वह नवाब जिसने 'मनरेगा' के तहत बनवा दी थी लखनऊ की सबसे मशहूर इमारत
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यूपी का दिल है लखनऊ. और लखनऊ का दिल इमामबाड़ा. कभी वहां जाएंगे तो एक कहावत सुनने को मिलेगी, 'जिसको न दे मौला, उसको दे आसफ़ुद्दौला'. हो सकता है आपको थोड़ा अजीब लगे. लेकिन अपने नेकदिल नवाब के लिए ये जुमला (कहावत) उसकी रियाया (जनता) ने गढ़ा था. वो भी यों कि साल था 1784. लखनऊ और उसके आसपास के इलाके में जबरदस्त अकाल पड़ा. लोगों के पास खाने को दाना न रहा, जनता त्राहि-त्राहि कर उठी. नवाब को जब जनता के इन दुखों का पता चला तो उन्होंने खजाना खोल दिया.

लेकिन ऐसा नहीं कि ये खजाना यूं ही बांट दिया गया. नवाब दिमागदार थे और क्रिएटिव भी, उन्होंने इस पैसे को क्रिएटिव तरीके से खर्चने की योजना बनाई. लोगों को काम पर लगाया गया. वैसे ही जैसे आज लोककल्याणकारी सरकारें लोगों की मदद के लिए मनरेगा जैसी योजनाएं चलाती है. नवाब आसफुद्दौला को इस क्रिएटिव तरीके के लिए आप आधुनिक हिंदुस्तान में लोकतांत्रिक सरकार से पहले ही मनरेगा की शुरुआत करने वाला मान सकते हैं.

ज्यादतर मजदूर अकुशल थे फिर भी बना डाली शानदार इमारत
इमामबाड़े का डिज़ाइन बनाने के लिए दिल्ली से आर्किटेक्ट आए. नाम था उनका किफ़ायतुल्ला. इमामबाड़े को बनाने में करीब 20 हज़ार लोग लगे. माने सारी जनता जिसे घर चलाने को पैसे की जरूरत थी. चूंकि उस वक्त शहर में हर वर्ग के लोग गरीबी झेल रहे थे ऐसे में नवाब ने सबको रोज़गार देने की एक तरकीब निकाली. इमामबाड़ा बनाने के लिए दिन भर गरीब मजदूर मेहनत करते. जबकि रात में जो भी निर्माण हुआ होता उसका कुछ हिस्सा अमीर लोग तोड़ देते जिसके एवज में उनको पैसे मिलते. इस तरह गरीब और रईस दोनों को रोज़गार मिल गया.

फिर भी मार्के की बात ये कि करीब 11 साल में जब ये इमारत तैयार हुई तो नायाब थी, जबकि इसे बनाने वाले ज्यादातर अकुशल मजदूर थे, जो केवल अपने रोजगार के लिए इसे बना रहे थे. यकीन न हो तो कभी घूम आइए. इससे भी कमाल की बात ये है कि इसके निर्माण में लोहे और सीमेंट का ज़रा भी इस्तेमाल नहीं हुआ है. लोकल गाइड दावा करते हैं कि इसे बनाने में यूज हुआ मसाला सारी खाने-पीने वाली चीजों को मिलाकर तैयार किया गया था. जिसमें लखौरी ईंट के साथ सुर्खी, चूना, सिंघाड़े का गूदा, बेल का शर्बत, गुड़, गोंद, शहद, बाजरे का आटा, उड़द की दाल, चावल आदि थे.

इसमें (50*16*15) मीटर का एक विशाल हॉल है, जिसे किसी बीम का सपोर्ट नहीं दिया गया है. कहा जाता है कि यह अपने तरह के विश्व के सबसे विशाल हॉल्स में से एक है. लेकिन इस बात से हमेशा आश्चर्य होता है कि अकुशल मजदूरों की मदद से मजबूरी में बनी यह इमारत मुग़लों की बनवाई इमारतों को भी टक्कर देती है.

नवाब ने गद्दी पर बैठते ही लखनऊ को प्रतिष्ठित कर दिया
आसफु़द्दौला, अवध के चौथे नवाब थे. 1775 में गद्दी पर बैठते ही उन्होंने अवध की राजधानी फैज़ाबाद से लखनऊ शिफ्ट कर ली थी. उनके शासनकाल में शिया संस्कृति का खूब प्रचार-प्रसार हुआ. वह ईरान और इराक के ज्ञानी लोगों से लगातार संपर्क में रहते थे. जब बहुत से आलिम यहां इस सिलसिले में आने लगे तो लखनऊ को ज्ञान के केंद्र के तौर पर देखा जाने लगा. वैसे आज भी यहां बाहर से बहुत से युवा ज्ञान की तलाश में आते रहते हैं क्योंकि इसके पास में ही यूपी के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेजों में एक किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज है.

बहरहाल कहा यह भी जाता है कि आसफ़ुद्दौला के शासनकाल में विलासिता के मामले में लखनऊ और निज़ाम के हैदराबाद की कड़ी टक्कर थी. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि आसफ़ को बेवजह हंसने की बड़ी आदत थी. यही नहीं वह दूसरों को खूब गाली देते थे और चाहते थे कि लोग भी पलटकर उन्हें गाली दें.

इमामबाड़ा ही नहीं एक शानदार व्यंजन भी आसफ़ुद्दौला की देन
ऐसा कहा जाता है कि आमिष (नॉनवेज) खाना खाने वालों की पसंदीदा निहारी भी इसी दौर में इजाद हुई. सुबह-सुबह जब गरीब कामगार इमामबाडे़ के निर्माण के लिए आते थे तो उन्हें सबसे पहले निहारी और रोटी खिलाई जाती थी. चूंकि यह सुबह निहार मुंह खाई जाती थी इसलिए इसका नाम निहारी पड़ गया. नवाब इसे बनाने के लिए रात के बचे गोश्त को खूब मिर्च-मसालों और पानी के साथ पकवाते और मजदूरों के आते ही उन्हें रोटी के साथ निहारी परोस दी जाती. इसका कारण यह भी था कि सुबह-सुबह भारी खाना खा लेने से दिनभर काम करने की ताकत बनी रहती थी.

ग़ज़लें लिखने के भी शौकीन थे आसफ़ुद्दौला
आसफ़ुद्दौला को गज़ल़ और शेर-ओ-शायरी से खासा लगाव था. शेर-ओ-शायरी से उन्हें किस कदर मोहब्बत रही होगी, इसका अंदाजा इससे लगाइए कि उन्होंने अपने दौर में दिल्ली के मशहूर शायर मीर तक़ी मीर को लखनऊ बुला लिया था. उन्होंने बकायदा मीर को लाने के लिए लखनऊ से सवारी भेजी थी. इतना ही नहीं मीर को 200 रुपये महीना वजीफा भी मुकर्रर किया था. साल 1797 में इंतकाल फरमा गए नवाब आसफ़ुद्दौला खुद भी ग़ज़लें लिखा करते थे. उनकी गज़ल़ का एक नमूना देखें-

या डर मुझे तेरा है कि मैं कुछ नहीं कहता
या हौसला मेरा है कि मैं कुछ नहीं कहता

हमराह रक़ीबों के तुझे बाग़ में सुन कर
दिल देने का समरा है कि मैं कुछ नहीं कहता

कहता है बहुत कुछ वो मुझे चुपके ही चुपके
ज़ाहिर में ये कहता है कि मैं कुछ नहीं कहता

कहता है तू कुछ या नहीं 'आसिफ़' से ये तू जान
याँ किस को सुनाता है कि मैं कुछ नहीं कहता


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