ओशो के आश्रम में टॉयलेट तक धोता था बॉलीवुड का ये स्‍टार
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विनोद खन्ना उस वक्‍त बॉलीवुड में दूसरे नंबर के स्‍टार माने जाते थे. हालांकि उससे कुछ वक्‍त पहले से उन्‍होंने फिल्‍म निर्माताओं को फिल्‍में करने से मना कर दिया था. यहां तक कि कुछ फिल्‍में जिसे वो साइन कर चुके थे, उनका साइनिंग अमाउंट तक वापस कर दिया था. विनोद खन्‍ना ने मुंबई के होटल सेंटूर में प्रेस कांफ्रेंस बुलाई तो मीडिया के लिए ये हैरानी की बात थी, क्योंकि तब आज की तरह बॉलीवुड स्टार शायद ही कभी प्रेस कांफ्रेंस बुलाते थे. विनोद खन्ना महरून रंग का चोला और ओशो की तस्वीर वाली मनकों की माला पहनकर आए. उनकी पहली पत्नी गीतांजलि और दोनों बेटे अक्षय और राहुल भी उस वक्त उनके साथ थे. प्रेस कॉन्‍फ्रेंस ने विनोद ने बताया कि वह फिल्‍मों से संन्‍यास ले रहे हैं.

विनोद खन्ना 70 के दशक में आचार्य रजनीश से प्रभावित होने लगे थे. 1975 के ठीक आखिरी दिन वह रजनीश आश्रम में संन्यासी बन गए. इससे पहले उन्होंने घंटों रजनीश के वीडियो देखे. उनके साथ समय बिताया. 70 के दशक के आखिरी सालों में वह सोमवार से लेकर शुक्रवार तक बॉलीवुड में काम करते. फिर उनकी मर्सीडिज कार पुणे की ओर भागती नजर आती. सप्ताहांत के दो दिन पुणे के ओशो आश्रम में गुजरते, जहां पहले तो वह होटल में रुकते थे. फिर आश्रम में ही ठहरने लगे. वहीं पर काम करते और आश्रम के टॉयलेट तक धोते थे.

दूसरे सन्‍यासियों की तरह ही करते थे काम
आश्रम में जैसे ही वह अंदर पैर रखते, उनका स्टार का चोला उतर जाता, वह रजनीश के दूसरे शिष्यों की तरह हो जाते. उन दो दिनों में ध्यान और आश्रम के अन्य कार्यक्रमों के बाद उन्हें बगीचों की सफाई के काम में तल्लीन देखा जाता. आश्रम के बाहर उनका ड्राइवर कार के साथ खड़ा होता. वह अंदर जमीन पर गिरे सूखे पत्ते उठाकर कूड़ेदान में डालते देखे जाते. आश्रमवासियों के बीच वह स्वामी विनोद भारती थे, उन्हीं सबकी तरह. सबसे मुस्कुराकर आत्मीयता से मिलने वाले.

शूटिंग पर भी रजनीशी चोले में पहुंचते थे विनोद
बॉलीवुड के पुराने फिल्म पत्रकार याद करते हैं कि किस तरह विनोद शूटिंग पर भी रजनीशी चोले में पहुंचते थे. इसे तभी उतारते जब सेट शॉट के लिए पूरी तरह तैयार हो जाता. मिलने वालों से यही कहते, रजनीश धरती पर इकलौते जीवित भगवान हैं. 80 के दशक की शुरुआत में पुणे के रजनीश आश्रम में दिक्कतों की खबरों आने लगी थीं. स्थानीय प्रशासन का रुख कड़ा था. रातों-रात रजनीश के अमेरिका के ओरेगॉन जाने की खबर आई. वह प्रिय शिष्यों को वहां साथ रखना चाहते थे. विनोद खन्ना से भी चलने को कहा.

ओरेगॉन में स्वामी विनोद भारती को माली का काम मिला
प्रेस कांफ्रेंस में सभी को जो अंदाज था, वही हुआ. विनोद खन्ना ने बॉलीवुड छोड़कर ओरेगान के रजनीशपुरम जाने की घोषणा कर दी. उन्होंने कहा- मैं फिल्में छोड़ रहा हूं. फिर अपना परिवार भारत में छोड़कर चले गए. ओरेगॉन में स्वामी विनोद भारती को माली का काम मिला. वह सुबह जल्दी उठते. पौधों को पानी देते. कांटते-छांटते. गार्डन की देखरेख करते. उस दौरान विनोद खन्ना की खबरें आनी बंद हो गईं. हालांकि जब कोई भारतीय अतिथि ओरेगान के रजनीशपुरम में जाता तो विनोद उससे यही कहते, मैं ओशो का माली हूं. ओरेगॉन के रजनीशपुरम में उन्हें एक छोटा सा कमरा मिला. छह बाई चार फुट का. वह इसी में खुश और संतुष्ट थे.

1985 में फिर एक दिन वह वापस लौट आए
1985 में फिर एक दिन वह वापस लौट आए. एक भारतीय पत्रिका के कवर पर सफेद दाढी में उनकी तस्वीर छपी. कई तरह की बातें उड़ीं. मसलन - उनके पास पैसा खत्म हो चुका है. रजनीश से उनके मतभेद हो गए हैं. दरअसल वर्ष 85 उथल-पुथल भरा था. बचपन की दोस्त गीतांजलि, जिससे शादी की थी, उससे तलाक गया. रजनीश को अमेरिकी सरकार ने वापस भेज दिया था. वह रजनीश से ओशो के रूप में रूपांतरित होकर 1987 में वापस पुणे लौट आए.

ताजिंदगी ओशो से जुड़े रहे
जब विनोद लौटे तो लगातार यही कहा कि वह ताजिंदगी ओशो से जुड़े रहेंगे. ऐसा ही हुआ भी. वह लगातार पुणे जाते रहे. उन्होंने फिर फिल्में करनी शुरू कर दीं. निर्माताओं की कतार उनके घर पर जुटने लगी. आते ही उन्होंने जितने पैसे लेने शुरू किए, वो अमिताभ बच्चन के बाद सबसे ज्यादा रकम थी. हालांकि वह राजनीति की ओर भी मुड़ गए. 1997 में गुरदासपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ा और अटल सरकार में पर्यटन राज्यमंत्री बने.

27 अप्रैल 2017 को जब मुंबई में विनोद खन्ना का निधन हुआ तो ओशो आश्रम की आधिकारिक वेबसाइट पर उसी दिन एक सूचना प्रसारित हुई, हम स्वामी विनोद भारती की याद में कोरेगांव पार्क में एक संगीतमय कीर्तन आयोजित करेंगे. आश्रम की पुस्तिका पर ओशो संन्यासियों ने अपने अनुभवों को लिखकर उन्हें याद किया.


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