OPINION: आंतरिक कलह के बीच MP में कांग्रेस को सत्ता दिला पाएगा राहुल का 'सॉफ्ट हिंदुत्व'?
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मध्य प्रदेश में चुनावी शंखनाद के लिए राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन यानी 17 सितंबर का दिन चुना और प्रदेश में चुनावी बिगुल फूंक दिया. 21 पंडितों के मंत्रोच्चार और 11 कन्याओं की आरती के बाद शुरू हुए राहुल गांधी के इस रोड शो से यह साफ जाहिर हो गया कि गुजरात की तरह मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस सॉफ्ट हिंदुत्व के मंत्र पर ही चुनाव लड़ेगी.

ऐसे में क्या बीजेपी के गढ़ में कांग्रेस का सॉफ्ट हिंदुत्व का यह कार्ड कामयाब होगा? वह भी ऐसे समय में जब प्रदेश में खुद दिग्गज कांग्रेसियों की आपस में बन नहीं रही है, आंतरिक कलह से पार्टी बिखरी हुई है, कार्यकर्ता निराश और भटके हुए हैं. वे तय नहीं कर पा रहे हैं कि किसे अपना नेता चुनें? ऐसे में मध्य प्रदेश में सॉफ्ट हिंदुत्व के बूते कांग्रेसियों की नैया पार करना राहुल के लिए असंभव नहीं तो मुश्किल जरूर दिखाई देता है. 2014 के लोकसभा चुनाव में महज 45 सीटों पर सिमट गई कांग्रेस पार्टी से छिटके बहुसंख्यक वर्ग को रिझा पाना आसान नहीं है.

दिग्विजय-सिंधिया की जंग?
नर्मदा परिक्रमा कर राज्य में अपना चुनावी गणित सेट करने में लगे पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह चुनाव के नजदीक आते ही पार्टी में हाशिये पर हैं. वहीं ज्योतिरादित्य सिंधिया से उनका मनमुटाव भी किसी से छिपा नहीं है. यही वजह है कि इस मनमुटाव को सीधी जंग में तब्दील होने से बचाने के लिए राहुल गांधी ने कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस कमेटी का चीफ बनाया और प्रदेश की बागडोर उनके हाथ में सौंप दी, ताकि राजा दिग्विजय सिंह और महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया की कलह का असर पार्टी पर न पड़े.

प्रदेश के इन दो दिग्गजों के बीच चल रही जंग के बीच पार्टी ने अभी तक सीएम पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है और कई मंचों पर 'राजा' और 'महाराजा' यह बता चुके हैं कि उनके बीच कोई लड़ाई नहीं है. उनकी लड़ाई सिर्फ बीजेपी से है और इस बार वो साथ मिलकर बीजेपी को हराएंगे.

कब खत्म होगी MP कांग्रेस की आंतरिक कलह?
सिंधिया और दिग्विजय भले ही आलाकमान के सामने एक दूसरे के मनमुटाव को सामने न लाने की बात कहें, लेकिन 17 सितंबर का ही नज़ारा देखने लायक था. दरअसल, इधर राहुल गांधी भोपाल में रोड शो कर रहे थे वहीं दूसरी ओर एक बार फिर से एमपी कांग्रेस की आंतरिक कलह पार्टी के बाहर नजर आ रही थी.

राहुल गांधी की संकल्प यात्रा के लिए दशहरा मैदान में लगे कटआउट में दिग्विजय सिंह गायब थे. जबकि राहुल के साथ कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, विवेक तन्खा, सुरेश पचौरी, अजय सिंह, अरुण यादव और कांतिलाल भूरिया के कटआउट लगे थे. ये कटआउट 25 से 26 फीट के थे. हालांकि इस पर दिग्विजय सिंह ने कहा कि उन्होंने खुद अपने कटआउट लगाने से मना किया था.

सॉफ्ट हिंदुत्व को छोड़ मुद्दे उठाएं राहुल गांधी
2014 में कांग्रेस की करारी हार के बाद पूर्व रक्षामंत्री एके एंटनी ने पार्टी के 45 सीटों पर सिमटने की सबसे बड़ी वजह कांग्रेस से बहुसंख्यक वर्ग की नाराजगी को बताया था. ऐसे में राहुल लगातार इस कोशिश में है कि वे इस नाराज वर्ग को मनाएं. गुजरात में सोमनाथ मंदिर से लेकर, कैलाश मानसरोवर यात्रा और बाद में भोपाल यात्रा के दौरान कई स्थानों पर होर्डिंग में शिव भक्त के रूप में खुद को स्थापित करना एक सीमा तक तो काम कर सकता है लेकिन बीजेपी के गढ़ में सत्ता हासिल करने की गारंटी नहीं.

बीते कुछ महीनों से पार्टी का पूर्णरूप से कार्यभार संभाल रहे राहुल को इस बात को समझना होगा कि जनता के लिए आज भी जरूरी मुद्दे, रोजी-रोटी, रोजगार के हैं. किसानों की कर्ज माफी, महिला सुरक्षा, सांप्रदायिकता के हैं, जिनपर ध्यान देकर राहुल ज्यादा वोट हासिल कर सकते हैं.

आंतरिक कलह को ठीक करें
दूसरी ओर चुनावी तैयारी के बीच सबसे जरूरी चीज है कि राहुल पार्टी के भीतर की खींचतान को रोकें. इस लोकसभा चुनाव में सिर्फ एमपी नहीं, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे कई ऐसे प्रदेश हैं, जहां चुनाव होने हैं और पार्टी आंतरिक कलह से जूझ रही है. इसका फायदा कोई भी दल आसानी से उठा सकता है. राहुल के लिए सबसे जरूरी है कि वे पार्टी की इस कलह को खत्म करें और तमाम दिग्गज नेताओं को एकसाथ लेकर चुनाव की तैयारी में जुटें क्योंकि कई जगहों पर एंटीइनकमबेंसी फैक्टर कांग्रेस के लिए फायदा दे सकता है. बशर्ते राहुल कांग्रेस को जमीनी मुद्दों के साथ जोड़ें और उस टैग लाइन को चरितार्थ करें, जिस पर कांग्रेस अमल करती आई है. कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ.



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