राजनीति में शामिल होने को लेकर प्रियंका गांधी का मन बदलने के मायने
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रशीद किदवई

प्रियंका गांधी ने 24 अप्रैल, 2009 को एक इंटरव्यू में कहा था, 'सच कहूं तो मेरे लिये यह साफ है कि मैं राजनीति में नहीं जाना चाहती हूं. मैं अपनी जिंदगी में खुश हूं. मुझे लगता है कि राजनीति के कई पहलू ऐसे हैं जो मुझे सूट नहीं करते हैं.' उस दिन के बाद भी कांग्रेस नेता आश्वस्त नहीं थे कि प्रियंका गांधी अपनी उस बात पर बनी रहेंगी. बुधवार को जब कांग्रेस ने प्रियंका को पूर्वी यूपी की कमान देने की घोषणा की तो कई नेताओं के चेहरे पर एक मुस्कान थी.

लखनऊ का नेहरू भवन हो या फिर दिल्ली का 24, अकबर रोड... दोनों ही जगहों के कई नेताओं को लगता है कि राजनीति में प्रियंका गांधी की एंट्री का असर सिर्फ पूर्वी यूपी तक सीमित नहीं रहेगा. लोकसभा चुनाव को तीन महीने से भी कम वक्त बचा है. ऐसे में प्रियंका गांधी की राजनीति में एंट्री सत्तारूढ़ बीजेपी-एनडीए और थर्ड-फ्रंट के नेताओं के लिए किसी झटके से कम नहीं है.

ऊपरी तौर पर बात करें तो प्रियंका को प्रोजेक्ट करने के पीछे कांग्रेस का मकसद यूपी में लगातार हार से हताश कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार करना है. आगामी लोकसभा चुनाव में यदि कांग्रेस यूपी में अच्छा प्रदर्शन करती है तो केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार की वापसी मुश्किल होगी.

कांग्रेस का इतिहास रहा है कि नेहरू-गांधी परिवार के सदस्य जोड़ियों में काम करते रहे हैं. ऐसे में यह पहली बार नहीं होगा जब परिवार के दो सदस्य पार्टी में उच्च पदों पर बैठे होंगे. साल 1959 में जब जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री थे तब इंदिरा गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाया गया था. कई लोगों का मानना था कि नेहरू ने अपनी बेटी को आगे करने के लिए यह कदम उठाया है, हालांकि कांग्रेस नेताओं का मानना था कि इंदिरा ने अपनी मेहनत और काबिलियत के दम पर वह पद हासिल किया है.

ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी की प्रमुख के तौर पर इंदिरा गांधी ने केरल क्राइसिस को अच्छे तरीके से हैंडल किया. उन्होंने अलग राज्य के तौर पर महाराष्ट्र और गुजरात के निर्माण का सुझाव दिया ताकि वहां आ रही भाषाई समस्याओं का हल निकाला जा सके. 1960 में जब उनका कार्यकाल खत्म हुआ तो कांग्रेस की कार्यकारी कमेटी ने उनसे दोबारा चुनाव लड़ने के लिए कहा लेकिन उन्होंने इससे इनकार कर दिया.

दूसरी तरफ 1974 से 1980 के बीच संजय गांधी ने कांग्रेस में कोई औपचारिक पद नहीं लिया (वह बेहद कम समय के लिए कांग्रेस महासचिव बने थे) लेकिन संगठनात्मक और प्रशासनिक मामलों में वह इंदिरा के बराबर माने जाते थे. जून, 1980 में प्लेन क्रैश में मौत से कुछ सप्ताह पहले उनके सहयोगी राम चंद्र रथ उन्हें पार्टी अध्यक्ष के तौर पर देखने लगे थे. रथ कहते थे, “सुभाष चंद्र बोस और जवाहर लाल नेहरू काफी कम उम्र में एआईसीसी के नेता बन गए थे. ऐसे में यदि पार्टी उन्हें (संजय को) अध्यक्ष के तौर पर चुनती है तो यह पूरी तरह लोकतांत्रिक होगा. इसमें कुछ भी गलत नहीं है."

संजय के भाई राजीव गांधी 1983 में कांग्रेस महासचिव बने. तब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं. उन्हें 24, अकबर रोड में इंदिरा के पास वाला कमरा दिया गया था. राजीव की बातें मायने रखती थीं और इंदिरा कैबिनेट के कई मंत्रियों को राजीव के ऑफिस के बाहर इंतजार करते देखा जा सकता था.

2006 से 2014 के बीच सोनिया और राहुल के फंक्शनल रिलेशनशिप की एक बात देखी गई कि यूपीए के मंत्रियों को राहुल गांधी से मिलने उनके ऑफिस जाने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता था. हालांकि इन मंत्रियों में टीम राहुल के सदस्य माने जाने वाले अजय माकन, आरपीएन सिंह, मिलिंद देवड़ा, सचिन पायलट जैसे युवा नेता शामिल नहीं थे.

तो क्या होगी प्रियंका की भूमिका?

यूपीए की 10 साल की सरकार में राहुल गांधी का राजनीतिक कद नहीं बढ़ा. इस दौरान राहुल की छवि एक अस्पष्ट, अनिच्छुक और नॉन-सीरियस नेता के रूप में बन गई. ऐसे में राहुल के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि वह खुद को एक विश्वसनीय नेता के रूप में पेश कर सकें जो जनता के लिए 24 घंटे उपलब्ध रहे. उन्हें यह भी साबित करना था कि वह बीजेपी को हराने का मद्दा रखते हैं. 11 दिसंबर, 2018 को उन्होंने यह करके दिखा भी दिया. पार्टी ने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल किया था. एमपी और छत्तीसगढ़ में तो पार्टी ने बीजेपी की 15-15 साल पुरानी सरकार गिराई थी.

भारत की आजादी के 72 साल में से 59 साल तक गांधी परिवार ने कांग्रेस का नेतृत्व किया है. कांग्रेस के हर कद के नेता नेतृत्व के लिए गांधी परिवार की तरफ देखते हैं.

जवाहर लाल नेहरू से इंदिरा, राजीव गांधी और सोनिया गांधी तक गांधी परिवार का कोई भी सदस्य असफल नहीं हुआ है और न ही राजनीति से अचानक बाहर हुआ है. इसी का नतीजा है कि कांग्रेस नेताओं की गांधी परिवार पर पूरी आस्था है और गांधी परिवार के इतर नहीं देखते हैं. राहुल गांधी और अब प्रियंका गांधी को उसी उम्मीद को बनाए रखना होगा. उनके सामने कांग्रेस नेताओं की राजनीतिक समझ को सही साबित करने की चुनौती होगी.

प्रियंका ने कई बार कहा है, "अपने भाई की मदद के लिए मैं कुछ भी करूंगी..." प्रियंका की पूरी राजनीति राहुल गांधी को सफल बनाने के इर्द-गिर्द घूमती है. राहुल के नेतृत्व को फिलहाल प्रियंका की राजनीति में औपचारिक एंट्री की आवश्यकता थी. ऐसे में 10 साल पहले एक इंटरव्यू में कही अपनी बात को भूलकर छोटी बहन ने राजनीति में एंट्री कर ली.

(लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में विजिटिंग फेलो और वरिष्ठ पत्रकार हैं. यहां व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं.)


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