नाटक ‘डेथ ट्रैप’ ने दिखाया समाज को ‘वास्तविक आइना’, किस तरह बच्चों की अनदेखी पड़ सकती है माँ-बाप पर भारी
आज के दौर में जब माँ-बाप बच्चों की स्वंत्रता के नाम पर उनकी निजी जिन्दगी में झाकना जरुरी नहीं समझते तब बच्चें जिंदगी के किस खतरनाक दौर से गुजर सकते है .


लखनऊ : आज के दौर में जब माँ-बाप बच्चों की स्वंत्रता के नाम पर उनकी निजी जिन्दगी में झाकना जरुरी नहीं समझते तब बच्चें जिंदगी के किस खतरनाक दौर से गुजर सकते है उसी का नाम नाटक ‘डेथ ट्रैप’ यानि मौत का जाल. एक ऐसा नाटक जो ये बताता है कि स्वतंत्रता और निजता के नामा पर बच्चों की जिन्दगी में हस्तक्षेप न करना किसी भी अभिभावक के लिए कितना भारी पड़ सकता है.

        

दरअसल नाटक की पटकथा का संकलन यतार्थ की उस भयानक सच्चाई जिसने न केवल हिन्दुस्तान में बल्कि विश्व मौत नंगा तांडव किया था, जी हाँ ! हम बात कर रहे है ब्लू व्हेल गेम की जिसने ना जाने कितने परिवारों से उनके बच्चे हमेशा हमेशा से छीन लिए.

नाटक डेथ ट्रैप की पटकथा भी इसी पर आधारित है और जिसकी शुरुवात सूरज नाम के लड़के के फासी के सीन से होती है पर इससे पहले कि सूरज फांसी लगाये सूरज के पिता ऐन वक्त पर उसे रोक लेते है और बेटे से फांसी लगाने का कारण पूछते है. बेटा बेधड़क कहता है कि उसे बीस हजार रूपये की जरुरत है. पिता मौत की कगार खाडे बेटे को बिना सोचे समझें बीस हजार रूपये दे देते है. पर ये बीस हजार रूपये किस तरह एक पिता पर भारी पड़ते है उसका प्रत्यक्ष नजारा तब देखने को मिलता है जब उन बीस हजार रुपयों से सूरज एक मोबाइल खरीद लाता है, औए दिन रात उसी मोबाइल में लगा रहता है.

      

पिता ये सोचकर कि ये बच्चें की अपनी निजी जिन्दगी है उस पर धयान नहीं देते. जबकि निजी जिन्दगी के नाम सूरज एक ऐसे खतरनाक खेल में उलझ गया था जिसका परिणाम सिर्फ और सिर्फ आत्महत्या थी. जी हाँ ! सूरज मौत के खेल ब्लू व्हेल को खेलने लगा था जिसके हर टास्क को हर हाल में पूरा कर रहा था. इस क्रम में वो कई रातें घर से बाहर रहता था और पिता के पूछने पर बहाने बनाते था.

एक दिन पिता सोते हुए बेटे सूरज की शर्ट धोने के लिए उठाते है तो शर्ट की बांह पर उन्हें खून के धब्बे दिखाई पड़ते है जिन्हें देखकर वो घबरा जाते है और सोते सूरज का हाथ उठाकर देखते है तो उस पर उन्हें मछली का निशान नजर आता है. घबराए पिता को लगता है रात भर घर से बाहर रहने वाला उनका बेटा किसी अपराधिक गिरोह से जुड़ गया है. घबराहट में वो ये बात अपने मित्र जमील को बताते है. पूरी बात विस्तार से सुनने के बाद जमील को ये सझने में जार सी भी देर नहीं लगी उनके मित्र प्रकश जी का पुत्र सूरज मौत के खेल ब्लू व्हेल में उलझ गया है.



जमील तुरंत बिना देरी के प्रकाश को ब्लू व्हेल गेम के बारें में बताते है और कहते है कि अपना सूरज भी इसी गेम में उलझ गया है उस पर लगातर निगरानी रखने की जरुरत है. जमील दवारा सचेत किये जाने बाद प्रकश लगातर अपने बेटे सूरज नजर रखे रहे. नजर- नजर रखते प्रकश को ये बात समझ में आगयी है कि उनका बेटा मौत के खेल में उअझ गया पर फिर  भी हिम्मत के साथ वो लगातार अपने बेटे पर नजर बनाये रहे और फिर अंत में वो रात भी आई जो उनका बेटा ब्लू व्हेल के अंतिम टास्क छत से कूदने को पूरा करने के लिए छत पर छह गया और धीरे-धीरे अपने कदम छत की मुंडेर की तरफ बढ़ने लगा. इस दौरान उसके मन में काफी उथल पुथल थी. एक तरफ उसे टास्क पूरा करने का जूनून सवार था तो दूसरी तरफ अपनों से पिछड़ने का गम भी. वो अच्छी तरीके से जानता था कि वो मौत की तरफ ओने कदम बढ़ा रहा है पर फिर भी गेम को जीतने के जूनून में वो मौत को भी गले लगाने का तैयार था. इस बीच पिता प्रकाश उसको आवाज़ लगाते है दिल के रिश्तों की दुहाई देते है पर ये सूरज ये कहते हुए आगे बढ़ता जाता है कि उसे हर हाल में ये टास्क जीतना है. कुछ होता न देख पिता प्रकाश जाते हुए सूरज से एक बार पलट कर उसे गुड बाय बोलने के लिए कहते है और यही होता है नाटक का टर्निंग पॉइंट जहाँ जूनून पर दिल रिश्ता भारी पड़ जाता है और एक बेटा अपने पिता की बाँहों में सिमट जाता है और पिता अपने बेटे को खोने के गाम से बच जाता है और इसी के साथ खत्म हो जाता है नाटक ‘डेथ ट्रैप’ यानि मौत का जाल.   

इस नाटक की पटकथा जाने माने लेखक व फिल्मकार आनंद शर्मा ने लिखी जबकि सूरज किरदार दीपक शर्मा ने निभाया वही सूरज के पिता का किरदार खुद आनद शर्मा ने निभाया. इसके साथ ही जमील का किरदार खुद अभिनेता जमील ने निभाया. इसके अतरिक्त अभिनेश मिश्र, नवनीत कौर, फिरदौस हुसैन, इजहार हुसैन, आयुष राजपूत, अल्तमस आजमी ने भी नाटक में सक्रिय किरदार निभाया.  


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