ममता की महारैली क्या बीजेपी के लिए 'ताबूत की आखिरी कील' साबित होगी?
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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता की परेड ग्राउंड की अपनी रैली को बीजेपी के लिए 'ताबूत की आखिरी कील' बताया है. इस रैली के लिए काफी तैयारियां की गई हैं. दावा 15 लाख से ज्यादा लोगों के जुटने का किया जा रहा है.

रैली की तैयारियों से उत्साहित ममता बनर्जी ने कहा, 'तृणमूल कांग्रेस की तरफ से विपक्ष की 19 जनवरी को कोलकाता में आयोजित हो रही विशाल रैली लोकसभा चुनावों में बीजेपी के लिए 'ताबूत की कील' साबित होगी.' ममता ने साफ कर दिया कि लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय दलों की भूमिका निर्णायक रहने वाली है. टीएमसी सुप्रीमो की तरफ से बीजेपी की सीटों को लेकर भी बयान आया है. ममता का कहना था कि 'अगले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 125 से ज्यादा सीटें नहीं मिलने वाली हैं.'

तो सवाल उठता है कि क्या कोलकाता से विपक्षी दलों की एकजुटता और एक मंच पर आना बीजेपी की मौजूदा सरकार के लिए खतरे की घंटी साबित होगा? क्या सही में बीजेपी के लिए कोलकता से निकला संदेश उसकी ताबूत की आखिरी कील साबित होगी जैसे ममता बनर्जी दावा कर रही हैं? यह समझने के लिए पहले ममता की रणनीति और उनकी राजनीतिक मंशा को समझना होगा.

क्या है ममता की मंशा?
दरअसल, ममता बनर्जी पिछले कई महीनों से कोलकाता में सभी विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की कोशिश में हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले चुनावी साल में 19 जनवरी की रैली की तारीख जब तय हुई थी, तभी से ही इस बात का अनुमान लगाया जा रहा था कि उनकी कोशिश रैली के माध्यम से अपने-आप को विपक्षी एकता के केंद्र में लाने की है. अब वही दिख भी रहा है. ममता बनर्जी न ही थर्ड फ्रंट की पक्षधर हैं और न ही किसी ऐसे फ्रंट के साथ खड़ी दिखना चाहती हैं जिसमें गैर-बीजेपी के साथ गैर-कांग्रेसी दलों का जमावड़ा लगे.

उनकी इस कोशिश को उनकी राजनीतिक परिपक्वता से जोड़कर देखा जा रहा है, क्योंकि कुछ दिन पहले जब तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर ने फेडरल फ्रंट बनाने की कोशिश के तहत कोलकाता जाकर ममता बनर्जी से मुलाकात की तो ममता बनर्जी की तरफ से उन्हें किसी भी तरह की गर्मजोशी नहीं दिखी. केसीआर निराश भी हुए. अब कांग्रेस विरोध के नाम पर कोलकाता की रैली से भी अपने-आप को उन्होंने दूर ही रखा है.

लेकिन, टीएमसी की इस रैली में आरजेडी नेता तेजस्वी यादव, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू, दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल, जेडीएस नेता और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा, नेशनल कांफ्रेंस प्रमुख फारुख अब्दुल्ला, डीएमके के अध्यक्ष एम के स्टालिन समेत कई दूसरे नेता शामिल हो रहे हैं.

इसके अलावा रैली में एसपी अध्यक्ष अखिलेश यादव, बीएसपी महासचिव सतीश चंद्र मिश्र और आरएलडी से जयंत चौधरी शामिल होंगे. सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी के नेता रहे यशवंत सिंहा और अरुण शौरी इस रैली में शामिल होंगे, जबकि, पार्टी से बागी चल रहे पटना साहिब से सांसद शत्रुघ्न सिंहा भी ममता बनर्जी के साथ मंच साझा कर सकते हैं.

राहुल गांधी ने भी किया समर्थन, लेफ्ट ने बनाई दूरी
ममता बनर्जी की रैली में लेफ्ट के नेता शामिल नहीं होंगे. सूत्रों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल की कांग्रेस इकाई की मंशा को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने खुद के बजाए मल्लिकार्जुन खड़गे को कोलकाता भेजने का फैसला किया है.

उधर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मेगा रैली से ठीक एक दिन पहले पत्र लिखकर ममता बनर्जी की रैली को समर्थन देने का फैसला किया है. उन्होंने पत्र में लिखा है, 'पूरा विपक्ष एकजुट है. एकजुटता के इस कार्यक्रम के लिए मैं ममता दी को समर्थन देता हूं. मैं आशा करता हूं कि इसके जरिए हम एक शक्तिशाली, एकजुट भारत का संदेश दे सकेंगे.'

ममता के निशाने पर केवल बीजेपी
ममता बनर्जी की कोशिश भी यही है कि इस दिन मंच से सभी विपक्षी नेताओं की मौजूदगी और उनकी धमक का एहसास कर पश्चिम बंगाल में भी अपने समर्थकों और विरोधियों को एक बड़ा संदेश दिया जाए. ममता को लगता है कि राज्य में उनकी पार्टी का मुकाबला बीजेपी से ही रहने वाला है. लेफ्ट और कांग्रेस के जनाधार को अपने साथ जोड़ चुकीं ममता बनर्जी अपने लिए खतरा बीजेपी को ही मान रही हैं, लिहाजा, उनके निशाने पर मोदी-शाह और बीजेपी-संघ है.

ममता बनर्जी इस बात को बखूबी समझती हैं कि लोकसभा चुनाव में उनकी ताकत के दम पर ही लोकसभा चुनाव बाद उनकी अपनी दावेदारी भी निर्भर करेगी. एक तरफ अपने-आप को विपक्षी एकता की केंद्र में रखने की कोशिश भी कर रही हैं. दूसरी तरफ, राज्य में ज्यादा सीटों पर जीत पर उनकी नजर भी है. राज्य की 42 लोकसभा सीटों में से 34 पर टीएमसी, चार पर कांग्रेस जबकि दो-दो सीटों पर बीजेपी और सीपीएम का कब्जा है. ममता की कोशिश इस संख्या को 34 से भी ज्यादा बड़ा करने पर है.

ममता बनर्जी को लगता है कि बीजेपी जितनी कमजोर होगी, उसका फायदा उन्हें ही मिलेगा. उनकी कोशिश केवल बंगाल ही नहीं देश के दूसरे हिस्सों में भी बीजेपी को कमजोर दिखाने की है, भले ही उनकी पार्टी का जनाधार दूसरे राज्यों में न के बराबर है.

लेकिन, ममता बनर्जी की तरह और दूसरे क्षेत्रीय दलों के नेताओं के भीतर भी उतनी ही बड़ी महात्वाकांक्षा है. ममता के अलावा, मायावती और केसीआर भी चुनाव बाद किसी भी तरह की संभावना को लेकर अपनी पोजिशनिंग की कोशिश कर रहे हैं, जो कि इन नेताओं की खुद की कोलकाता की रैली से गैर-मौजूदगी के तौर पर सामने आ रहा है. ऐसे में एक राज्य में सिमटी हुई पार्टी की नेता ममता बनर्जी की तरफ से छेड़ी गई मुहिम से बीजेपी पूरे देश में धाराशायी हो जाएगी, ऐसा कहना मुश्किल है.


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