लेख : अगस्त क्रान्ति की याद
Senior journalist Madukar Trivedi


मधुकर त्रिवेदी

अंग्रेजीराज के खिलाफ विद्रोह और आजादी की लड़ाई में दो तिथियां हमेशा याद रहेगी। सन् 1857 में पहली विद्रोह की चिंगारी फूटी थी। इसकी पूर्णाहुति 1942 में हुई जब गांधी जी ने 09 अगस्त को मुम्बई में ‘करो या मरो‘ का मंत्र दिया। अंग्रेजो को ‘ भारत छोड़ों‘ की यह अंतिम चेतावनी थी। फलस्वरूप देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हो सका। भारत छोड़ों आन्दोलन को अगस्त क्रान्ति के नाम से भी याद किया जाता है। 

उन दिनों दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया था। जापान दक्षिण पूर्व एशिया में जीत पर जीत दर्ज कर  रहा था। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जर्मनी, जापान के साथ सैन्य अभियान में शामिल थे। आजाद हिंद फौज के प्रति देश में भावात्मक लगाव था। उन दिनों ब्रिटेन में चर्चिल की सरकार थी जो भारत की आजादी के बारे में सोचना भी नहीं चाहती थी। क्रिप्स मिशन के माध्यम से भारत का समर्थन युद्ध प्रयासों में प्राप्त करने के प्रस्तावों से देश में निराशा और क्षोभ का वातावरण था। मंहगाई ने लोगों की कमर तोड़ दी थी। इस बीच अमरीकी सेनाएं भी भारत में आ गई थी। 5 जुलाई 1942 को गांधी जी ने हरिजन में लिखा ‘ अंग्रेजों भारत जापान के लिये मत छोड़ों लेकिन भारत को भारतीयों के लिये व्यवस्थित रूप से छोड़ जाओं।‘ 

08 अगस्त 1942 को भारतीय नेशनल कांग्रेस कमेटी की बैठक मुम्बई में हुई। इसमें यह निर्णय किया गया कि भारत अपनी सुरक्षा स्वयं कर सकता है। अंग्रेज भारत छोड़ दें। उनके जाने के बाद अस्थाई सरकार बनेगी। ब्रिटिश सरकार को हटाने के लिये नागरिक अवज्ञा आन्दोलन छेड़ा जायेगा। इसके नेता गांधी जी होंगे। मुम्बई के ऐतिहासिक ग्वालिया टैंक में इस भारत छोड़ों प्रस्ताव के अंत में कहा गया था कि देश ने साम्राज्यवादी सरकार के विरूद्ध अपनी इच्छा जाहिर कर दी है। अब उसे उस बिन्दु से लौटाने का कोई औचित्य नहीं है। अतः कांग्रेस अहिंसक ढंग से, व्यापक धरातल पर गांधी जी के नेतृत्व में जनसंघर्ष शुरू करने का प्रस्ताव शुरू करती है।

गांधी जी ने इस प्रस्ताव पर 70 मिनट तक अपने विचार रखे। उन्होंने वहां उपस्थित हजारों लोगों के बीच कहा-‘ मैं आपको एक मंत्र देता हॅू, करो या मरो।‘ जिसका अर्थ था भारत की जनता आजादी के लिये हर ढंग से प्रयास करें और इसके लिये अपनी कुर्बानी भी दें। उन्होंने कहा वह लोग जो कुर्बानी नहीं दे सकते हैं, आजादी नहीं पा सकते हैं। 08 अगस्त का प्रस्ताव पारित होते ही ब्रिटिश सरकार हरकत में आ गई। 09 अगस्त 1942 की सुबह तड़के ही गांधी जी सहित कांग्रेस के बड़े नेताओं गिरफ्तारी शुरू हो गई। कांग्रेस को गैर कानूनी संस्था घोषित कर दिया गया। जुलूसों पर रोक लगा दी गई। 

गांधी जी ने यह भी कहा था कि जब नेताओं को पकड़ लिया जाएगा तो प्रत्येक भारतीय अपने को नेता मानकर बलिदान देगा। इस सूत्र वाक्य को पकड़कर अगस्त क्रान्ति की अगुवाई करने समाजवादी विचारधारा वाले नौजवान आगे आए। श्री जयप्रकाश नारायण, डाॅ0 राममनोहर लोहिया, अरूणा आसफ अली की टोली ने भूमिगत आन्दोलन से ब्रिटिश सरकार की नीदें हराम कर दी। सरकार ने दमन चक्र चलाया तो जनता ने फिर उग्र प्रदर्शन के साथ रेल पटरियां उखाड़ने और स्टेशनों में आग लगाने की कार्यवाहियां शुरू कर दीं। बलिया, बस्ती, सतारा, मिदनापुर, में अस्थायी सरकारें तक स्थापित हो गई। मुम्बई में ऊशा मेहता और डाॅ0 लोहिया ने आजाद कांग्रेस रेडियों से प्रसारण कर नौजवानों में नई चेतना जगाई। यह प्रसारण 03 सितम्बर 42 से 11 नवम्बर 42 तक ही चल सका।

यहां यह उल्लेख असंगत न होगा कि गांधी जी का मन तो आजादी की आखिरी लड़ाई के लिये छटपटा रहा था किन्तु उसके तौर तरीकों को लेकर वे बराबर ऊहापोह में थे। हां, अहिंसा उनके लिये सर्वोपरि थी। अराजकता होने पर भी हिंसा न होने की शर्त थी। लेकिन सरकार ने आन्दोलन के प्रस्ताव के साथ ही भयंकर दमनचक्र शुरू कर दिया था। जनता नेतृत्वविहीन थी। ऐसे में कांग्रेस में शामिल समाजवादी विचारधारा के नौजवान ही आगे आए। वस्तुतः अगस्त 1942 में मुम्बई के कांग्रेस अधिवेशन के दौरान कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में आगामी संघर्ष के स्वरूप पर भी चर्चा चली थी। 

