अब चीन पर वैश्विक घेराबंदी जरूरी
चीन ने भारतीय हितों और अंतरराष्ट्रीय जनमत के खिलाफ


चीन चालबाज होने के साथ ही मौका परस्त है। भारत के प्रति उसकी जलन जगजाहिर है। चीन ने भारतीय हितों और अंतरराष्ट्रीय जनमत के खिलाफ जाकर पाकिस्तान में पल रहे आतंकी सरगना मसूद अजहर का बचाव करके यही साबित किया कि वह भारत को नीचा दिखाने के लिए किसी भी हद तक जाने और यहां तक कि आतंकवाद की तरफदारी करने को भी तैयार है। उसने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मसूद अजहर का चैथी बार बचाव करके यही दिखाया कि वह अपने संकीर्ण स्वार्थों के लिए विश्व व्यवस्था को खतरे में भी डाल सकता है। चीन के गैर-जिम्मेदाराना रवैये को देखते हुए इस नतीजे पर पहुंचने के अलावा और कोई उपाय नहीं कि वह भारत के खिलाफ पाकिस्तान का न केवल इस्तेमाल करता रहेगा, बल्कि उसे उकसाता भी रहेगा। ऐसे में संयुक्त राष्ट सुरक्षा परिषद को मिलकर चीन की वैश्विक घेराबंदी के साथ वैश्विक प्रतिबंध लगाना वक्त की मांग है। यूएन की 13 मार्च की बैठक में  चीन की चालबाजी के अलावा और कुछ नहीं कि उसे मसूद अजहर के खिलाफ और सुबूत चाहिए। जो सुबूत दुनिया के अन्य देशों को मान्य हैैं वे अगर चीन को अपर्याप्त दिख रहे तो इसीलिए, क्योंकि वह भारतीय हितों को चोट पहुंचाना चाह रहा है। वह प्रतिस्पर्धा करने के बजाय भारत की राह में रोड़े बिछा रहा है। इसी कारण एक ओर वह आतंकी सरगना के साथ खुल कर खड़े होना पसंद कर रहा और दूसरी ओर परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह यानी एनएसजी में भारत की सदस्यता में बाधक बन रहा है। यह हास्यास्पद है कि चीन को यह साधारण सी बात समझ में नहीं आ रही कि जिस आतंकी सरगना का संगठन संयुक्त राष्ट्र की ओर से प्रतिबंधित है उस पर भी पाबंदी लगना जरूरी है। चीन यह तो चाहता है कि भारत उसके हितों की परवाह करे, लेकिन वह खुद भारतीय हितों को तनिक भी चिंता नहीं कर रहा।

