चाबहार पोर्ट पर भारत की पकड़ होगी कमजोर?
ईरान में एक दूरदराज का बंदरगाह भारत और चीन के बीच भू-राजनीतिक तनाव की अगली वजह हो सकता है।


तेहरान : ईरान में एक दूरदराज का बंदरगाह भारत और चीन के बीच भू-राजनीतिक तनाव की अगली वजह हो सकता है। भारत 50 करोड़ डॉलर की लागत से रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण माने जाने वाले ईरान के चाबहार पोर्ट का विकास कर रहा है लेकिन लगातार देरी की वजह से ईरान ने अब चीन का रुख कर लिया है ताकि निर्माण में तेजी लाई जा सके।

ईरान की राजधानी तेहरान से 1 हजार 800 किलोमीटर दूरी पर स्थित चाबहार पोर्ट के निर्माण में सबसे पहले भारत ने साल 2003 में दिलचस्पी दिखाई थी। 'ब्लूमबर्ग' की रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च महीने में ईरान के विदेश मंत्री जावेद जरीफ ने इस्लामाबाद का दौरा किया। इस दौरान जरीफ ने कहा कि चाबहार पोर्ट के निर्माण में चीनी और पाकिस्तानी निवेश का ईरान स्वागत करेगा। जरीफ ने इस दौरान चीन द्वारा बनाए जा रहे ग्वादर पोर्ट का भी उदाहरण दिया। ग्वादर पोर्ट को चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बेल्ट ऐंड रोड पहल का शोकेस भी माना जाता है। 

ईरान के लिए यह बदलाव समझ में आता है, जो चाबहार पोर्ट को एक आर्थिक सफलता के तौर पर सुनिश्चित करना चाहता है। हालांकि, यह भारत के लिए एक रणनीतिक हार हो सकती है, जो कि हिंद महासागर में चीन के विस्तार का विरोध करता रहा है। भारत इस बात पर भी चिंता जता चुका है कि ग्वादर पोर्ट का इस्तेमाल चीन एक दिन सैन्य अड्डे के तौर पर भी कर सकता है। इनके अलावा म्यांमार से बांग्लादेश और वहां से श्री लंका तक चीन की मदद से बन रहे बंदरगाह भारत की परेशानी बने हुए हैं। 

ऑस्ट्रेलियाई नैशनल यूनिवर्सिटी के नैशनल सिक्यॉरिटी कॉलेज के सीनियर रिसर्च फेलो डेविड ब्र्यूस्टर कहते हैं, पेइचिंग से किसी भी तरह का औपचारिक निवेश भारत के लिए चाबहार में निवेश करने के रणनीतिक लाभ को कमजोर करेगा। अगर चीन बंदरगाह के संचालन में नहीं भी शामिल होता है तो भी वह स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर भारत के प्रभाव को कम करने का काम कर सकता है। उन्होंने आगे कहा, 'यह बंदरगाह संभवतः भारतीय गतिविधियों की निगरानी के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है।' 

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन थिंक टैंक में फेलो मनोज जोशी कहते हैं, 'चीन ईरान में रेलमार्ग का निर्माण करगा और उसने देश में बहुत ज्यादा निवेश किया है। ईरान में भारत से ज्यादा चीन की पैठ है।' 

ग्वादर पोर्ट अथॉरिटी के चेयरमैन दोस्तेन खान जमलदिनी ने फोन पर कहा, 'ईरान के निवेश के प्रस्ताव का पाकिस्तान में स्वागत किया गया था। यह पहली बार है जब ईरान की तरफ से सकारात्मक बयान दिया गया हो।' इतना ही नहीं दोनों देशों के बीच ग्वादर और कराची पोर्ट को ईान के चाबहार और बांदर पोर्ट से जोड़ने के लिए फेरी सेवा शुरू करने को लेकर भी चर्चा चल रही है। 

इन दोनों देशों के बंदरगाहों को लेकर सहयोग असहज हो सकता है। भारत और पाकिस्तान ऐतिहासिक शत्रु हैं जिन्होंने कई युद्ध भी लड़े हैं। जबकि भारत और चीन के बीच दक्षिण एशिया में भू-राजनीतिक प्रभुत्व को लेकर संघर्ष जारी है। लेकिन फिर भी ईरान के लिए बंदरगाह का विकास सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। 

भारत के लिए क्यों अहम है चाबहार? 
बता दें कि इस बंदरगाह के जरिए भारत अब बिना पाकिस्तान गए ही अफगानिस्तान और फिर उससे आगे रूस और यूरोप से जुड़ सकेगा। अभी तक भारत को अफगानिस्तान जाने के लिए पाकिस्तान होकर जाना पड़ता था। चाबहार पोर्ट का एक महत्व यह भी है कि यह पाकिस्तान में चीन द्वारा चलने वाले ग्वादर पोर्ट से करीब 100 किलोमीटर ही दूर है। चीन अपने 46 अरब डॉलर के के चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे कार्यक्रम के तहत ही इस पोर्ट को बनवा रहा है। चीन इस पोर्ट के जरिए एशिया में नए व्यापार और परिवहन मार्ग खोलना चाहता है। 

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