सपा का 'अपमान' भूलने के पीछे मायावती का यह है असल मकसद
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कुछ राजनेता कुशल वक्ता होते हैं. वो जनता को अपनी बातों या फिर अर्थपूर्ण विराम के साथ मंत्रमुग्ध कर सकते हैं. लेकिन सिर्फ एक अच्छा वक्ता होना राजनीतिक नेतृत्व को स्थापित करने के लिए काफी नहीं है.

बिहार में लालू प्रसाद शायद इस पीढ़ी के सबसे तेज-तर्रार नेता हैं. वहीं उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव अपनी अस्पष्ट बोली के लिए जाने जाते हैं. हालांकि, दोनों ने अपने क्षेत्र और मतदाताओं पर कब्जा कर रखा है.

दूसरी ओर, बसपा प्रमुख मायावती जब भी अपने मतदाताओं से बात करती हैं या फिर प्रेस कॉन्फ्रेस करती हैं तो ऐसा लगता है कि वो एक कागज पर लिखी बातों को सिर्फ पढ़ रही हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा के गठबंधन का ऐलान करने के लिए हुई संयुक्त प्रेस वार्ता में भी मायावती ने कुछ ऐसा ही किया.

मायावती ने बताया कि उन्होंने लखनऊ के मशहूर गेस्ट हाउस कांड को भूलने और सपा को इसके लिए माफ करने का फैसला क्यों किया. हालांकि उन्होंने कई बार उस घटना का जिक्र किया है कि जब 90 के दशक में बसपा ने मुलायम सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया था, तब क्या हुआ था.

मायावती ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि 25 साल पहले भी सपा-बसपा के एक होने की कोशिशें हुई थीं, जिसका अंत गेस्ट हाउस कांड से हुआ था, लेकिन देश व समाज के हित को देखते हुए हमने उस घटना भुला दिया है.

बीजेपी को हराने के लिए दोनों क्षेत्रीय दलों ने हाथ मिलाकर साथ लड़ने का फैसला किया है, लेकिन दोनों पार्टी इस बात को अच्छी तरह से समझती हैं कि सिर्फ चुनावी समझौते पर हस्ताक्षर करना करने से सफलता नहीं मिलेगी. गठबंधन को जमीनी स्तर पर भी साथ आना होगा.

मायावती ने 2007 में दलितों और मुसलमानों के साथ उच्च जातियों के एक वर्ग को जुटाकर सपा को हराया था. पांच साल बाद मुलायम सिंह ने भी यही दोहराया था

ऐसे में अब दोनों पार्टियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी पार्टी के कार्यकर्ता जमीन पर साथ मिलकर काम करें. अपने गांवों में राजनीतिक पद और सत्ता के लिए एक-दूसरे से कॉम्पटीशन कर रहे जाटव और यादव को मिलकर एक-दूसरे के लिए काम करना होगा. अगर सपा किसी चुनाव क्षेत्र में यादव उम्मीदवार को मैदान में उतारती है, तो पिछले दशकों की कड़वाहट को भुलाते हुए बीएसपी को उस उम्मीदवार को समर्थन देना होगा और इसी तरह सपा को बीएसपी के उम्मीदवार का समर्थन करना होगा.

इस मामले में बीएसपी का एक प्रभावशाली ट्रैक रिकॉर्ड रहा है. वह निरपेक्षता के साथ वोट ट्रांसफर करती है. यही वजह है कि जब अखिलेश यादव ने मंच संभाला तो उन्होंने लंबे समय तक पार्टी को बसपा के साथ जमीनी स्तर पर काम करने के लिए कहा. उन्होंने यह भी कहा कि मायावती का अपमान मेरा अपमान है.

अखिलेश यादव के पिता ने भी ऐसा किया था. नब्बे के दशक की शुरुआत में मुलायम सिंह ने कांशीराम को इटावा से अपना पहला लोकसभा चुनाव जीतने में मदद की थी. उस चुनाव ने दोनों के संबंधों को मजबूत किया था. यह एक ऐसा गठबंधन था, जिसने बीजेपी को उस वक्त हराया था जब राम मंदिर आंदोलन उफान पर था.

अखिलेश और मायावती के बीच हुए इस समझौते की सफलता भी मुलायम सिंह ने कांशीराम के गठबंधन की तरह एक दूसरे को वोट ट्रांसफर करने की क्षमता पर ही निर्भर करती है.

मायावती ने यह भी बताया कि गठबंधन ने कांग्रेस को पटरी पर लाने की जहमत नहीं उठाई. हालांकि यहां पर उन्होंने 'सांपनाथ-नागनाथ' वाला तंज तो नहीं दोहराया, लेकिन यह साफ किया कि ग्रेस का वोट बीएसपी या सपा के लिए ट्रांसफर नहीं होता. कांग्रेस का उम्मीदवार न होने पर इस भव्य पुरानी पार्टी का मतदाता भाजपा की तरफ चला जाता है.


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