400 साल पहले पड़ी थी अयोध्या में विवाद की नींव, 1885 में पहुंचा अदालत की दहलीज पर...
कांसेप्ट फोटो


आज अयोध्या के राम मंदिर और बाबरी मस्जिद पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया जाएगा। काउंटडाउन शुरू हो चुका है। बता दें, शनिवार नौ नवंबर सुबह 10:30 बजे सुप्रीम कोर्ट फैसला सुनाएगा लेकिन क्या आपको पता है कि पहली बार कब अदालत की दहलीज पर ये मामला पहुंचा था? 

बताया जाता है कि अयोध्या में विवाद की नींव करीब 400 साल पहले पड़ी थी, लेकिन पहली बार अदालत की दहलीज पर यह मामला 1885 में पहुंचा था। मुगल बादशाह बाबर के एक सिपहसालार थे मीर बाकी, उन्होंने 1528 में बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया।

इसके बाद से ही आरोप लगाए जाने लगा कि यहां मंदिर को तोड़ कर मस्जिद बनाई गई है। इसे लेकर हिंदू पक्ष का दावा है कि यह जगह भगवान राम की जन्मभूमि है और यहां पहले एक मंदिर था। मुगल शासन के दौरान ये बात ऐसे ही रही। उस दौरान की घटनाओं का कोई प्रमाण नहीं मिलता है।

इस विवाद के चलते अयोध्या में पहली बार 1853 में दंगा हुआ। जिसके बाद 1859 में अंग्रेजी प्रशासन ने विवादित जगह के आसपास बाड़ लगा दी, हिंदू-मुस्लिम दोनों के लिए पूजा की जगह निर्धारित कर दी, जिसमें मुस्लिमों को मस्जिद के अंदर और हिंदुओं को बाहर चबूतरे पर पूजा करने की अनुमति मिली। 


पहली बार कब पहुंचा अदालत

अदालत में पहली बार अयोध्या का मामला 1885 में पहुंचा। बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद में निर्मोही अखाड़ा के महंत महंत रघुबर दास ने 1885 में फैजाबाद की जिला अदालत में पहली बार याचिका दायर की गई थी। उन्होंने फैजाबाद कोर्ट से बाबरी मस्जिद के पास ही राम मंदिर निर्माण की इजाजत मांगी  अदालत ने महंत की अपील ठुकरा दी।

अयोध्या विवाद की असल शुरुआत 23 दिसंबर 1949 को, जब भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में पाई गईं। हिंदुओं का कहना था कि भगवान राम प्रकट हुए हैं, जबकि मुसलमानों का दावा है कि किसी ने रात में चुपचाप मूर्तियां वहां रख दीं। यूपी सरकार ने मूर्तियां हटाने का आदेश दिया, लेकिन हिंदुओं की भावनाओं के भड़कने के डर से इस आदेश को पूरा करने में असमर्थता जताई गई। सरकार ने इसे विवादित स्थल मानकर मस्जिद पर ताला लगवा दिया।

अयोध्या मामले में साल 1950 में फैजाबाद सिविल कोर्ट में दो अर्जी दाखिल की गई। 

इसमें एक में राम लला की पूजा की इजाजत और दूसरे में विवादित ढांचे में भगवान राम की मूर्ति रखे रहने की इजाजत मांगी गई।

 इसके बाद 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने तीसरी अर्जी दाखिल की, जिसमें निर्मोही अखाड़ा चाहता है कि उसे राम जन्मभूमि का प्रबंधन और पूजन का अधिकार मिले।


इसके बाद साल 1961 में यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड ने अर्जी दाखिल कर विवादित जगह के पजेशन और मूर्तियां हटाने की मांग की. इसके बाद से यह मामला कोर्ट में उलझा हुआ है।

फैसले को जीत-हार से न जोड़ें : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी से सद्भावना की महान परंपरा को मजबूत करने की अपील की है. प्रधानमंत्री मोदी ने शुक्रवार को ट्वीट कर कहा, "अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला आएगा, वो किसी की हार-जीत नहीं होगा. देशवासियों से मेरी अपील है कि हम सब की यह प्राथमिकता रहे कि ये फैसला भारत की शांति, एकता और सद्भावना की महान परंपरा को और बल दे."

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