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कसमें-वादे और मंहगाई का लोकतंत्र उत्सव
लोकतंत्र का उत्सव शुरू


चुनाव आयोग की घोषणा के साथ ही भारत में कसमें वादे, जाति,क्षेत्रवाद, परिवारवाद से परिपूर्ण दुनिया के सबसे खर्चीले लोकतंत्र का उत्सव शुरू हो गया है। सीमित संसाधनों के बीच खर्चे और अन्य गतिविधियों पर नजर रखने तथा चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करने पर कठोर कार्रवाई के बाद भी सबकुछ होना अपरिहार्य है। पिछले लगभग पाॅच-छह लोकसभा और इतने ही विधानसभा चुनाव उत्सव को करीब से देखने और समझने के बाद इतना जरूर समझ में आ गया कि भारत में आज भी चुनाव कसमें वायदे,भावनाओं को भुनने के साथ ही क्षेत्रवाद, जातिवाद और परिवार वाद से मुक्त नही हो पाया। लगभग हर चुनाव में कोई भी राजनैतिक दल ऐसा नही होगा जो लम्बे चैड़े वायदे और घोषणा पत्र जारी न करता हो लेकिन उसका कितना फायदा जनता को मिलता है, यह जनता अच्छी तरह जानती है। 
देश में दुनिया के सबसे महंगा चुनाव का दौर चल रहा है,  यह हमारे चिंतन का एक अनिवार्य विषय है। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज और राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार 29 राज्यों और सात केंद्र शासित प्रदेशों वाले विशाल लोकतंत्र में चुनावों का कुल खर्च इस बार 500 अरब रुपये से आगे जाएगा। वर्ष 2016 में अमेरिका में राष्ट्रपति और कांग्रेस (निचले सदन) के चुनावों में 6.5 अरब डॉलर अर्थात 455 अरब रुपये खर्च हुए थे। अमेरिका का रिकॉर्ड भारत के इस आम चुनाव में टूट जागएगा।, गौर करे कि हमारी वास्तविक खर्च क्षमताएं क्या हैं? अमेरिका में जहां हर व्यक्ति औसतन 6,000 रुपये से ज्यादा प्रतिदिन खर्च करता है, वहीं भारत में 60 प्रतिशत से ज्यादा लोगों का प्रतिदिन का खर्च तीन डॉलर यानी लगभग 210 रुपये है। ऐसे में अमेरिका तो महंगा चुनाव लड़ने और लड़ाने में समक्ष है पर भारत के लिए चिन्ता का विषय है। अमूनन ज्यादातर भारतीयों के पास प्रतिदिन खर्च के लिए 250 रुपये भी नहीं होते, लेकिन  चुनावी खर्च 560 रुपये के करीब पहुंच जाता है, तो क्यों? .
भारत में वर्ष 2014 के चुनावों में 300 अरब रुपये से ज्यादा हुए थे और अकेले चुनाव आयोग ने 4,000 करोड़ रुपये खर्च किए थे। जाहिर है। सीमित संसाधाने के चलते चुनावों को किफायती बनाने के लिए चुनाव आयोग की कोई विशेष तैयारी नही दिख रही। ऐसे में किसी ठोस पहल की आशा कैसे की जाए? चुनावों की घोषणा से लेकर 23 मई तक भारत के तन-मन-धन का एक बड़ा भाग चुनावों की भेंट चढ़ेगा तो  क्या करना चाहिए ं? ध्यान रहे, लोकतंत्र की जिम्मेदारी केवल चुनाव आयोग या सरकार या राजनीतिक पार्टियों पर ही नहीं है, हम मतदाताओं और नागरिकों का भी कर्तव्य है। महात्मा गांधी ने कहा था, केवल सरकार के भरोसे मत रहना। अतः किसी प्रत्याशी या किसी पार्टी का केवल खर्च देखकर उसे कतई वोट न करें। चुनावों को अमीरों का चुनाव न बनने दें। प्रत्याशी या पार्टी की गुणवत्ता पर गौर करें। हमारे चुनाव दुनिया के सबसे बड़े चुनाव अवश्य रहें, पर सबसे अच्छे व किफायती चुनाव के रूप में भी हमारे देश की ख्याति बने, तो सोने पर सुहागा होगा।दुनिया में जो बेहतर चुनाव वाले देश हैं, उनसे भी हमें सीखना चाहिए। डेनमार्क और कुछ अन्य यूरोपीय देशों के चुनावों को आदर्श कहा जाता है। वहां सुनिश्चित किया जाता है कि चुनावों में पैसे की भूमिका न्यूनतम रहे। टीवी पर प्रचार प्रतिबंधित रहता है। पर्चों, पोस्टर, सोशल मीडिया के जरिये ही ज्यादातर प्रचार चलता है। एक खूबी देखिए, डेनमार्क में मतदान प्रतिशत 80 से ज्यादा रहता है, जबकि महंगे चुनावों के लिए ख्यात अमेरिका में मतदान 60 प्रतिशत से भी नीचे होता है। आज हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे विशाल लोकतंत्र में चुनावों पर जो भी खर्च हो, वह देश को सभ्य और सकारात्मक दिशा में ले जाए। चुनावों में मन का महत्व बढ़े, धन का नहीं। ‘‘ भारत में जनतंत्र कामयाब नहीं हो सकता