OPINION: नवीन पटनायक को हराने कि लिए बीजेपी अपनाएगी 1997 की रणनीति!
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(संदीप साहू)

20 जुलाई को मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के दौरान जब  नवीन पटनायक  की पार्टी बीजेडी के सांसद, संसद से वॉक आउट कर गए तो पुराने सहयोगियों के एक-दूसरे के नज़दीक आने की गहमागहमी बढ़ गई.  लोगों द्वारा इस बात का अंदाज़ा लगाया जाना गलत भी नहीं था क्योंकि इसके पहले संकेत मिलने लगे थे कि दोनों पार्टियां चुनाव के पहले या बाद में एक-दूसरे के नज़दीक आ सकती हैं.

दोनों राज्य के स्तर पर एक-दूसरे के साथ काफी सहयोगात्मक रवैया अपनाए हुए थे. यहां तक कि संसद में भी दोनों ने लगभग हर मुद्दे पर एक-दूसरे का समर्थन किया. लेकिन सिर्फ दो महीने बाद कहानी बदल गई. बीजेपी जो कि समझ रही थी कि बीजेडी लगातार पांचवी बार चुनाव जीतने जा रही है, वो दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों के साथ मिलकर नवीन पटनायक सरकार को हटाना चाहती है.

बीजेपी उन नेताओं के साथ हाथ मिला सकती है जो हाल ही में जो पार्टी से निकाले गए हैं या जिन्होंने पार्टी छोड़ दी है. ये नेता बीजेडी के विरोध में आ गए हैं. यही तरीका 1997 में बीजू पटनायक के निधन के बाद भी बीजेपी ने अपनाया था, जब जनता दल में टूट के बाद बीजेडी का जन्म हुआ और एक नई पार्टी के साथ टाइ-अप करके 1998 का चुनाव लड़ा. गठबंधन ने 21 लोकसभा सीटों में से 16 सीटें जीत लीं.

जिन पांच वरिष्ठ नेताओं को पटनायक ने बाहर का रास्ता दिखाया था वो लोग जल्दी ही आपस में मिलकर नई पार्टी का गठन कर सकते हैं. सूत्रों के अनुसार इन पांच नेताओं में पूर्व मंत्री प्रफुल्ल घडाई, बिजॉय मोहापात्रा, दिलीप रे, विजयंत जे पांडा और डॉ दामोदर राउत हैं.

पटनायक ने घोटाले का आरोप लगने के बाद दामोदर राउत को पार्टी से निकाल दिया था. ये सारे नेता लंबे समय से बीजेडी में रहे हैं. आगे की रणनीति ये है कि इन नेताओं को ही बीजू जनता दल का वास्तविक उत्तराधिकारी घोषित किया जाए. दूसरी खास बात है कि ये सारे के सारे नेता राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण तटीय इलाकों से संबंधित हैं जहां पर आज तक बीजेडी का दबदबा है. पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी को 77 में से 68 सीटें मिली थीं और लोकसभा की सारी सीटें बीजेडी के ही खाते में गई थीं. लाख कोशिशों के बावजूद भी बीजेपी इसमें सेंध नहीं लगा पाई. इसलिए अब बीजेपी क्षेत्रीय पार्टियों की मदद से वो करना चाहती है जो वो खुद से नहीं कर पाई.

लेकिन ये इतना आसान नहीं है. भले ही पटनायक की प्रसिद्धि पिछले 18 सालों से सरकार रहने के कारण घट रही हो लेकिन इसके बावजूद लगातार पटनायक लगातार अपने विरोधियों को हराते आए हैं. दूसरी बात कि अब परिस्थितियां 1997 वाली नहीं रहीं. हालांकि भले ही बीजेडी में कई नेताओं में असंतोष का भाव है लेकिन इस बात में संदेह है कि वो लोग किसी ऐसे विरोधी दल के साथ मिलना चाहेंगे जिसका भविष्य अभी अनिश्चित है. फिर दूसरा सवाल ये भी है कि इतने कम समय में पार्टी बनाने की सारी औपचारिकताएं पूरी हो पाएंगी और पार्टी बना भी ली जाती है तो क्या लोगों को अपने पक्ष में किया जा सकेगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं)


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