कर्नाटक की राजनीति में लिंगायतों की क्यों है इतनी अहमियत? जानें वजह...
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1950 के दशक के शुरुआती दौर में जब 'कर्नाटक एकीकरण आंदोलन' अपने अर्श पर था, उस दौरान आगे की रणनीति बनाने के लिए वोक्कालिगा जाति के शीर्ष नेता मध्य बेंगलुरु में इकट्ठा हुए. वे सभी कांग्रेस नेता थे और उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था. उनमें से अधिकतर काफी अच्छी छवि वाले थे, लेकिन उनमें से अधिकतर नेता ये नहीं चाहते थे कन्नड़ भाषी पूरे क्षेत्र का एक प्रशासन के तहत एकीकरण हो.

उनका तर्क था कि 'महाराजा का मैसूर' या 'पुराना मैसूर' अपने आप में काफी विकसित है और मुम्बई-कर्नाटक या हैदराबाद-कर्नाटक, जो कि पिछड़ा हुआ और गरीब था, उसको इसमें शामिल करने पर पुराने मैसूर के संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा. उन्हें चिंता थी कि अगर पूरे कन्नड़ भाषी क्षेत्र का एकीकरण किया जाएगा तो वोक्कालिगा का आधिपत्य कम हो जाएगा और लिंगायत का वर्चस्व बढ़ जाएगा. ये दोनों जातियां एक दूसरे के प्रभाव को वर्चस्व को लेकर चिंतित थीं.

हालांकि पुराने मैसूर राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री केंगल हनुमथैया पूरे कन्नड़ भाषी राज्य का एकीकरण चाहते थे. स्वतंत्रता सेनानी रहे और एक सक्षम प्रशासक, हनुमथैया वोक्कालिगा के बड़े नेता थे. अपनी ही जाति के नेताओं के खिलाफ वीटो करते हुए हनुमथैया ने कहा था कि जातिगत या राजनीतिक कारणों से अगर कर्नाटक के एकीकरण का विरोध किया जाएगा तो आने वाली पीढ़ी उन्हें कभी भी माफ नहीं करेंगी. उन्होंने अपने प्रभाव व शक्ति का प्रयोग किया, जिससे 1 नवंबर 1956 को बांबे प्रेसीडेंसी व मद्रास प्रेसीडेंसी के कन्नड़ भाषी क्षेत्रों के अतिरिक्त बाकी के कन्नड़ भाषी क्षेत्रों को मिलाकर कर्नाटक का निर्माण हुआ.

अफसोस की बात है इसके बाद केंगल हनुमथैया की सत्ता चली गई और लिंगायत के एक मजबूत नेता एस निजलिंगप्पा ने नए मैसूर राज्य के पहले मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला. जैसा कि उम्मीद थी कि वोक्कालिगा ने लिंगायतों के वर्चस्व के चलते मुख्यमंत्री की कुर्सी खो दी और उन्हें कुर्सी को फिर से पाने के लिए 38 सालों तक इंतजार करना पड़ा. इसके बाद 1994 में, एच डी देवगौड़ा संयुक्त कर्नाटक के पहले वोक्कलिगा मुख्यमंत्री बने.

1994 तक राज्य में या तो लिंगायत मुख्यमंत्री रहा या लिंगायत के समर्थन से कोई मुख्यमंत्री बना. 1983 में रामकृष्ण हेगड़े राज्य के मुख्यमंत्री बने. हालांकि वो ब्राह्मण थे, लेकिन उन्हें लिंगायत नेता माना जाता था. हेगड़े के शासन को खत्म करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी ने 1989 में लिंगायत नेता वीरेंद्र पाटिल को केपीसीसी की अध्यक्ष और मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार को बनाया. उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने 224 सदस्यीय सदन में 181 सीटें जीतकर बड़ी जीत दर्ज की. लेकिन अक्टूबर 1990 में बेंगलुरु हवाई अड्डे पर राजीव गांधी द्वारा अप्रत्याशित तौर पर उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटा दिए जाने के बाद लिंगायत एक बार फिर कांग्रेस से दूर होने लगे. 1994 में, लिंगायत और वोक्कालिगा की संयुक्त ताकत ने कांग्रेस को समाप्त कर दिया. कांग्रेस तत्कालीन मुख्यमंत्री एम वीरप्पा मोइली की अगुवाई में केवल 36 विधानसभा सीटें ही जीत पाई.

इससे साबित होता है कि लिंगायतों के समर्थन के बिना कर्नाटक में कोई भी राजनीतिक दल वास्तव में सत्ता में नहीं आ सकता है और अगर आ भी जाएगा तो बिना लिंगायत के समर्थन के लंबे समय तक सत्ता में रह नहीं पाएगा. राज्य के एकीकरण के बाद से लिंगायत पूरी तरह से कर्नाटक के सामाजिक-राजनीतिक जीवन पर हावी हैं. अपनी राजनीतिक और आर्थिक शक्ति के कारण लिंगायत राज्य के सबसे प्रभावशाली वोट बैंक हैं.

बीजेपी के दावे के विपरीत लिंगायत कभी भी बीजेपी का पारंपरिक वोट बैंक नहीं रहा. ये कभी कांग्रेस का भी समर्थक रहा है और समय-समय पर इसने लिंगायत नेताओं का समर्थन किया. अभी कर्नाटक विधानसभा में 45 लिंगायत विधायक हैं. लिंगायत का प्रतिनिधित्व विधानसभा में लगातार घट रहा है, लेकिन उनकी संख्या अभी भी 20-25 प्रतिशत है.

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार लिंगायत करीब 100 विधानसभा व 14 लोकसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका अदा करते हैं. यहां तक कि 89 विधानसभा सीटों वाले वोक्कालिगा के वर्चस्व वाले पुराने मैसूर क्षेत्र में भी लिंगायत 30 विधानसभा सीटों पर काफी निर्णायक होते हैं.

हालांकि लिगायतों का कहना है कि उनकी जनसंख्या राज्य की कुल जनसंख्या के 17 फीसदी से भी अधिक है, लेकिन एक लीक हुई जातिगत जनगणना के अनुसार उनकी संख्या अब घटकर दलितों (19.5 फीसदी) व मुसलमानों (16 फीसदी) से भी कम हो गई है. डाटा में बताया गया कि वोक्कालिगा की जनसंख्या 11 फीसदी है.

सिद्धारमैया द्वारा लिंगायत को एक अलग धर्म का दर्जा दिए जाने की मांग का समर्थन करना राजनीतिक फायदे के लिए किया जाने वाला एक बड़ा निर्णय है. सिद्धारमैया जानते हैं कि सत्ता पाने के लिए लिंगायतों का विश्वास जीतना कितना ज़रूरी है.

जहां वोक्कालिगा की बड़ी संख्या देवगौड़ा की पार्टी जेडीएस का समर्थन कर रही है, वहीं अगर सिद्धारमैया बीजेपी के लिंगायत वोट को अपने पक्ष में कर पाते हैं तो उनकी जीत का रास्ता साफ हो सकता है, लेकिन ये रणनीति काम करेगी कि नहीं ये तो मतगणना वाले दिन ही पता चलेगा.



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