मायावती की सोशल मीडिया से दूरी कहीं 2019 में भी न पड़ जाए भारी!
File Photo


दिन-ब-दिन तेज होती डेटा स्पीड, हर हाथ में मोबाइल और जियो की वजह से सस्ता होता इंटरनेट, 50 करोड़ से ज्यादा नेट यूजर्स, ये सब आंकड़े भारत में तेजी से पैर पसारते न्यू मीडिया की कहानी कहते हैं, पर कोई है जो इसकी ताकत को नकारता आ रहा है... जी हां बहुजन समाज पार्टी ने साफ कह दिया है कि उसका सोशल मीडिया पर कोई अकाउंट नहीं है और बसपा के नाम से ट्विटर और फेसबुक पर जो भी पेज चल रहे हैं, वो फर्जी हैं. हां यह सच है कि बसपा सुप्रीमो मायवती की सोच से संचालित होने वाली पार्टी सोशल मीडिया पर कहीं भी अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराती. ऐसा पहली बार नहीं हुआ, इससे पहले भी 2014 के लोकसभा और 2017 के यूपी विधानसभा चुनावों में भी मायावती ने साफ कह दिया था कि उनका वोटर सोशल मीडिया से प्रभावित होने वाला नहीं है. चाहे कुछ भी क्यों ना हो जाए, वो प्रचार के इन माध्यमों पर विश्वास नहीं करती.

ऐसा तब है जब कि मायावती यूपी में लगातार अपनी जमीन खोती जा रही हैं. राज्य की जनता ने 2014 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं दी. परिणाम ये हुआ कि 4.19 फीसदी वोट शेयर के साथ बसपा अपना खाता भी नहीं खोल पाई. हालांकि उन चुनावों में भी मायावती को किंगमेकर के रूप में देखा जा रहा था. राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना था कि थर्ड फ्रंट की मजबूत स्थिति में मायावती अपना दावा पेश कर सकती थीं, पर ऐसा हो न सका.

2014 में भी मायावती ने सोशल मीडिया को किया था खारिज
2014 का चुनाव अपने आप में अलग था. जहां कांग्रेस-बीजेपी पर आरोप लगे कि उन्होंने प्रचार में पानी की तरह पैसा बहाया. फेसबुक, ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर रात दिन वॉर की तरह प्रचार चल रहा था, तो वहीं मायावती अपने वोटर को पारंपरिक तरीके से रैली करके लुभा रही थीं. हालांकि 2014 में भारत में 23 करोड़ से ज्यादा लोग इंटरनेट यूज करते थे जिन्हें मायवती ने सिरे से नकार दिया. उनका साफ तौर पर कहना है कि उनका वोटर सोशल पर नहीं है. कुछ ऐसा ही हाल था 2017 के यूपी विधानसभा चुनावों में भी. अखिलेश के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी का जो फायदा मायावती को मिलना चाहिए, वो नहीं मिला और नतीजा ये हुआ कि बीजेपी ने राज्य में प्रचंड बहुत से सरकार से बनाने में सफल रही. 22% वोट शेयर के साथ बसपा दूसरे नंबर पर रही, जबकि उसको मात्र 19 सीटें ही मिलीं. इन चुनावों में भी बसपा की हार के कारणों में प्रमुख उनका युवाओं से दूरी बनाना रहा.

50 करोड़ नेट यूजर्स से दूर हैं मायावती
एक अंग्रेजी अखबार में छपे आंकड़ों के मुताबिक साल 2014 के लोकसभा चुनावों में पॉलिटिकल पार्टियों ने सोशल मीडिया पर लगभग 400 से 500 करोड़ तक खर्च किया था, जो कि उनके प्रचार के कुल खर्च का 10 प्रतिशत था. कुछ ऐसा अनुमान है कि साल 2019 में होने वाले चुनावों में सोशल मीडिया पर होने वाले चुनाव प्रचार के खर्च को 20 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है. इसका एक बड़ा कारण ये भी है कि साल 2014 में 23 करोड़ नेट यूजर थे, जो कि साल 2019 में बढ़कर 50 करोड़ से ज्यादा होने वाले हैं.

सोशल मीडिया ने तय किया था मोदी की जीत का रास्ता
साल 2014 का लोकसभा चुनाव कई मामलों में महत्वपूर्ण था. 30 साल बाद देश को एक पूर्ण बहुमत की सरकार मिली थी, जिसकी परिकल्पना करने में कोई भी राजनैतिक पंडित सक्षम नहीं हुआ था. 2014 में मोदी की प्रचंड जीत में सोशल मीडिया का बहुत बड़ा हाथ था. पूरे देश में लगभग 160 ऐसी सीटें थीं, जिनपर सोशल मीडिया का सीधा प्रभाव था. तब कांग्रेस समेत कई पार्टियों ने मोदी का मजाक उड़ाया कि सोशल मीडिया पर हीरो बनने से वोट नहीं मिला करते. और उस वक्त भी बहनजी सारा तमाशा दूर से देख रही थीं. नतीजा कांग्रेस 14 सीटों पर सिमट गई और हाथी शून्य पर धरा रह गया.

2014 की करारी हार का परिणाम ये हुआ कि सभी पार्टियों के दिग्गजों ने सोशल मीडिया पर अपनी मौजूदगी बढ़ाई है. अखिलेश यादव का अपना ऑफिशियल ट्विटर और फेसबुक अकाउंट है. ऑफिस ऑफ आरजी के बाद राहुल गांधी का अब अपने नाम से ही ट्विटर हैंडल हैं. और तो और लालू के बेटे तेजस्वी यादव भी चाचा नीतीश के साथ सोशल मीडिया से आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति कर रहे हैं.

