चुनावी सरगर्मी के बीच फेक न्यूज को लेकर अलर्ट EC, कहा- बनना चाहिए कानून
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देश के पांच राज्यों में अगले महीने विधानसभा चुनाव होने हैं. इसके साथ ही लोकसभा चुनाव भी नजदीक हैं. चुनावी सरगर्मी के बीच चुनाव आयोग ने फेक न्यूज से निपटने के लिए कानून की मांग की है. आयोग का कहना है कि कनफ्यूजन को खत्म करने के लिए सीमाओं की जरूरत है.

चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने कहा कि फिलहाल देश में इस तरह का कोई कानून नहीं है. इस वजह से हमेशा कनफ्यूजन की स्थिति बनी रहती है. उन्होंने बताया कि फेक न्यूज से निपटने के लिए अगस्त में चुनाव आयोग ने एक्सपर्ट कमिटी का गठन किया था. इस कमिटी के सुझावों को विधायी समर्थन की आवश्यकता होगी.

लवासा ने कहा, "निश्चित रूप से स्पष्ट परिभाषा और स्पष्ट प्रक्रियाओं की जरूरत है. इस तरह के कानून की अनुपस्थिति एक बाधा है क्योंकि इससे नियंत्रित करने और नियंत्रित होने वालों में कनफ्यूजन बना रहता है. कानून की अनुपस्थिति की वजह से कई बार अनुचित कदम भी उठाए जाते हैं.

इसी के साथ चुनाव आयुक्त ने फेक न्यूज की परिभाषा स्पष्ट न होने पर भी चिंता जाहिर की. उन्होंने न्यूज18 को बताया, "फेक न्यूज के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसे कैसे परिभाषित किया जाए. प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की कुछ परिभाषाएं हैं लेकिन इसके लिए कोई कानून नहीं है."

चुनाव आयोग की यह मांग फेक न्यूज की कई घटनाओं के बाद सामने आई है. इनमें से कुछ अफवाहें तो लोगों की मौत का कारण भी बन गईं. वॉट्सएप और सोशल मीडिया पर फैलाए गए फेक न्यूज की वजह से इस साल मॉब लिंचिंग में कम से कम 28 लोगों की मौत हो चुकी है.

इससे पहले जब फेक न्यूज पर कानून लाने की बात हुई थी तब इस बात पर चिंता प्रकट की गई थी कि इसके जरिेए सरकार संविधान के अनुच्छेद 19 का उल्लंघन कर मीडिया को सेंसर कर सकती है. हालांकि लवासा ने जो कारण गिनाए हैं वह इस तरह का कानून लाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं.

लवासा ने कहा, "फेक न्यूज पर लाया गया कानून गलत तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है, यह बात इस कानून को लाने में बाधा नहीं होनी चाहिए. एक सभ्य समाज में कानून उसे बनाने वालों और नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है."

अन्य देशों में हमेशा फेक न्यूज से निपटने की कोशिशें चलती रहती हैं.

सिंगापुर में फेक न्यूज, इसके कारणों, परिणामों और प्रतिवादों पर विचार-विमर्श करने के लिए एक संसदीय समिति का गठन किया गया है. इस समिति ने देश की सरकार से ऐसा कानून लाने की सिफारिश की जो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को कंटेंट में पारदर्शिता एवं जबावदेही लाने के लिए प्रेरित करे.

जर्मनी ने भी सोशल मीडिया कंपनियों पर उस कंटेंट को हटाने के लिए दबाव डाला जो उनके देश के क्रिमिनल कोड का उल्लंघन करता है. वहां सेंसरशिप के पक्ष में जोर दिया जा रहा है. फ्रांस में प्रस्तावित एक नियम के अनुसार संवेदनशील समय के दौरान जज के पास फेक न्यूज हटाने की शक्ति होगी. जज को 48 घण्टे के अंदर फेक न्यूज हटाने का आदेश देना होगा- 'फेक' क्या है यह निर्धारित करने के लिए यह काफी कम वक्त है. इसी तरह का कानून मलेशिया में भी पेश किया गया है हालांकि वह लागू नहीं हुआ है.

भारत में अब चुनाव आयोग देख रहा है कि फेक न्यूज किस तरह से प्रसारित होती है, इसके क्या विपरीत प्रभाव हो सकते हैं और क्या यह किसी तरह आचार संहिता का उल्लंघन करती हैं. लवासा ने न्यूज18 को बताया कि यदि वोटर्स से जाति और धर्म के आधार पर वोट मांगे जाते हैं तो इसके लिए बाद में जांच की जाएगी.



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