ANALYSIS | कभी सबसे करीबी रहे दिग्विजय सिंह को राहुल गांधी ने क्यों धकेला हाशिए पर!
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राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने हाल के दिनों में कई प्रभावशाली नेताओं को हाशिए पर घकेल दिया है. दिग्विजय सिंह भी इन्हीं में से एक हैं. मध्यप्रदेश में आगामी चुनावों के लिए चल रहे अभियान से पूर्व सीएम को बाहर रखा जाना तो कम से कम यही इशारा करता है. इस बारे में हालांकि कांग्रेस के भीतर ही अलग-अलग राय है.

मध्यप्रदेश चुनावी अभियान में सिंह को अलग-थलग रखने का मुद्दा तमाम तरह की दिलचस्प बातों को उकसा रहा है. हाल ही में भोपाल में सिंह की टिप्पणी भी कयासबाजी को हवा देती है. उन्होंने साफ कहा था कि मुझे अलग रखा जा रहा है.

दिग्विजय आगे कहते हैं, "जिसे भी टिकट मिले, भले ही उससे हमारे कितने ही मतभेद हों, उसे जिताने की कोशिश होनी चाहिए. मेरे पास केवल यही एक काम है; कोई प्रचार नहीं, न ही कोई भाषण. मेरे भाषणों ने पार्टी के वोट कम किए, यही वजह है कि मैं रैलियों में शामिल नहीं हूं."

सवाल उठता है कि क्या सिंह को बाहर रखा जाना चुनाव अभियान की रणनीति का हिस्सा है. इसपर कई राय हैं. हालांकि उनकी प्रभावशाली स्थिति डगमगाई तो है. चुनाव की बाट जोह रहे एक और राज्य छत्तीसगढ़ में पार्टी ने 40 "स्टार" प्रचारकों की सूची रखी है, उससे भी दिग्विजय का नाम गायब है. उनका नाम सूची से बाहर है, जबकि उन्होंने लगभग 10 साल तक अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बतौर काम किया.

वहीं ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम आंकड़े में नंबर 12 स्टार प्रचारक के रूप में है. पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ की राजनीति से थोड़ा भी साबका रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस बात से इत्तेफाक रख सकता है कि सिंह की जनजातीय मामलों को लेकर राजनैतिक समझ सिंधिया से बेहतर ही होगा.

हालांकि वो राजनीति ही क्या, जिसमें स्पष्ट के मायने धुंधलके में न छिपे हों. कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं का मानना ​​है कि सिंह को इस तरह 'अलग-थलग' रखा जाना किसी बड़ी रणनीति का हिस्सा है, जिसके पत्ते वक्त आने पर ही खुलेंगे ताकि मप्र के इस पूर्व सीएम की राजनैतिक समझ का ज्यादा से ज्यादा फायदा लिया जा सके.

नेताओं के इस खेमे के अनुसार, ये नेता अपने हिंदुत्व विरोधी विचारों के कारण हमेशा विवादित व्यक्तित्व रहा. यूपीए सरकार के दौरान, जब दिग्विजय एआईसीसी के महासचिव थे, उन्होंने "भगवा आतंक" की बात कही. साथ ही 26/11 मुंबई हमले के दौरान बटाला हाउस मुठभेड़ और आतंकवाद विरोधी दल के प्रमुख हेमंत करकरे की मौत पर संदेह जताया.

राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस जहां सॉफ्ट हिंदुत्व की ओर बढ़ रही है, दिग्विजय भी अपने विचारों में थोड़े फेरबदल करते दिख रहे हैं. अपनी छह-महीने की नर्मदा यात्रा के दौरान अक्टूबर 2017 और अप्रैल 2018 के बीच उन्होंने हज़ारों संतों का सम्मान किया और नर्मदा नदी के चारों ओर सैकड़ों मंदिरों का दौरा किया. हालांकि इन सबके बावजूद उनकी एंटी-हिंदू छवि में कोई ज्यादा फेरबदल होता दिख नहीं रहा.
साल 2003 में कांग्रेस से मुख्यमंत्री के तौर पर उनका पहला निराशाजनक प्रर्दशन रहा, जब पार्टी 230 विधानसभा सीटों में से केवल 37 जीतने में कामयाब रही.

तत्कालीन मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जून-जुलाई 2018 में अपनी जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान सिंह को लक्ष्य करते हुए 'उन अंधेरे दिनों' की याद मतदाताओं को दिलाई. ये वो वक्त था जब बिजली की कटौती और सड़कों की बदहाली से लोग बेहाल थे. पुरानी पीढ़ी इससे सहमत दिखी. हालांकि सिंह को चुनाव अभियान में हिस्सा लेने से अलग रखने की रणनीति ने तत्कालीन सीएम को इस तरह की टिप्पणियों के 'सुख' से वंचित कर दिया है.

सिंह के बेटे जयवर्धन दो बार विधायक बन चुके हैं और कांग्रेस के सत्ता में आने की स्थिति में उनके राज्य मंत्री बनने की उम्मीद है. ये दिग्विजय के लिए बुरा सौदा नहीं है, जो साल 2003 से अपने बेटे की राजनैतिक बूझ को निखारने में जुटे हुए हैं.

दिग्विजय को नकारना आसान नहीं, वो चुनिंदा ऐसे राजनेताओं में से हैं जो सभी तीन परतों - नगर पालिका, राज्य विधानसभा और संसद में प्रतिनिधि चुने गए हैं. यहां तक कि साल 2012 में जब राहुल राजनैतिक पटल में नए-नए उभरे थे, तब सिंह को युवा गांधी के सलाहकार के रूप में संबोधित किया जाता था.

पार्टी में दिग्विजय को लेकर भले ही दो धड़े हो चुके हैं लेकिन सबको 11 दिसंबर 2018 का इंतजार है, जब चार अन्य राज्यों के फैसले की घोषणा होगी. यही वो वक्त होगा, जब राहुल के नेतृत्व वाली कांग्रेस में इस अनुभवी नेता का असल कद स्पष्ट हो सकेगा.


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