गुजरात विधानसभा चुनाव : मोदी, राहुल या हार्दिक, 18 दिसंबर को खुलेगा 2019 का रास्ता
मोदी और राहुल के बाद हार्दिक पटेल इन चुनावों के तीसरे अहम चेहरे के रूप में सामने आए हैं


अहमदाबाद : गुजरात विधानसभा चुनावों के दूसरे दौर के लिए सोमवार को दोनों प्रमुख दलों, बीजेपी और कांग्रेस ने जमकर प्रचार किया। यह प्रचार गुजरात के पावर सेंटरों अहमदाबाद और गांधीनगर में केंद्रित दिखा। पीएम मोदी ने जहां साबरमती रिवरफ्रंट पर रैली को संबोधित किया, वहीं राहुल गांधीनगर में बोले। यहीं हार्दिक पटेल ने भी 52 किलोमीटर का रोड शो किया। मोदी और राहुल के बाद हार्दिक पटेल इन चुनावों के तीसरे अहम चेहरे के रूप में सामने आए हैं। विधानसभा चुनावों में इन तीनों नेताओं का काफी कुछ दांव पर लगा है। गुजरात विधानसभा चुनावों से 2019 में होने वाले आम चुनावों की तस्वीर भी बननी है। 

पीएम मोदी के लिए यह चुनाव इतना अहम है कि अगर बीजेपी को 2012 से कम सीटें (116) मिलीं तो भी झटका होगा। बीजेपी की सीटें कम भी हुईं तो भी मोदी के लिए आगे का रास्ता कठिन हो जाएगा। वहीं बीजेपी के दावे के मुताबिक अगर उसे गुजरात में रेकॉर्ड सीटें मिलीं तो इसका असर 2019 के आम चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन पर भी बेहतर पड़ेगा। सोमवार को राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित हुए हैं। 

ऐसे में अगर गुजरात चुनावों में कांग्रेस को जीत मिली तो इससे उनकी ताजपोशी को और मजबूती मिलेगी। वहीं दूसरी ओर अगर कांग्रेस की हार हुई और सीटें घटीं तो उनके नेतृत्व क्षमता पर भी सवाल खड़े होंगे। पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद राहुल के लिए गुजरात विधानसभा चुनाव पहली परीक्षा साबित होने जा रहे हैं। दो दशकों से अधिक समय के बाद कांग्रेस को गुजरात में जीत की उम्मीद नजर आ रही है। 22 सालों बाद पार्टी को गुजरात में जीत दिलाने के लिए राहुल काफी आक्रामक प्रचार में भी जुटे हुए हैं। 

पाटीदार आरक्षण आंदोलन के नेता और अब गुजरात चुनावों में बीजेपी के विरोध का प्रतीक बने हार्दिक के लिए भी गुजरात चुनाव आगे का रास्ता तय करेंगे। हार्दिक ने सोमवार को अपने रोडशो के दौरान कहा भी कि वह डेढ़ साल बाद सक्रिय राजनीति में आ सकते हैं। हार्दिक 2019 में 25 साल के होते ही चुनाव लड़ने के योग्य हो जाएंगे। अगर पाटीदार आंदोलन का असर गुजरात चुनावों की वोटिंग पर नहीं पड़ा और बीजेपी को शिकस्त नहीं मिली तो हार्दिक का राजनीतिक भविष्य भी अंधकार में जा सकता है। 

पहले चरण में कम वोटिंग बीजेपी के लिए चिंता की बात 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक आंतरिक सर्वे में बीजेपी को 100 से 110 सीटें मिलने की संभावना जताई गई हैं। यह 2012 के मुकाबले थोड़ी ही कम हैं। संघ ने पाटीदार आंदोलन की वजह से सूरत और सौराष्ट्र में कुछ जगहों पर बीजेपी की हार की आशंका जताई है। विधानसभा चुनावों के पहले चरण में 19 जिलों की 89 सीटों पर वोटिंग हो चुकी है। 2012 के मुकाबले (68 फीसदी) 2017 के इन चुनावों में कम वोटिंग (66.75 फीसदी) देखने को मिली है। यह बीजेपी के लिए चिंता की बात हो सकती है। 

जीतू वघानी, भार्गव भट्ट और केंद्रीय मंत्री मनसुख मंडविया जैसे बीजेपी के वरिष्ठ नेता दूसरे चरण में अधिकतम वोटिंग कराने की कोशिशों में जुटे हुए हैं। हालांकि बीजेपी की राज्य यूनिट के एक बड़े नेता का दावा है कि कम वोटिंग का एक मतलब यह भी है कि पाटीदार आंदोलन को पटेलों पर कोई खास असर नहीं पड़ा है। 

कांग्रेस को उम्मीद 
1995 में पहली बार गुजरात में बीजेपी की सरकार बनने के बाद से कांग्रेस सूबे की सत्ता से बाहर है। 'विकास गांडो थयो छे' जैसे मिम, पाटीदार आरक्षण आंदोलन, उना में दलित उत्पीड़न के बाद शुरू हुए आंदोलन के अलावा वरिष्ठ नेता अहमद पटेल के राज्यसभा में पहुंचने में मिली सफलता के बाद कांग्रेस को ताकत मिली है। गुजरात चुनावों में कांग्रेस को हार्दिक के अलावा ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर का भी साथ मिला है। राहुल गांधी ने गुजरात चुनावों में काफी प्रचार किया है और वोटरों को लुभाने की कोशिश की है। प्रचार के दौरान राहुल गुजरात के 26 मंदिरों की यात्रा भी कर चुके हैं। कांग्रेस ने इसके जरिए सॉफ्ट हिंदुत्व को अपनाने का संकेत भी दिया है। इन परिस्थितियों में कांग्रेस भी सूबे की सत्ता में वापसी की उम्मीद से है। 

हार्दिक बने थर्ड फैक्टर 
सोमवार को अहमदाबाद में 52 किलोमीटर का रोड शो निकाल हार्दिक सारे रेकॉर्ड तोड़ चुके हैं। हार्दिक को पाटीदारों का काफी समर्थन भी मिलता दिख रहा है। अगर पाटीदार आरक्षण आंदोलन का असर वोटिंग पर पड़ा तो सौराष्ट्र, दक्षिण और केंद्रीय गुजरात की 40 से अधिक विधानसभा सीटों के परिणाम इससे तय होंगे। ऐसे में हार्दिक इस बार के गुजरात विधानसभा चुनाव में थर्ड फैक्टर के तौर पर उभरे हैं। 


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