समय के साथ बदली भी हैं मायावती
कांशीराम के आंदोलन से निकलीं मायावती ने हालांकि ये भी साबित किया है कि उन्हें वक्त के साथ बदलना भी आता है. 2007 में मायावती ने अपने दम पर यूपी में सरकारी बनाई. राजनीतिक पंडितों ने इसे नाम दिया 'सोशल इंजीनियरिंग'. यूपी की सियासत में एक वो दौर भी था, जब सपा और बसपा ने 256 और 164 सीटों पर गठबंधन के तहत मिलकर चुनाव लड़ा था. सपा अपने खाते में से 109 सीटें जीतने में कामयाब रही, जबकि 67 सीटों पर हाथी ने कब्जा किया था. फिर आया 1995 में मायावती के जीवन का सबसे काला दिन 'गेस्ट हाउस कांड'. इसके बाद से माया-मुलायम के रिश्तों में ऐसी खाई आई कि लगा मानो ये अब कभी नहीं भरेगी. साल 2012, 2014, 2017 की लगातार हार के बाद थक चुकी मायावती ने अखिलेश को भतीजा मानते हुए ऑफर स्वीकार किया. मायावती ने फूलपुर-गोरखपुर सीटों पर होने वाले उपचुनावों में सपा को समर्थन दिया.

सोशल मीडिया से दूरी के फायदे भी हैं
अब ये सवाल सबके जेहन में है कि अपने लंबे राजनीति जीवन में खुद को हर चुनौती पर खरा साबित करने वाली मायावती को आखिर न्यू मीडिया से क्या गुरेज है. वैसे इसका एक और पहलू भी है, वो ये कि हर वक्त टीवी, फेसबुक पर मौजूद रहने वाले नेताओं का ओवर एक्सपोजर उन्‍हें नुकसान भी पहुंचा सकता है. मतलब कि लोगों को उनको अधिक देखकर ऊब भी हो सकती है. उनका हर मुद्दे पर बोलना, अपना राय रखना समर्थकों को नापसंद भी हो सकता है. ऐसी स्थिति में जब 2019 में वोटर अपना मन बनाएगा तो वो हर इन बातों पर भी गौर कर सकता है.

2014 में दलितों ने भी दिया था बीजेपी को वोट!
प्रदेश में लगभग 18% दलितों वोटर हैं जिन्हें मायावती अपना पक्का वोट बैंक मानती हैं. साल 2014 में जब तेज से फेसबुक और इंटरनेट लोगों के जीनव को प्रभावित कर रहा था तो दलित भी इससे अछूते नहीं थे. वो भी चाहते थे कि उनकी नेता विभिन्न विषयों पर अपनी क्या राय रखती हैं वो जाने, वो भी बहनजी से सीधा संपर्क करें. पर बहनजी, उनके दिल की बात समझ न सकीं. नतीजा ये हुआ कि मायावती का पारंपरिक वोटर छिटका और बीजेपी राज्य में 80 में से 73 सीटें जीतने में कामयाब रही.

 '' मायावती पढ़े लिखे दलितों से नफरत करती हैं''
1997 में मायावती जिस सोशल इंजीनियरिंग के सहारे सीएम की कुर्सी तक पहुंचीं थी उसमें ब्रह्माण, भूमिहार और ठाकुरों का बहुत बड़ा वर्ग था जिसने उन्हें वोट दिया. 2012 में उनके सत्ता से बेदखल होने की एक बड़ी वजह इस वर्ग का रूठ जाना था. 2014 में मायावती ने उन्हें मनाने की कोई कोशिश नहीं की. और रही सही कसर मायावती की सोशल मीडिया से दूरी ने पूरी कर दी. वैसे मायावती टक्नोलॉजी से इनती नफरत क्यों करती है ये दलित चिंतक और बीजेपी नेता उदित राज के बयान से समझा जा सकता है, जिसमें उन्होंने कहा कि '' मायावती पढ़े लिखे दलितों से नफरत करती हैं''.'दलित ही क्यों करें गाय का अंतिम संस्कार, कैसी गौमाता, कैसी भक्ति, कैसा स्नेह..?'

तो क्या 2019 में किंग मेकर के रोल में होंगी मायावती
2019 की तैयारियों में जुटी बाकी पार्टियां जहां सोशल मीडिया से नए वोटर जोड़ने की जुगत में लगी हैं, वहीं मायावती प्रचार के 1947 वाले फॉर्मूले पर काम कर रही हैं. नाम ना जाहिर करने की शर्त पर एक बसपा कार्यकर्ता ने हमें बताया कि हमारी पार्टी इस बार भी जनसंपर्क के वही पुराने माध्यमों पर विश्वास करने वाली है. लोगों से संवाद कायम करने के लिए महारैला का आयोजन किया जाएगा. मतलब मायावती ने ठान लिया है कि हम नहीं बदलेंगे!!!

कुछ राजनीतिक विश्लेषक बसपा को ‘डार्क हॉर्स’ बताते हैं. उनका दावा होता है कि बसपा के मतदाता चुप रहते हैं, पर वोट बहनजी को ही करते हैं. इस दौर में जब हर हाथ में मोबाइल है और हर दिमाग में सवाल तो मायावती का यूं एक बड़े वोटर वर्ग से कट जाना, उनकी राजनैतिक महत्वकांक्षा को कहां तक लेकर जाएगा, यह वक्‍त ही बताएगा. 


अधिक राज्य की खबरें