच्चों को नकारात्मक और न्यूट्रल दोनों तरह की तस्वीरें दिखाई गईं. बच्चों ने तस्वीरों को देखकर प्रतिक्रिया दी. बाद में कुछ बच्चों को सुला दिया गया, वहीं कुछ बच्चे नहीं सोए. अगले दिन इन्हीं बच्चों को फिर से वही तस्वीरों के साथ कुछ नई तस्वीरें भी दिखाई गईं. इस बार जागे हुए बच्चों की तुलना में नींद ले चुके बच्चों की प्रतिक्रिया काफी नियंत्रित थी. नींद हमारी भावनाओं और प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित रखने में हमारी मदद करती है.

नींद भी किस्म किस्म की होती है. REM जिसे रैपिड आई मूवमेंट नींग कहते हैं – इसका जुड़ाव इमोशनल यादों से होता है और आप जितनी REM नींद लेंगे, उतना ज्यादा दूसरों की भावनाओं को भी समझ पाएंगे. कहते हैं कि REM नींद के दौरान स्ट्रेस हार्मोन नहीं होता. यही वजह है कि इस हार्मोन के नहीं होने से दिमाग उस दौरान बिन किसी तनाव के यादों को प्रोसेस करता है. वहीं गैर REM नींद भी अहम रोल निभाती है. स्लो वेव स्लीप (SWS) नींद का पहला पड़ाव होता है जो न्यूट्रल मेमरी को प्रोसेस करने का काम करती है.

झपकी ज्यादातर गैर REM नींद होती है और अगर लंबी झपकी ली जाए तो उसमें SWS भी शामिल होता है. स्पेंसर ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि सिर्फ झपकी ही नहीं, रात भर की नींद भी बच्चों की भावनात्मक मेमरी को प्रोसेस करने में मदद करती है. झपकी लिए बगैर बच्चे भावुक होते हैं, वहीं नींद लेने पर वह ज्यादा तटस्थ तरीके से चेहरों को देख पाते हैं.

हालांकि नींद के खेल को समझना इतना आसान नहीं है लेकिन एक बात तय है कि नींद ठीक से लेने से हमारे फैसले लेने की क्षमता बेहतर होती है इसलिए भी क्योंकि बहुत हद तक नींद हमारी उस उहापोह की समस्या को संभाल लेती है. कुल मिलाकर नींद हमें बेहतर महसूस करवाती है. वैसे भी कभी कोई समस्या हो तो बिस्तर पर जाइए और सो जाइए, जब सोकर उठेंगे तो समस्या का समाधान मिलने की संभावना होती है.



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