OPINION | राजनीतिक दलों के लिए खतरे की घंटी है DUSU चुनाव का वोट पैटर्न
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सिद्धार्थ मिश्रा

दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव (DUSU) के नतीजे पिछले हफ्ते जारी हो चुके हैं. DUSU का वोटिंग पैटर्न उन राजनीतिक पार्टियों की चिंता बढ़ा सकता है, जो कि अब तक क्षेत्रीय और जातिगत राजनीति से ऊपर नहीं उठ पाए हैं. डीयू चुनाव में बड़ी संख्या में NOTA यानी इनमें से कोई नहीं ऑप्शन चुना गया है.

यहां गुज्जर छात्रों ने आरएसएस समर्थिक एबीवीपी को वोट किया, जबकि जाट छात्रों ने कांग्रेस समर्थित एनएसयूआई के पक्ष में मतदान किया. यहां हरियाणा के चौटाला परिवार से समर्थित इंडियन नेशनल स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (INSO) ने जाट छात्रों के वोट काटने का काम किया, जिसके चलते एनएसयूआई की हार हुई.

उपाध्यक्ष पद के लिए एबीवीपी उम्मीदवार शक्ति सिंह को 23 हजार से अधिक वोट मिले. इससे दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन को एक नजरिया मिल सकता है कि उन्हें आम आदमी पार्टी के साथ किसी भी प्रकार गठबंधन से दूर ही रहना चाहिए. माकन खुद भी डूसू अध्यक्ष रह चुके हैं. माकन यह लगातार कहते रहे हैं कि आम आदमी पार्टी लगातार अपनी जमीन खो रही है और आप के साथ गठबंधन से कांग्रेस को कोई फायदा नहीं होगा.

राष्ट्रीय राजधानी में भी कुछ हफ्तों से चल रहे राजनीतिक बहस में भी आम आदमी पार्टी असमंजस में नजर आ रही है कि वह कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन में जूनियर पार्टनर के तौर पर शामिल हो जाए या फिर दिल्ली विधानसभा में अपने संख्याबल को आधार बनाकर बड़ी भूमिका की मांग करे.

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पहले ही यह साफ कर चुके हैं कि दिल्ली में राजद के विरोध प्रदर्शन में उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ मंच साझा नहीं किया था. हालांकि, इसके कुछ दिन बाद ही आम आदमी पार्टी के नेताओं ने महंगाई के खिलाफ कांग्रेस के बुलाए भारत बंद में हिस्सा लिया था.

आम आदमी पार्टी समर्थित छात्र युवा संघर्ष समिति (CYSS) डूसू चुनाव में अपना असर दिखाने में नाकाम रही. यहां चारों पदों पर मुकाबला एबीवीपी और एनएसयूआई के बीच ही देखा गया. यहां तीसरा खिलाड़ी इन दोनों से काफी पीछे रहा और वह अपना असर सिर्फ इसलिए दिखा पाया क्योंकि यहां CYSS ने लेफ्ट समर्थित आइसा के साथ गठबंधन किया था.

यह गठबंधन आम आदमी पार्टी की आतिशी मार्लेना के माध्यम से किया गया था. हार के बाद आम आदमी पार्टी के नेताओं ने दावा किया कि दिल्ली यूनिवर्सिटी चुनाव का शहर की राजनीति पर कोई असर नहीं पड़ेगा. चुनाव से ठीक पहले आम आदमी पार्टी ने घोषणा की थी कि स्टूडेंट पास के साथ यात्रा करने वाले छात्रों को डीटीसी की एसी बसों में यात्रा करने की छूट दी जाएगी.

वैसे इस तरह के ऑफर्स आप तक ही सीमित नहीं रहे. केंद्रीय हाउसिंग और अर्बन अफेयर्स मंत्री हरदीप पुरी ने वादा किया था कि दिल्ली मेट्रो में छात्रों के लिए किराए की बढ़ोत्तरी सब्सिडाइज्ड रेट से की जाएगी. इसमें कोई शक नहीं है कि वह एबीवीपी की तरफ से यह वादा कर रहे थे. अब जब चार में से तीन सीटों पर एबीवीपी जीत चुकी है तो अपने वादे को अमलीजामा पहनाने के लिए पुरी को कड़ी मेहनत करनी पड़ सकती है.

मीडिया में अवेयरनेस की काफी कोशिशों के बावजूद डीयू चुनाव में वोटिंग का प्रतिशत 50 के करीब भी नहीं पहुंच सका. इस बार वोटिंग प्रतिशत पहले की तुलना में बढ़ा जरूर, लेकिन बड़ी संख्या में वोट NOTA के खाते में गए. सभी चार पदों पर पड़े कुल वोटों में सिर्फ नोटा को 27,739 वोट मिले. यहां अध्यक्ष पद के लिए नोटा को 6211, उपाध्यक्ष पद के लिए 6445, सचिव पद के लिए 6810 और संयुक्त सचिव पद के लिए 8273 वोट पड़े. सचिव पद के लिए नोटा को आप समर्थित CYSS उम्मीदवार से अधिक वोट मिले.

चुनाव से पहले ही डूसू चुनाव का रूप विचारधारा की लड़ाई से बदलकर डीयू में आरक्षण को लेकर जातिगत समीकरणों में तब्दील हो चुका था. अब जातिगत राजनीति से उभरे यही नेता आने वाले दिनों में सिटी पॉलिटिक्स में अपना कदम रखने वाले हैं. इनमें से कई नेता अपना ग्रेजुएशन भी पूरा नहीं कर पाते हैं. ऐसे में राजनीति को लेकर पढ़े-लिखे युवाओं की झुंझलाहट जाहिर है.

डीयू के नतीजों के आधार पर यदि शहर और देश की राजनीति का विश्लेषण किया जा रहा है तो यह राजनीतिक नेताओं के लिए बुरी खबर है. फिर चाहे वह नरेंद्र मोदी हों, राहुल गांधी हों या फिर अरविंद केजरीवाल. पढ़े-लिखे मिडिल क्लास परिवारों से आने वाले युवा वोटर्स का NOTA बटन दबाना यह साफ संकेत देता है कि वे सरकारी योजनाओं को लेकर बहुत अधिक आशान्वित नहीं हैं, साथ ही राहुल गांधी को लेकर उदासीन हैं और ऑल्टरनेटवि पॉलिटिक्स पर से भी उनका विश्वास उठ रहा है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. यहां व्यक्त की गई उनकी राय व्यक्तिगत है.)


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