ओडिशा में कांग्रेस के लिए राह आसान नहीं, पार्टी को मजबूत करना चमत्कार से कम नहीं होगा
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उत्तर भारत के तीन राज्यों में जीत से जहां कांग्रेस पार्टी का आत्मविश्वास बढ़ा हुआ नज़र आ रहा है वहीं पिछले हफ्ते केंद्रीय मंत्री श्रीकांत जेना और उनके नजदीकी समर्थक कृष्ण चंद्र सागरिया को पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण निकाले जाने पर पार्टी के लिए राज्य में दिक्कतें हो सकती हैं.

दूसरी दिक्कत कार्यकारी अध्यक्ष नबाकिशोर दास और सुंदरगढ़ के विधायक जोगेश सिंह के पार्टी छोड़ने की वजह से शुरू हुई. नबाकिशोर दास का पार्टी से जाना पार्टी के लिए काफी नुकसानदायक साबित हो सकता है क्योंकि जब पूरे प्रदेश में पार्टी का ग्राफ नीचे जा रहा था उस वक्त भी उनके जिले में कांग्रेस की स्थिति अच्छी थी. उनकी इसी जमीनी पकड़ को देखते हुए बीजेडी ने उन्हें अपनी पार्टी में लेने की कोशिश की. इसके अलावा डॉक्टर प्रफुल्ल मांझी और प्रकाश बेहरा जैसे नेता भी ऐसा संकेत दे रहे हैं कि वो पार्टी छोड़ सकते हैं. इन सभी नेताओं का पार्टी छोड़ना कांग्रेस के लिए घातक हो सकता है.

सवाल है कि आखिर क्यों कांग्रेस पार्टी इस तरह के स्थिति में पहुंच गई. साल 2000 में जब से नवीन पटनायक सत्ता में आए हैं तब से लेकर अब तक पार्टी लगातार नीचे की ओर ही जा रही है. इसके पीछे दो कारण है. पहला- 2004 से, जब से कांग्रेस पार्टी केंद्र में सत्ता में है तब से वो नवीन पटनायक का सीधे तौर पर विरोध नहीं कर रही है. भले ही राज्य के नेताओं ने इसकी निंदा की हो लेकिन टॉप कांग्रेस नेता उनके खिलाफ कुछ भी कहने से बचते रहे हैं और अब यही चीज़ें बीजेपी के अंदर भी दिख रही हैं.

लोगों का यह भी कहना है कि 2013 में निरंजन को हटाए जाने के बाद नया पीसीसी अध्यक्ष बनाने में नवीन पटनायक की बड़ी भूमिका थी. जब जयदेव जेना 2008 में पीसीसी अध्यक्ष के पद से हटे थे तब उन्होंने था कि उनके पद से हटने के पीछे नवीन पटनायक का हाथ है.

दूसरा कारण है पार्टी का कई धड़ों में बंटा होना जो कि उड़ीसा कांग्रेस के लिए हमेशा परेशानी का सबब रहा है. निरंजन ने अपने पहले के पीसीसी प्रमुख जयदेव जेना और प्रसाद हरिचंदन की तुलना में विरोधियों को ज्यादा अच्छे तरीके से मैनेज किया लेकिन हाल ही में पार्टी से जिस तरह से कई नेताओं को निकाला गया वह दिखाता है कि पार्टी में अभी भी मतभेद व गुटबाजी जारी है.

इन परिस्थितियों में कांग्रेस पार्टी का बीजेडी के सामने चुनौती खड़ी कर पाना किसी चमत्कार से कम नहीं है. और जिस तरह से अभी कुछ और नेताओं के पार्टी छोड़ने के संकेत मिल रहे हैं उसे देखते हुए राज्य में दो दशकों बाद पार्टी का सत्ता का स्वाद चख पाने की राह आसान होती नहीं दिखती.


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