बेलहर के बीच मोदी का चेहरा
17वीं लोकसभा



प्रेम शर्मा 
निश्चित तौर पर इस बार कोई लहर नही है। मतदान का अंतिम चरण उल्टी गिनती गिन रहा है। विपक्षी कई हिस्सों में विभाजित है। प्रधानमंत्री पद के लिए कोई स्पष्ट चेहरा जनता के सामने नही है। इसका पूरा पूरा फायदा उठाने के लिए भाजपा ऐड़ी चोटी का जोर लगाए है। ऐसे में भाजपा गठबंधन का सुस्पष्ट रूप से प्रधानमंत्री पद पर एक बार फिर मोदी को बागडोर सौपने का निर्णय निश्चित तौर से विपक्षियों के लाख दावों के बावजूद ताकत दे रहा है। 17वीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव की कमी या खासियत यह है कि इस बार किसी की लहर नहीं है। जनता का रुझान भी स्पष्ट नहीं है। किसी भी दल या गठबंधन की जीत को लेकर कोई दावा करना मुश्किल है। इसलिए कई नेता किसी चुनाव पूर्व मोर्चे को स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति के लिए अभी से तैयारी करने लगे हैं। उन्हें लगता है कि नतीजों से पहले ही कुछ अंडरस्टैंडिग बना ली जाए ताकि बाद में आसानी हो। ऐसा सोचने वालों में वे क्षेत्रीय नेता सबसे आगे हैं जो किसी भी गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं। चुनाव की तारीखों की घोषणा के पहले से ही वे एक तीसरा विकल्प बनाने की कोशिश करते रहे हैं। जैसे, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने सोमवार को डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन से मुलाकात की। कुछ समय पहले वे केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन से भी मिले थे। फिलहाल बंगाल में जो घटनाक्रम चल रहा है वह इस बाॅत का संकेत कर रहा है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हर हाल में मोदी को रोकने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। कोलकाता में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से राव ने पिछले साल बात की थी। उनकी पूरी कोशिश है कि एक गैर-बीजेपी, गैर-कांग्रेस मोर्चा बने और वही केंद्र में सत्ता संभाले। लेकिन उन्हें भी इस बात का पूरा अंदाजा है कि क्षेत्रीय पार्टियां अपने दम पर सरकार नहीं बना पाएंगी। अब तक तीसरे मोर्चे की जो भी सरकारें बनी हैं, उन्हें कांग्रेस का और उससे पहले बीजेपी और लेफ्ट पार्टियों का समर्थन हासिल रहा है, हालांकि वे अल्पजीवी ही सिद्ध हुईं। जहां तक कांग्रेस का प्रश्न है तो उसने खुद को बीजेपी के विकल्प के रूप में पेश किया है और कई क्षेत्रीय दलों के साथ समझौता किया है, इस अलिखित शर्त के साथ कि बहुमत मिलने पर राहुल गांधी ही प्राइम मिनिस्टर होंगे। इन दलों के नेताओं, जैसे डीएमके के स्टालिन और आरजेडी के तेजस्वी यादव ने समय-समय पर इसकी पुष्टि भी की है। ऐसे में कांग्रेस से तीसरे मोर्चे को समर्थन देने की अपेक्षा करना अभी के लिए ज्यादती है। पार्टी के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने कह भी दिया है कि जो पार्टियां कांग्रेस के साथ नहीं है, वे उसके समर्थन की अपेक्षा न करें। कांग्रेस शायद यह उम्मीद कर रही है कि यूपीए के बहुमत से थोड़ी दूर रह जाने पर क्षेत्रीय दल उसे अपना समर्थन दे देंगे। उधर बीजेपी ने भी संकेत दिया है कि अगर सीटें कम पड़ीं तो वह साथियों के सहयोग से सरकार बना लेगी। वक्त आने पर भाजपा यूपी के गठबंधन में तोड़फोड करके बसपा को अपने साथ मिला सकती है। साथियों से उसका मतलब ऐसे दलों से हैं, जो एनडीए में नहीं हैं। यानी क्षेत्रीय दलों का समर्थन दोनों गठबंधनों के राडार पर है। शायद इसीलिए केंद्र सरकार ने इधर ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से संबंध सुधारने की कोशिश की है। उसे लगता है कि जरूरत पड़ने पर नवीन पटनायक, के. चंद्रशेखर राव और जगनमोहन रेड्डी उसका साथ दे सकते हैं। सच यह है कि ये तीनों नेता संख्याबल देखकर ही कोई निर्णय करेंगे क्योंकि केंद्र से नजदीकी इन्हें क्षेत्रीय राजनीति में मजबूत बनाएगी। छह चरणों के चुनाव हो चुके हैं और अब महज आखिरी चरण का मतदान बाकी रह गया है। वह भी चार दिन बाद हो जाएगा। आखिरी चरण में सिर्फ 59 लोकसभा सीटों के चुनाव होने हैं। 484 लोकसभा सीटों के मतदाता अपना फैसला सुना चुके हैं। अलग-अलग राज्यों से जो संकेत हैं, उनके जरिए यह कहा जाने लगा है कि यूपी का फैसला ही 17वीं लोकसभा का भाग्य तय करेगा। यूपी में लड़ाई बिल्कुल सीधी है। एक तरफ बीजेपी नीत एनडीए है और दूसरी तरफ एसपी-बीएसपी नीत महागठबंधन। 