ईलम वॉर के 9 साल बाद 'संकट' में श्रीलंका, बौद्ध-मुस्लिमों में साम्प्रदायिक तनाव
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नई दिल्ली, 30 साल तक चले सिविल वॉर के खत्म होने के ठीक नौ साल बाद श्रीलंका एक बार फिर संकट में है. वहां बौद्धों और मुस्लिमों के बीच साम्प्रदायिक तनाव बढ़ गया है. घटना की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रपति मैथरिपाला सिरिसेना और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमेसिंघे की सरकार ने 10 दिनों के राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर दी है.

लिट्टे चीफ वी प्रभाकरण की मौत के साथ साल 2009 में ईरम वॉर समाप्त हुआ था. इस युद्ध के समाप्त होने से पहले तक श्रीलंका के बहुसंख्यक बौद्धों और अल्पसंख्यक मुस्लिमों के बीच सामान्य संबंध थे. इस युद्ध के अंत के साथ माहिंदा राजपक्षे का उदय हुआ और इसके साथ ही दोनों समुदायों के बीच तनाव बढ़ने लगा. कुछ उग्रवादी बौद्ध संगठनों ने मुस्लिमों पर हमले करने भी शुरू कर दिए.

हालांकि जब संयुक्त विपक्ष ने जनवरी 2015 में राजपक्षे की सरकार गिराई तो उसके बाद ये हमले कम हो गए. नवनिर्वाचित सिरिसेना और विक्रमेसिंघे की सरकार ने शांति की अपील कर दोनों समुदायो को जोड़कर रखने की कोशिश की. नई सरकार ने लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्ष समाज के पुनर्निर्माण की कोशिश की. हालांकि हिंसा की हालिया घटनाओं से यह साफ है कि उनकी कोशिशों का असर तीन साल के अंदर ही समाप्त हो रही है.

सेंट्रल प्रोविंस के कैंडी में मुस्लिम समुदाय के स्थानीय गुंडों ने एक बौद्ध युवक की हत्या कर दी जिसके बाद मुस्लिमों और बौद्धों के बीच विवाद शुरू हुआ. कोलंबो के एक पत्रकार ने  बताया कि ठगी और रोड रेज की एक वारदात ने कैंडी- पल्लेकेले इलाके में साम्प्रदायिक हिंसा का रूप ले लिया.

उन्होंने बताया, “यह रोड रेज की घटना थी. कुछ लोगों ने इसका फायदा उठाकर पूरे क्षेत्र में हिंसा फैला दी. ये हालात हम सभी के लिए चेतावनी है. लेकिन सरकार ने त्वरित कार्रवाई की और कैंडी एरिया में सुरक्षाबल भेजकर हालात काबू में लिये." उन्होंने बताया कि राजधानी कोलंबो में शांति है और वहां हिंसा की कोई घटना नहीं हुई है. लेकिन सुरक्षा के मद्देनजर सरकार ने पूरे देश में सुरक्षा बढ़ा दी है.

देश की 2.2 करोड़ जनसंख्या में से 55 लाख लोग ग्रेटर कोलंबो में रहते हैं. श्रीलंका के लीडिंग अंग्रेजी अखबार के इडिटर ने न्यूज18 से कहा, “मुझे उम्मीद है कि हिंसा अन्य क्षेत्रों में नहीं फैलेगी.  कोलंबो के कुछ हिस्सों में मुस्लिमों और बौद्धों के बीच तनाव है. उसके कई कारण है. बौद्धों की तुलना में मुस्लिमों के हालात अच्छे हैं. उन्हें खाड़ी और अरब देशों से पैसे मिलते हैं.”

राजपक्षे के सपोटर्स ने उन पर लगे तमाम आरोपों को खारिज कर दिया, सपोटर्स के मुताबिक राजपक्षे भी देश में शांति का आग्रह कर रहे हैं. इसके मद्देनज़र उन्होंने स्थानीय चुनावों की जीत के जश्न का कार्यक्रम भी स्थगित कर दिया.

बुद्दिस्ट ऑर्गनाइज़ेशन बोडू बाला सेना (BBS) जो कि एंटी मुस्लिम संस्था मानी जाती है उसने अपने आप को इस हिंसा से अलग कर लिया है. न्यूज़18 से बातचीत के दौरान BBS प्रमुख गालागोडा एथेथे जनानासारा ने कहा " BBS का इस हिंसा से कोई लेना-देना नहीं हैं, लेकिन हम इस हिंसा के प्रति चिंतित है."

BBS कथित तौर पर राजपक्षे के करीब मानी जाती है और यहां तक की राजपक्षे के कार्यकाल के दौरान BBS के मुस्लिमों के खिलाफ किए गए अत्याचारों को नज़रअंदाज़ करने के भी आरोप लगे हैं. जून 2014 में फैली सांप्रदायिक हिंसा के दौरान द्वीप के पश्चिमी और दक्षिणी हिस्से से करीब 10 हज़ार मुस्लिमों को विस्थापित किया गया था और इस घटना के लिए भी BBS को जिम्मेदार माना गया था.

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