मोदी की राह हो सकती है आसान, छोटे दलों ने बढ़ाई कांग्रेस की टेंशन
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अक्षय शितोले

लोकसभा और विधानसभा चुनाव के ठीक पहले महाराष्ट्र में राजनीतिक दलों ने तौल-मौल शुरू कर दिया है. शिवसेना और भाजपा में खींचतान जग जाहिर है तो संविधान निर्माता बाबा साहेब आंबेडकर के पौत्र प्रकाश आंबेडकर की पार्टी भारिप बहुजन महासंघ भी पीछे नहीं है. एमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी से हाथ मिलाने वाले आंबेडकर ने अब राज्य की सभी 48 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर कांग्रेस और एनसीपी की मुसीबत बढ़ा दी है.

आंबेडकर यदि अकेले चुनाव लड़ेंगे तो इसका सीधा फायदा भाजपा और शिवेसना को होगा. कांग्रेस और एनसीपी को इसी बात का डर सता रहा है कि आंबेडकर की पार्टी उनके परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगाकर विपक्षी दलों की राह आसान कर देगी.

प्रकाश आंबेडकर की राजनीतिक रसूख पिछले साल भीमा-कोरेगांव विवाद के बाद काफी बढ़ गई है. अब वह पूरे राज्य में प्रभावशाली दल के रूप में उभर रहे है. ऐसे में आंबेडकर ने चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस का सिरदर्द बढ़ा दिया है. आंबेडकर ने रविवार को सोलापुर में ऐलान कर दिया कि उनकी पार्टी राज्य की सभी 48 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी.

कांग्रेस ने बनाई दूरी...!

प्रकाश आंबेडकर ने पिछले साल अक्टूबर में घोषणा की थी कि उनकी पार्टी असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एमआईएम के साथ जा रही है. इसके बाद दोनों नेताओं ने राज्य में कई साझा रैलियां भी की थी और साथ में चुनाव लड़ने का ऐलान भी किया था. ओवैसी से हाथ मिलाने की वजह से कांग्रेस ने आंबेडकर से दूरी बना ली थी.

ओवैसी के बयान से आया था ट्विस्ट

कांग्रेस और एनसीपी के साथ भारिप के समझौते के आसार लगभग खत्म हो गए थे. लेकिन असदुद्दीन ओवैसी के एक बयान ने सियासी समीकरण बदल दिए. ओवैसी ने कहा कि यदि आंबेडकर को कांग्रेस सम्मानजनक सीटें देंगी तो उनकी पार्टी एक भी सीट पर चुनाव नहीं लड़ेगी. इस बयान के बाद एनसीपी के नेताओं के जरिए आंबेडकर को गठबंधन में शामिल करने की चर्चा शुरू हो गई.

आंबेडकर ने बिगाड़ा कांग्रेस का गणित

प्रकाश आंबेडकर की पार्टी अब राज्य में 'खेल बिगाड़ेंगे'  वाली पोजीशन में आ गई है. उनकी पार्टी यदि गठबंधन का हिस्सा न होकर अकेले चुनाव लड़ती है तो कांग्रेस को आठ से नौ सीटों का नुकसान हो सकता है. भारिप का विदर्भ और पश्चिम महाराष्ट्र में प्रभाव है, ऐसे में ओवैसी के साथ मिलकर वह दलित और मुस्लिम वोटों में सेंध लगा सकते है, जिसका सीधा फायदा भाजपा और शिवसेना को होगा.

आंबेडकर को मनाने छगन भुजबल को सौंपी जिम्मेदारी

राजनीतिक गलियारों से आ रही खबरों के मुताबिक, आंबेडकर को मनाने के लिए एनसीपी के सीनियर लीडर छगन भुजबल को जिम्मेदारी सौंपी गई थीं. भुजबल के साथ कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अशोक चव्हाण और मानिकराव ठाकरे ने भी पिछले दिनों आंबेडकर के साथ बैठक की थी.

30 जनवरी का दिया था अल्टीमेटम

प्रकाश आंबेडकर ने अल्‍टीमेटम दिया था कि '30 तारीख तक हमारी सीटों पर फैसला करें, वरना हम अपना फैसला कर लेंगे.' अल्टीमेटम के चार दिन बीत जाने के बाद गठबंधन पर कोई फैसला नहीं हुआ तो आंबेडकर ने 'एकला चलो' का बिगुल फूंक दिया.

क्या कहते हैं राजनीतिक विश्लेषक

वरिष्ठ पत्रकार व्यंकटेश केसरी का मानना है कि प्रकाश आंबेडकर के बारे में कोई भी अंतिम राय बनाना जल्दबाजी होगा. उनके मुताबिक आंबेडकर अभी दबाव की राजनीति कर रहे हैं. फिर भी मान लिया जाए कि यदि वह कांग्रेस और एनसीपी के साथ नहीं जाते है तो इसका फायदा भाजपा को होगा. यदि भाजपा और शिवसेना मिलकर चुनाव लड़ती है तो आंबेडकर के अकेले चुनाव लड़ने से दोनों पार्टियों की राह आसान हो जाएगी.


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