2014 की तरह इस बार भी यूपी के जनादेश के बिल्कुल स्पष्ट आने की संभावना है। कोई किंतु-परंतु नहीं दिखाई दे रहा है। यूपी जिसके साथ होगा, खुलकर होगा और यही 2019 की सत्ता तक पहुंचने के ख्वाहिशमंद दलों के लिए टर्निंग पॉइंट भी होगा। छठे चरण के बाद सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण चरण में यूपी पर सबकी नजर है। पिछले चुनाव में एक छत्र बहुमत पाने वाली भाजपा को इस बार उत्तर प्रदेश में गड़बड़ी नजर आ रही हैं इसकी भरपाई वह पश्चिम बंगाल से करती दिख रही है। एसपी-बीएसपी गठबंधन के बाद राज्य में दलित-मुसलमान-यादव के एक साथ आने की बात कही जा रही है। यही समीकरण बीजेपी के लिए 2014 को दोहराने के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़ा है। 2014 के चुनाव में बीजेपी ने 80 सीट वाले राज्य में विपक्ष का सूपड़ा साफ कर दिया था। 71 सीट पर खुद जीत दर्ज की थी और दो पर उसके सहयोगी जीते थे। बाकी में सात में पांच सीट एसपी और दो कांग्रेस के हिस्से गई थीं। बीएसपी का उस चुनाव में खाता भी नहीं खुल पाया था। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी के हाथ कुछ इसी तरह पिटने के बाद एसपी-बीएसपी ने अपने राजनीतिक वजूद को बचाने के लिए ढाई दशक पुराने गिले-शिकवे को भुलाकर साथ चलने का फैसला किया। जब दोनों दलों के बीच गठबंधन हुआ तो यह कहा जा रहा था कि एसपी-बीएसपी के वोट बैंक का एक दूसरे को ट्रांसफर होना बहुत मुश्किल काम है। जमीनी स्तर की राजनीतिक सचाई के मद्देनजर संभावना जताई जा रही थी कि यादव जहां एसपी के उम्मीदवार होंगे, वहां तो गठबंधन को वोट करेंगे लेकिन बीएसपी उम्मीदवारों को उनका वोट जाना बहुत मुश्किल है। इसी तरह दलित वोटर्स के लिए कहा जा रहा था कि उनके लिए यादवों से अपनी पुरानी अदावत को भूल जाना आसान नहीं होगा। मुस्लिम वोटबैंक को लेकर यह धारणा थी कि उसकी पहली प्राथमिकता बीजेपी को हराना होगी, इसलिए उसे जहां-जहां कांग्रेस का उम्मीदवार मजबूत दिखेगा, वह कांग्रेस को शिफ्ट हो सकता है। यानी कि इस गठबंधन के जरिए एक ऐसी तस्वीर की कल्पना की जा रही थी जहां नेताओं के हाथ मिलाने के बावजूद उनके वोटर्स के दिलों की दूरी दिख रही थी। कहा जा रहा था कि यही फैक्टर बीजेपी की मुश्किल को खत्म कर देगा, लेकिन जब मतदान के चरण शुरू हुए और धीरे-धीरे आगे बढ़ते गए तो ये तमाम शंकाएं निर्मूल साबित होती गईं। पाया गया कि एसपी-बीएसपी का वोट एक दूसरे को ट्रांसफर हो रहा है। ऐसे में यह माना जा रहा है कि भाजपा  के लिए यूपी में खतरा है। इसलिए 23 मई से पहले यकीनी तौर पर ऐसा कुछ नहीं कहा जा सकता कि यूपी किसके साथ है। लेकिन इतना तय है कि वह जिसके साथ होगा, दिल्ली की सत्ता पर दावा उसका ही मजबूत होगा।वाकई 
किसी ब्लॉक बस्टर फिल्म की तरह इस चुनावी ब्लॉक बस्टर की कहानी अब क्लाइमैक्स की ओर बढ़ रही है। सात चरणों में 17वें आम चुनाव का छठा चरण पूरा हो गया है और 19 मई को सातवें और अंतिम चरण के साथ ही दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का यह महोत्सव संसद चुनाव संपन्न हो जाएगा। लोकसभा की कुल 543 सीटों के लिए हो रहे चुनावी महासमर के छह चरणों के बाद अंतिम और सातवें चरण के लिए आठ राज्यों की सिर्प 59 सीटें शेष रह गई हैं। इनमें पधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हाई पोफाइल वाराणसी सीट भी शामिल है। छठे चरण के मतदान के बाद विभिन्न पार्टियां अपनी जीत के दावे करती नजर आ रही हैं। भाजपा ने वर्ष 2014 में पहली बार स्पष्ट बहुमत हासिल कर 543 सीटों में से 282 सीटें जीती थीं। लिहाजा भाजपा अध्यक्ष इस बार कम से कम 337 सीटें आने की उम्मीद कर रहे हैं। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने शनिवार को दावा किया कि 23 मई को जब लोकसभा चुनाव के परिणाम आएंगे तब पधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का गुब्बारा फट जाएगा। बहरहाली अगर भाजपा बहुमत से दूर रह जाती है तो गठबंधन का नेता कौन होगा ?  पार्टियों का फैसला करना है कि उनका नेता कौन होगा? लोकतंत्र का महोत्सव जारी है, पिक्चर अभी बाकी है। इसके बाद भी यह कहने में कोई गुरेज नही है कि यह चुनाव पूरी तरह से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर केन्द्रित दिख रहा है। परिणामों के बारे में अभी कुछ कहना उचित नही होगा लेकिन धुंधली तस्वीर में फिलहाल मोदी ही नजर आ रहे है। 

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