‘कांग्रेस रिस्पांसिबिलिटी फार दि डिस्टर्बेसिस 1942‘ सरकारी प्रकाशन में गांधी जी को अगस्त में हुई अराजकता के लिये दोषी ठहराते हुये कहा गया था कि इस दौर में जो हिंसा, तोड़फोड़, लूट हुई उसके पीछे सोशलिस्ट थे। सरकार ने माना था कि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव जयप्रकाश नारायण के हजारी बाग जेल तोड़कर भाग जाने के बाद आन्दोलन उग्र और क्रान्तिकारी बन गया था। प्रखर समाजवादी नेता श्री मधु लिमये ने ‘ अगस्त क्रान्ति का बहुआयामी परिदृश्य‘  पुस्तक में एक शोधकर्ता मैक्स हरकोर्ट का उल्लेख किया है, जिसके अनुसार प्रथम पंक्ति के नेताओं की गिरफ्तारी के बाद दूसरी पंक्ति के सोशलिस्ट नेताओं ने नेतृत्व सम्भाला। ये लोग इसलिये प्रभावकारी साबित हुये क्योंकि इन्होंने स्थितियों का पूर्वानुमान लगाया था और वे क्रान्ति के लिये तैयार थे। विद्रोह के पीछे दो मुख्य शक्तियां थी। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी और किसान सभा। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने ही किसान सभा को जमींदारी उन्मूलन का कार्यक्रम अपनाने की सलाह दी थी और इसने जनता को आकृष्ट किया। इन दोनों ने ही अगस्त आन्दोलन को जनता की क्रान्ति बनाया। 

मैक्स हरकोर्ट ने यह भी लिखा कि 1942 का आन्दोलन 1857 के विद्रोह की भी याद दिलाता है। 1857 में विद्रोहियों ने सत्ता के पारम्परिक ढांचे की स्थापना का ही प्रयास किया था अर्थात सत्ता स्थानीय राजा-जमींदारों के हाथों में सौंप दी गयी थी। 1942 के सेनानी सुगठित और अनुशासित राजनैतिक पार्टी के साथ जुड़े थे। इस विद्रोह में अंतर क्षेत्रीय चेतना थी जो शुद्ध पारम्परिक विद्रोह में साधारण तौर पर नहीं होती है। 

अगस्त आन्दोलन की व्यापकता ने लंदन में बैठी अंग्रेज सरकार की चूलें हिला दी थी। विश्व में भी इस आन्दोलन की गूंज सुनाई दे रही थी। एक अवधारणा बनी कि अंग्रेजों ने शासन का वैध अधिकार खो दिया है। चीन के तत्कालीन राष्ट्रपति च्यांगकाई शेक ने भारत की स्वतंत्रता की पैरवी की जिससे अमरीकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट भी सहमत हुये। 

इस दौरान दो उल्लेखनीय घटनाएं और हुईं। ब्रिटिश सरकार ने 13 फरवरी 1943 को कांग्रेस और गांधी जी पर अगस्त आन्दोलन के दौरान की हिंसक घटनाओं का दोष मढ़ दिया। गांधी जी ने इसका प्रतिवाद करते हुये घटनाओं की निष्पक्ष जांच की मांग की। 10 फरवरी 1943 से गांधी जी उपवास पर बैठ गये। इस बीच वायसराय कौंसिल से कई सदस्य विरोध स्वरूप हट गये। उधर ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार भी बन गई थी जो भारत की आजादी की पक्षधर थी। अंततः भारत 15 अगस्त को आजाद तो हुआ लेकिन ब्रिटिश कूटनीति ने आजादी को खंडित कर जिन्ना के द्विराश्ट सिद्धांत को मानकर पाकिस्तान का भी निर्माण करा दिया। 

अगस्त क्रान्ति के प्रभाव का मूल्यांकन और अधिक शोध के साथ किये जाने की जरूरत है। जवाहर लाल नेहरू के एक आंकड़े के अनुसार सन् 1942 में 60 हजार से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया। 10 हजार लोग मारे गये। लेकिन जनपदों के सुदूर क्षेत्रों में तत्कालीन सरकार के उत्पीड़न के शिकार बहुतों की कहानी अनकही रह गयी है। जेल यातना में कितने ही परिवार बिखर गए थे। 

डॉ राममनोहर लोहिया अगस्त क्रान्ति को बेहद महत्वपूर्ण मानते थे। उन्होंने 2 अगस्त 1967 को डॉ जी. जी. पारीख को लिखे गये पत्र में कहा था ‘15 अगस्त राज्य दिवस है, 09 अगस्त जनदिवस है। कोई दिन जरूर आएगा जब 09 अगस्त के सामने 15 अगस्त फीका पड़ेगा और हिन्दुस्तान अमेरिका के 4 जुलाई और फ्रांस के 14 जुलाई जो वहां जनदिवस है, उसी प्रकार 09 अगस्त को मनाएगा। अगस्त क्रान्ति की 75 वीं वर्षगाँठ पर हम उनका श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं, जिनके बलिदानों से हम आज संप्रभुराष्ट्र की खुली हवा में सांस ले रहे हैं।

........(लेखक यशभारती सम्मान प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार है)


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