शी चिनफिंग ने कैसे गुपचुप तरीके से कम समय में ही सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत की?
5 साल पहले चीन के राष्ट्रपति बने शी चिनफिंग ने कम समय में ही सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली।


पेइचिंग : 5 साल पहले चीन के राष्ट्रपति बने शी चिनफिंग ने कम समय में ही सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली। अब संविधान में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है, जिसके बाद राष्ट्रपति 2 कार्यकाल से ज्यादा समय तक पद पर बने रह सकते हैं। खास बात यह है कि इस बड़े फैसले के पीछे गोपनीय रूप से वार्ता कई महीने पहले से जारी थी। पूरी दुनिया इस बात से हैरान है कि कैसे शी ने बड़ी चतुराई से संविधान को फिर से लिखने की पटकथा तैयार कर दी।

चीन की संसद (नैशनल पीपल्स कांग्रेस) का सालाना सत्र शुरू होने से ठीक पहले पिछले हफ्ते इस फैसले की अचानक घोषणा हुई। दरअसल, महीनों पहले से तैयारी भले थी पर देरी जानबूझकर की गई जिससे कांग्रेस के करीब 3 हजार सदस्यों की मंजूरी में विपक्ष कोई रुकावट न पैदा कर सके। 

रविवार को वोटिंग के दौरान माना जा रहा है कि कांग्रेस इस बदलाव समेत दूसरे संवैधानिक संशोधनों को मंजूरी दे देगी। 2004 के बाद संविधान संशोधन पहली बार किया जाएगा। पिछले 35 वर्षों से चीन के संविधान में लिखा गया था कि राष्ट्रपति 5 साल के 2 कार्यकाल तक ही पद पर बने रह सकते हैं। कांग्रेस के पास ही दो तिहाई वोटों से संविधान में संशोधन करने का अधिकार है लेकिन पार्टी के सांसदों ने हमेशा ही सामने रखे गए प्रस्तावों को पारित किया है। 

शी को करीब से जानने वाले भी उनके बढ़ते कद से चकित हैं। 1989 के तियानमेन चौक पर भारी विरोध प्रदर्शनों के दौरान हटाए गए पार्टी लीडर झाओ जियांग के सलाहकार रहे वू वी ने कहा, 'मैं हमेशा सोचता था कि शी अपना 3 या 4 कार्यकाल पूरा करना चाहेंगे और एक नया प्रेजिडेंशल सिस्टम बना सकते हैं। लेकिन मैंने यह नहीं सोचा था कि संविधान में इतनी जल्दी संशोधन हो जाएगा।' 

उन्होंने आगे कहा कि संविधान में इतने बड़े बदलाव से पहले देशभर की जनता की राय भी ली जानी चाहिए थी। शी ने पार्टी के भीतर और बाहर संभावित विरोधियों को दबाने के लिए तेजी से गुप्त और धमकी भरी रणनीति अपनाई। उन्होंने पहले से चली आ रही उस प्रथा को भी खत्म कर दिया, जिसके तहत संविधान में संशोधन के लिए पहले के नेता आम सहमति बनाने के लिए सम्मेलनों का आयोजन किया करते थे। उन्होंने संशोधनों का मसौदा तैयार करने और उसे सहयोग करने के लिए अपने वफादारों को तैनात किया। 

खास बात यह है कि संविधान में बड़े बदलाव की यह पूरी प्रक्रिया उन्होंने पार्टी की कड़ी निगरानी में रखी। इस दौरान उन्होंने बहस के मौके कम दिए, यहां तक कि आंतरिक चर्चा भी नहीं होने दी। बताया जा रहा है कि शी ने औपचारिक तौर पर संविधान में संशोधन करने का प्रस्ताव 5 महीने पहले रखा। एक अधिकारी ने बताया कि 25 पार्टी नेताओं की परिषद (पोलितब्यूरो) की 29 सितंबर को हुई बैठक के दौरान शी ने यह बात रखी थी। गौरतलब है कि पोलितब्यूरो को सेंट्रल कमिटी से भी ज्यादा शक्तिशाली माना जाता है। 

एक पूर्व अधिकारी ने बताया, 'लेकिन उन्होंने तुरंत कार्यकाल की सीमा हटाने की संभावना पर चर्चा नहीं की। शी चाहते थे कि किसी तरह का गलत संदेश न जाने पाए। शी ने धीरे-धीरे प्रांत और सिटी स्तर पर अपने इस विचार के पक्ष में लोगों की एक टीम खड़ी कर ली।' इसकी जानकारी रखने वाले पूर्व अधिकारी ने दंड मिलने के डर से अपना नाम जाहिर नहीं होने की शर्त पर यह जानकारी दी। 

इसी बैठक में पोलितब्यूरो अपने ही एक सदस्य सुन झेंगकई को हटाने पर सहमत हो गया जबकि एक समय उन्हें शी के उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जा रहा था। भ्रष्टाचार के आरोपों में उनकी कुर्सी चली गई। दूसरे पार्टी अधिकारियों के लिए यह एक बड़ी चेतावनी थी, जो महत्वाकांक्षी थे। गौरतलब है कि इससे पहले जब भी संवैधानिक संशोधन चीन में हुए, उसमें काफी लंबी प्रक्रिया अपनाई गई और जनता में चर्चा भी हुई। 

शी से पहले हू चिंथाओ ने कम महत्व के संवैधानिक बदलावों के लिए 15 महीने का समय लिया था। इस दौरान खुली बहस हुई और कई बुद्धिजीवियों को अपनी बात रखने के मौके दिए गए। इसके उलट शी ने पहली बार दिसंबर में घोषणा की कि वह संवैधानिक बदलाव चाहते हैं। इतना ही नहीं, नैशनल पीपल्स कांग्रेस का सत्र शुरू होने से केवल 8 दिन पहले जनता को बताया गया कि इन संशोधनों में राष्ट्रपति के कार्यकाल की सीमा भी शामिल है। 

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