चीन ने वुहान में बनी समझबूझ को जिस तरह ताक पर रख दिया उसके बाद भारत को इस पर नए सिरे से विचार करना ही होगा कि उसके अड़ियल रवैये से कैसे पार पाया जाए? यह सोच-विचार केवल सरकार को ही नहीं, राजनीतिक दलों और आम लोगों को भी करना होगा। इसके लिए कोई दीर्घकालीन रणनीति भी बनानी होगी। यह तब बनेगी जब राजनीतिक दल दलगत हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता प्रदान करेंगे। दोगले चीन ने एक बार फिर भारत में पुलवामा समेत कई आतंकी हमलों के जिम्मेदार जैश-ए-मोहम्मद सरगना मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र की पाबंदी लगाने के प्रस्ताव पर वीटो कर दिया। पुलवामा हमले के बाद तीन महाशक्तियों अमेरिका, ब्रिटेन व फ्रांस ने यह प्रस्ताव रखा था, लेकिन चीन ने उसमें भी अड़ंगा डाल दिया। 10 साल में चैथी बार चीन ने मसूद को लेकर वीटो किया है। यूएन में एक राजनयिक ने दावा किया कि चीन ने तकनीकी बाधा को आधार बनाकर वीटो किया गया। मसूद अजहर पर पाबंदी का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 1267 अलकायदा पाबंदी समिति के समक्ष 27 फरवरी को पेश किया गया था। जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में आतंकी हमले में 40 सुरक्षाकर्मियों की जघन्य हत्या के बाद अमेरिका, ब्रिटेन व फ्रांस ने यह प्रस्ताव पेश किया था। इसी आतंकी हमले के बाद भारत-पाक के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया था। 1267 अलकायदा प्रतिबंध कमेटी के पास इस प्रस्ताव पर विचार के लिए 10 दिन का वक्त था।समय-सीमा खत्म होने के ठीक पहले चीन ने वीटो का इस्तेमाल कर प्रस्ताव को रोक दिया। चीन ने प्रस्ताव के परीक्षण के लिए और वक्त मांगा है। इसके पहले भी 2009 में भारत ने मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित करने का प्रस्ताव पेश किया था। 2016 में अमेरिका, ब्रिटेन व फ्रांस के साथ भारत ने प्रस्ताव रखा था। 2017 में अमेरिका, ब्रिटेन व फ्रांस ने प्रस्ताव रखा था। अब 2019 में फिर अमेरिका, ब्रिटेन व फ्रांस ने प्रस्ताव रखा, लेकिन वह भी खारिज हो गया। चीन का यह रवैया एशिया प्रशांत क्षेत्र में हो रहे कूटनीतिक और रणनीतिक बदलावों पर भी गहरा असर डालेगा। इसकी वजह यह है कि अब यह मामला सिर्फ भारत और पाकिस्तान के बीच नहीं रह गया है बल्कि आतंकवाद से त्रस्त अमेरिका समेत दूसरे देश भी मसूद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगाने को लेकर कड़े तेवर अपनाए हुए थे। अमेरिका की तरफ से  चीन की तरफ इशारा करते हुए यहां तक कहा कि मसूद पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश कामयाब नहीं हुई तो इससे क्षेत्रीय स्थिरता को नुकसान पहुंचेगा।जैसी कि आशंका थी, चीन ने एक बार फिर जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को ‘वैश्विक आतंकी ‘‘ घोषित होने से बचा लिया है। चीन ने चैथी बार ऐसा किया है। पुलवामा हमले के बाद जिस तरह से दुनिया के अनेक बडे देशों ने भारतीयों के गुस्से और उनकी तकलीफ को साझा किया था और जिस प्रकार पिछले साल फरवरी में फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (आतंकियों की फंडिंग पर नजर रखने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसी) की पेरिस बैठक में पाकिस्तान को ‘ग्रे लिस्ट ‘ में डाला गया था, उनको देखते हुए एक उम्मीद बनी थी कि चीन शायद इस बार कुछ अलग रुख अपनाए।चीन के ताजा रुख से साफ है कि इस मामले में वह भारत की दलीलों को समझने को तैयार नहीं है। दरअसल, मसूद अजहर जैसे तत्वों से निपटने का उसका अपना ही तरीका है। वह अपने देश में गड़बड़ियां फैलाने वालों को या तो खत्म कर देता है या फिर उन्हेें मजबूत सलाखों के पीछे फेंक देता है। लेकिन हम एक लोकतांत्रिक देश हैं, इसलिए संविधान में मुकर्रर वैधानिक प्रक्रिया अपनाते हैं। यहाॅ इस बाॅत पर गौर करना होगा कि  अपने वीटो से चीन हमको यही समझाने की कोशिश कर रहा है। जब तक यह बात हमें समझ में नहीं आएगी, हम सुरक्षा परिषद में बार-बार जाते रहेंगे और इस बीच मसूद अजहर को वक्त मिलता रहेगा कि वह नई साजिशें रचता रहे और हमारे देश में अपने नापाक इरादों को अंजाम देता रहे। पाकिस्तान तो आतंकियों को शह दे ही रहा है, अब चीन भी प्रकारांतर से यही कर रहा है। हाल के दिनों में सर्जिकल स्ट्राइक जैसी सीधी और सख्त कार्रवाइयों के जरिये हमने इस्लामाबाद पर कुछ ठोस दबाव बनाया था, लेकिन यूएन में जाने की पुरानी नीति का मोह नहीं त्यागा। ऐसा हम 1947-48 से करते आ रहे हैं कि जब भी वे दबाव में आते हैं, हम यूएन पहुंच जाते हैं। सन् 1947 में भी हम कश्मीर से पाकिस्तानियों को खदेड़ रहे थे, लेकिन फिर हम उसे छोड़ संयुक्त राष्ट्र चले गए कि सुरक्षा परिषद यह विवाद सुलझा देगी। आज फिर वही कर रहे हैं। हम पाकिस्तान को दबाव में लेकर आए थे। फिर अपने रुख में कुछ नरमी लाते हुए यूएन चले गए। ठीक है, युद्ध जैसे संकट को हरसंभव टाला जाना चाहिए, लेकिन हमें अमेरिका और चीन से भी यह आस छोड़नी होगी कि वे इस्लामाबाद पर हमारे लिए एक हद के आगे जाकर दबाव डालेंगे। आखिर अमेरिका और चीन के अपने-अपने हित हैं। पूरी दुनिया जानती है कि अफगानिस्तान में अमेरिका को पाकिस्तानी मदद की कितनी दरकार है ? फिर, चीन क्यों चाहेगा कि पाकिस्तान के आतंकी भारत आने की बजाय उसके यहां आ जाएं! यूएन में जाने का एक पहलू यह भी कि इससे पाकिस्तान को अपने मित्रों को जोड़ने और खुद को आंतरिक रूप से मजबूत करने का समय मिल जाता है।  पिछले 70 वर्षों से हम पड़ोसी देश की हरकतों से परेशान हैं, लेकिन कूटनीति के अपने तकाजे होते हैं, और इसीलिए हम यह कदम नहीं उठा सके। साफ है, हमें पाकिस्तान प्रायोजित दहशतगर्दी से निपटने के लिए अनेक मोर्चों पर साथ-साथ सक्रिय रहना पड़ेगा। मसूद अजहर पर हम पाकिस्तान के जरिए ही दबाव बना सकते हैं। इसके लिए हमें पहले उसके आका चीन की वैश्विक घेराबंदी करने के साथ ही विश्व पटल पर अपने देश की सुरक्षा का हवाला देते ही एक वक्त सुनिश्चित कर अमरीका की नेवी सील कमांडों ने जिस तरह 2 मई 2011 को एटमाबाद में घुसकर अलकायदा के पूर्व सरगना ओसामा-बिन-लादेश को मार गिराया था उसी तरह भारत को पाकिस्तान में घुसकर मसूद अजहर को ठोक देना चाहिए। 


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