क्योंकि यहां की सामाजिक व्यवस्था, संसदीय लोकतंत्र के प्रारूप से मेल नहीं खाती। ‘‘ये किसी और का नहीं बल्कि स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री और भारतीय संविधान के प्रमुख वास्तुकार रहे डॉ भीमराव आंबेडकर का बयान है। जून, 1953 में उन्होंने बीबीसी को दिए एक बेहद विस्फोटक इंटरव्यू में ये बातें बड़ी साफगोई से कही थीं. भारत की चुनौतीरू क्या लोकतांत्रिक प्रयोग कामयाब रहेगा? इस खास सिरीज में बीबीसी भारत के नए जन्मे लोकतंत्र की समीक्षा कर रहा है. और इसी में आंबेडकर से हुई खास बातचीत भी शामिल है।
कभी अपने लोकतंत्र को आप गौर से देखिए, यह बेहद दिलचस्प है। यहाँ लोग जिस बात से परेशान रहते हैं, राजनैतिक दल उसे मुद्दा नहीं बनाते और जिसे मुद्दा बनाया जाता है, उसके आधार पर वोट नहीं डाले जाते। यहाँ नाराजगी किसी और बात को लेकर व्यक्त की जाती है और चुनावों में सजा किसी और बात के लिए मिल जाती है। दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में अनेक बिल्कुल विरोधाभासी स्थितियां देखने को मिलती हैं। आप देश में कहीं भी लोगों से पूछिए कि वे किन बातों से सबसे ज्यादा परेशानी महसूस करते हैं। वे बताएंगे कि वे भ्रष्टाचार से परेशान हैं, अफसरशाही से परेशान हैं, पुलिस और प्रशासन से परेशान हैं। कोई बताता है कि किस तरह उनके इलाके का विकास नहीं हो रहा है। किसी को रोजगार नहीं मिल रहा, किसी को अपनी फसल औने-पौने दामों में दलालों को बेचनी पड़ती है। लेकिन ये मुद्दे हमारे चुनावों में निर्णायक नहीं बनते। बहुत हुआ तो उम्मीदवारों के वोट मांगने आने पर कोई प्रतिनिधिमंडल उनसे इनका जिक्र कर देता है, उम्मीदवार आश्वासन दे देते हैं। लेकिन इसके लिए मतदाता उम्मीदवारों की बाँहें नहीं मरोड़ते। ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं कि किसी क्षेत्र से कोई उम्मीदवार सिर्फ इसलिए हार गया, क्योंकि पिछले चुनाव में उसने ऐसा कोई वादा किया था, जो पूरा नहीं हुआ। 
यदि आप नेताओं के बारे में बातचीत करें, तो दो टिप्पणियाँ जरूर सुनने को मिलती हैं। एक तो यह कि नेता चाहे किसी भी पार्टी के हों, वे भ्रष्ट हैं। दूसरे, चुनाव जीतने के बाद इन नेताओं का सारा ध्यान सिर्फ पैसा बनाने में लगा रहता है। यह सभी ने देखा है कि जो नेता महंगी गाडियों में अपने चुनाव क्षेत्रों में जाते हैं, उनकी लोकप्रियता बढ़ जाती है। सैकड़ों गाडिघ्यों का काफिला निकालना, हेलिकॉप्टर उतार देना, गाजे-बाजे के साथ नामांकन पत्र भरना ऐसे ही असर-रसूख का प्रदर्शन है। सिर्फ उम्मीदवार ही नहीं, वे राजनैतिक पार्टियां भी ऐसे प्रदर्शन करती हैं, जो अपने घोषणापत्रों में गरीबों के उत्थान या काला धन बाहर निकालने की बातें करती हैं। इसके ठीक उलट कई ईमानदार छवि वाले मास्टरसाहबनुमा उम्मीदवार या फटेहाल समाजसेवी या कुशल प्रशासक रहे अफसरान अपने कार्यकाल में तमाम वाहवाही लूटने के बावजूद चुनाव में औंधे मुंह गिरे नजर आते हैं। लोग कहते हैं कि जातिवाद ने इस देश को बर्बाद कर दिया। लेकिन तमाम राजनैतिक पार्टियां जाति के ही आधार पर उम्मीदवार खड़े करती हैं, और वे जीत भी जाते है। ऐसा ही मुद्दा परिवारवाद का है। पूरे देश में इसके खिलाफ तुमुल कोलाहल होता है, लेकिन नेता के बेटे, दामाद, बहू, भतीजी या भाई को मैदान उतारे जाते है ओर चुनाव जीतते हैं।
इस तरह के विरोधाभासों से दो तरह के निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। एक तो यह कि देश के मतदाता दोमुंहे हैं। वे कहते कुछ और हैं, करते कुछ और हैं। लेकिन अब दौर बदला है। जनता कुछ सोचने लगी है। उसे अपने आने वाले भविष्य को लेकर चितिंत देखा जा रहा है। इसलिए हमारा नैतिक दायित्व यह बनता है कि हमारी गाढ़ी कमाई से मनाए जाने वाले इस उत्सव में हम, परिवारवाद, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और विकास, क्षेत्रवाद, कालाधन जैसे मुद्दों पर गहराई से मंथन करने के बाद ही कोई ठोस निर्णय ले। 


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