वर्चस्व को लेकर पश्चिमी एशिया में बढ़ा संकट
ईरान और लेबनान की करीबी को देखते हुए सऊदी ने लेबनान के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई के संकेत दिए हैं।


बेरुत : बीते हफ्ते सऊदी से इस्तीफा देने वाले लेबनान के पीएम के अब तक देश वापस न लौटने पर राष्ट्रपति ने सऊदी से स्पष्टीकरण मांगा है। इसके बाद से बेरुत और रियाद के बीच तनाव और बढ़ता जा रहा है। इस बीच अमेरिका और फ्रांस ने भी लेबनान की संप्रभुता और स्थिरता के लिए अपना समर्थन जाहिर किया है। दोनों देशों के बीच 4 नवंबर से तनाव बढ़ता जा रहा है जबसे लेबनान के पीएम साद अल-हरीरी ने सऊदी की राजधानी से अपने इस्तीफे की घोषणा की थी। इसके बाद से ही लेबनान में राजनीतिक संकट जारी है। दरअसल, ईरान और लेबनान की करीबी को देखते हुए सऊदी ने लेबनान के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई के संकेत दिए हैं। सऊदी और ईरान के बीच जारी वर्चस्व की लड़ाई से अब इसके आसपास के देश भी प्रभावित हो रहे हैं। 

लेबनानी राष्ट्रपति मिशेल ईयन ने अब सऊदी से पूछा है कि अपने इस्तीफे की घोषणा के बाद से हरीरी अभी तक घर क्यों नहीं लौटे हैं। ऐसे भी संकेत मिले हैं कि मिशेल ने हरीरी का इस्तीफा अभी तक स्वीकार नहीं किया है। लेबनानी अधिकारियों ने हरीरी की वापसी पर भी जोर दिया है। वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, लेबनानी राष्ट्रपति ने अपने राजदूतों से यह भी कहा है कि हरीरी को किडनैप कर लिया गया है और उन्हें बचाया जाना जरूरी है। 

वर्चस्व की लड़ाई 
सऊदी अरब और उसके पड़ोसी देशों के बीच लगातार बढ़ते तनाव की वजह वर्चस्व की लड़ाई है। दरअसल, पिछले कुछ समय में सऊदी ने क्षेत्रिय आधिपत्य स्थापित करने के लिए पड़ोसी देशों के खिलाफ छद्म युद्ध छेड़ दिया है। 

तनाव की मुख्य वजह क्या है? 
ईरान और सऊदी अरब के बीच शिया-सुन्नी मुद्दा तनाव की सबसे अहम वजह है। ये दोनों देश इस्लामिक दुनिया पर अपने नेतृत्व का दावा करते हैं। सऊदी अरब में मक्का और मदीना जैसे दो पवित्र धार्मिक स्थल हैं तो दूसरी तरफ साल 1979 में ईरान इस्लामिक क्रांति का गवाह रहा है, जिसके बाद इस देश को इस्लामिक गणराज्य घोषित किया गया था। ईरान शिया बहुल देश है तो सऊदी में सुन्नी मुस्लिमों की संख्या ज्यादा है। 

अभी क्यों बढ़ रहा है तनाव? 
अमेरिका और ईरान के बीच हुए परमाणु समझौते से सऊदी डरा हुआ है। सऊदी को लग रहा है कि इससे ईरान अपनी अर्थव्यवस्था को दोबारा खड़ा करने के लिए आजाद हो जाएगा। इसके साथ ही इराक और अब सीरिया में भी ईरान का प्रभाव बढ़ने से सऊदी की चिंता बढ़ती जारही है। इन सबके अलावा सऊदी के युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने ईरान के लिए कड़ा रुख अपनाया हुआ है। 

लेबनान से सऊदी को क्या है दिक्कत? 
4 नवंबर को रियाद एयरपोर्ट को निशाना बनाकर एक मिसाइल दागी गई थी। सऊदी का आरोप है कि यह मिसाइल यमन से छोड़ी गई थी लेकिन इसे ईरान और लेबनान ने तैयार किया था। इसी दिन लेबनान के पीएम हरीरी ने अपनी जान को खतरा बताते हुए सऊदी अरब से इस्तीफे की घोषणा की थी। 

सऊदी का कहना है कि लेबनान के पीएम ने इसलिए इस्तीफा दिया है क्योंकि उसके सहयोगी हिजबुल्लाह से उन्हें जान का खतरा है। सऊदी के अधिकारियों के मुताबिक, यमन में हूती नाम से पहचाने जाने वाले सऊदी विरोधियों को हिज्बुल्ला आतंकियों के समर्थन के जवाब में उसने लेबनान के खिलाफ कड़े कदम उठाए हैं। हिज्बुल्ला लेबनान का संगठन है। 
तनाव बढ़ता देख मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसि ने अपने विदेश मंत्री को अरब देशों से वार्ता के लिए भेजा है। पश्चिमी देशों ने भी शांति और हरीरी की रिहाई की मांग की है। वाइट हाउस की प्रेस सेक्रटरी साराह हकबी सैंडर्स ने एक बयान में कहा, 'वॉशिंगटन चाहता है कि सभी देश लेबनान की संप्रभुता, आजादी और सांविधानिक प्रक्रिया का सम्मान करें।' 

इस बीच, सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री ने शनिवार को कहा कि रियाद ने बहरीन को तेल की आपूर्ति बंद कर दी है। उन्होंने बताया कि बीते दिनों तेल पाइपलाइन में हुए धमाके के बाद सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाए गए हैं। ईरान को इस धमाके के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था जबकि ईरान ने बहरीन में अस्थिरता पैदा करने के आरोपों को खारिज कर दिया है। 

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