ANALYSIS: कांग्रेस और नायडू के 'नए प्रेम' को लेकर क्यों उत्साहित नहीं हैं विपक्षी नेता...
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इस साल जनवरी में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम में शरीक होने के दावोश जाना था. वहीं दिल्ली और अमरावती स्थित नायडू के दफ्तर के बाहर काफी गहमागहमी थी. सीएम ऑफिस उसी दिन तिरुपति में वाईएसआर कांग्रेस के प्रमुख जगन मोहन रेड्डी के इंटरव्यू के बारे में जाना चाहता था. दरअसल उस वक्त खबर आई थी कि केंद्र सरकार अगर आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देती है तो जगन बीजेपी के साथ गठबंधन करने को तैयार हैं.

दावोस में नायडू ने 25 कंपनियों के सीईओ से मुलाकात की. इस दौरान वह तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के बेटे केटी रामाराव के साथ तस्वीर खिंचाते. उसी हफ्ते अमरावती लौटने के बाद नायडू ने भविष्य के अपने सियासी कदम को लेकर उधेड़बुन शुरू कर दी.

संसद के शीत सत्र से पहले उन्होंने केंद्र पर आंध्र प्रदेश की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए बीजेपी को अल्टीमेटम भी दे दिया. वहीं दूसरी तरफ वह एनडीए के बाहर अपने लिए नए विकल्पों की तलाश में भी जुट रहे.

ससंद के बजट सत्र से पहले टीडीपी के सांसद ने संकेत दिए कि नायडू बस एनडीए से नाता तोड़ने तक ही नहीं रुकेंगे. वह केंद्र में बीजेपी विरोधी मोर्चा बनाने की भी कोशिश करेंगे.

टीडीपी सुप्रीमो ने भी पिछले आठ महीनों के दौरान कुछ ऐसा ही करते देखे गए. दरअसल यूपीए के मौजूदा और संभावित सहयोगियों के उलट टीडीपी को अपनी इस कोशिश में रत्ती भर भी अपनी सियासी जमीन खिसकने का डर नहीं.

आंध्र प्रदेश के बंटवारे के बाद टीडीपी ही एकमात्र (तमिलनाडु में डीएमके की भी यही स्थिति कही जा सकती है) ऐसी पार्टी है जिसे राज्य में कांग्रेस के फलने-फूलने का डर नहीं. दरअसल आंध्र में जगन मोहन रेड्डी ने जब वाईएसआर कांग्रेस बनाई तो कांग्रेस के करीब-करीब सभी बड़े नेता उनके साथ हो लिए. इसके अलावा कांग्रेस अगर भविष्य में यहां मजबूत होती है, तब भी नायडू को इससे कोई खास खतरा नहीं, क्योंकि दोनों पार्टियों का जनाधार अलग-अलग है.

हालांकि दूसरे क्षत्रपों के मामले में यह बात थोड़ी अलग है, क्योंकि उनमें से ज्यादातर ने कांग्रेस के वोटबैंक में सेंध लगाकर ही अपना सियासी महल तैयार किया है. उत्तर प्रदेश में बीएसपी ने कांग्रेस के दलित वोटों में सेंधमारी की, तो मुलायम और लालू ने मुस्लिमों वोटरों को अपने साथ कर लिया. ममता बनर्जी की टीएमसी और शरद पवार की एनसीपी का भी दारोमदार कांग्रेस के सियासी फलक पर ही टिका है.

ये सभी क्षेत्रीय पार्टियां केंद्र और राज्य में बीजेपी को रोकना तो चाहती हैं, लेकिन एक मजबूत कांग्रेस राज्य में उनकी सियासत के लिए नुकसानदेह हो सकती है. इसके अलावा इन पांच क्षत्रपों में कम से कम तीन ने प्रधानमंत्री बनने के सपने भी पाल रखे हैं.

वहीं कांग्रेस के लिए नायडू के ऐसे 'सारथी' साबित हो सकते हैं, जो कांग्रेस के साथ सीधे डील करने में कतरा रहीं क्षेत्रीय पार्टियों के साथ बातचीत का रास्ता खोल सकते हैं. नायडू ही एकमात्र वरिष्ठ नेता हैं, जिन्होंने खुद दिल्ली आकर राहुल गांधी से मुलाकात की थी. उन्होंने खुले तौर पर कांग्रेस को विपक्षी धड़े की अहम कड़ी करार दिया, जबकि दूसरे विपक्षी नेता का रुख यही है कि चुनावी बिसात पर कांग्रेस का पराक्रम साबित होने के बाद ही वह उसे रहनुमा मानेंगे.

शायद यही वजह है कि नायडू को छोड़ दें तो विपक्ष के ज्यादातर नेताओं ने दिल्ली में इस हफ्ते के अंत में होने वाली महागठबंधन की बैठक को लेकर उस तरह का उत्साह नहीं दिखाया. वे सभी अपने आगे के कदम के लिए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रदेशन का इंतजार कर रहे हैं.


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