मतदाताओं का मौन खतरे का संकेत
वोटरों में शतप्रतिशत विश्वास का संकट


प्रेम शर्मा 
भारत चुनाव के उस दौर से गुजर रहा है जो देश की दशा और दिशा का तय करेगा। यह तय है कि किसी भी दल के बारें में उनके अपने कार्यकर्ता और समर्थकों के अलावा आम वोटरों में शतप्रतिशत विश्वास का संकट है। 2014 के लोकसभा चुनाव की अपेक्षा यह चुनाव काफी गम्भीरता पूर्ण माहौल के बीच सम्पन्न होता दिख रहा है। मतदाताओं का मौन राजनैतिक दलों के लिए खतरें की घंटी हैं। जो कुछ धरातल पर दिखाई दे रहा है वह इस बाॅत का संकेत दे रहा है कि सरकार पुनर्रावृत्ति तो करेगी लेकिन 2014 जैसे परिणाम से काफी दूर होगा। विपक्षी दलों के नेता सरकार की कमी गिनने की जगह व्यक्तिगत आरोपों में एक बार फिर सरकार को वाक ओवर देते दिखाई पड़ रहे है। 
इसमें कोई संदेह नहीं कि मोदी की प्रचार मशीनरी बहुत ताकतवर है। अच्छे दिन के वायदे ने लोगों को आकर्षित किया था। अतिराष्ट्रवाद और देशभक्ति की ओवरडोज, लोगों को कुछ समय के लिए भ्रमित कर सकती है परंतु इसका प्रभाव लंबे समय तक नहीं रह सकता। लोग अपने रोजमर्रा के जीवन की समस्याओं को नहीं भुला सकते। किसानों की समस्या, बेरोजगारी आदि मूलभूत मुद्दे विपक्ष भले ही जोरजोर से न उठा रहा हो लेकिन  देश की जनता अवश्य ध्यान देगी। चुनाव, सही मायनों में जनता का उत्सव होते हैं। प्रजातांत्रिक व्यवस्था में वे देश के भविष्य की राह का निर्धारण करते हैं। स्वतंत्रता के बाद से चुनावों ने देश में प्रजातंत्र को मजबूत किया है। चुनावों में धनबल और बाहुबल के इस्तेमाल और ईव्हीएम की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्हों ने चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता के बारे में लोगों के विश्ववास को कुछ हद तक चोट पहुंचाई। चुनावों की निष्पक्षता की राह में एक नई बाधा पिछले लगभग पांच सालों में खड़ी हुई है।और वह है समाज का धर्म के आधार पर विभाजन और धार्मिक अल्पसंख्यकों को आतंकित करने के लिए सत्ता का बेजा इस्तेमाल। धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों ने भारतीय प्रजातंत्र के पहरेदार - भारत के संविधान - को अनेक बार चुनौती दी है और उसका खुलेआम उल्लंघन किया है। पिछले पांच सालों में मोदी सरकार ने अलग-अलग कारणों से समाज के कई वर्गों को आतंकित और प्रताड़ित किया है। 2014 का लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद जनता को उम्मीद थी कि भ्रष्टाचार का दानव थक-हारकर बैठ जाएगा, महंगाई डायन छूमंतर हो जाएगी, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, डालर की तुलना में रूपया मजबूत होगा और किसानों को उनकी उपज के वाजिब दाम मिलेंगे। इन सभी मतदाताओं का मोहभंग हो चुका है। देश में बेकारी में जबरदस्त वृद्धि हुई है और कृषि क्षेत्र, गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। एक आम भारतीय की कमर बढ़ती कीमतों ने तोड़ दी है। इस राजनैतिक स्वार्थ कहे या फिर मजबूरी टुकड़ों में बंटे विपक्ष को यह अहसास हो गया है कि अलग-अलग रहकर वे कितनी बडी भूल कर रहे थे। विपक्षी दलों को एक करने के गंभीर प्रयास हुए हैं यद्यपि वे पूरी तरह से सफल नहीं कहे जा सकते। 
यद्यपि विपक्ष अब भी एक न्यूनतम सांझा कार्यक्रम बनाने में सफल नहीं हुआ है परंतु आमजनों की तकलीफों और समस्याओं को चुनाव में मुद्दा बनाने के प्रयास कुछ हद तक सफल हुए हैं। यह आशा की जा सकती है कि मतदान होने तक ये मुद्दे देश के सार्वजनिक विमर्श के केन्द्र में आ जाएंगे। विपक्ष के इन आरोपों को नकारा नही जा सकता कि मोदी एंड कंपनी ने देश की एकता में गहरी दरार डाल दी है। राम मंदिर, घर वापिसी, लव जेहाद और गौमांस जैसे मुद्दों ने लोगों के आपसी सद्भाव और प्रेम को खंडित किया है। यही सद्भाव और प्रेम, धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र की नींव होता है। बहुवाद हमारे स्वाधीनता संग्राम और संविधान का आधार था। परंतु इस बहुवाद पर सरकार के हमलों को दरकिनार नही किया जा सकता। भाजपा अपना एजेंडा लागू करती रही और उसके सहयोगी दल, सत्ता के लालच में चुप्पी साधे रहे। चुनाव के बीच इस तरह की चर्चा कि मोदी सरकार ने सरकार की कारपोरेट-परस्त नीतियों के कारण, किसानों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया। देश के कई वर्गों के दिलों में असंतोष और गुस्से की आग धधक रही थी और इसी कारण कुछ समय पहले तक, चुनावी सर्वेक्षण आम चुनाव में, भाजपा की हार की भविष्यवाणी कर रहे थे। भारत के लोगों के सामने आज दो तरह के भारत में से एक को चुनने का मौका है। एक भारत वह है जिसमें सभी धर्मों के लोग राष्ट्रनिर्माण के कार्य में कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगे, कानून की निगाहों में सभी बराबर होंगे और सभी के एक समान अधिकार होंगे। यह वह भारत है, जिसके निर्माण के लिए हमारे स्वाधीनता संग्राम सेनानियों ने संघर्ष किया था।अच्छे दिन के वायदे ने लोगों को आकर्षित किया था। अतिराष्ट्रवाद और देशभक्ति की ओवरडोज, लोगों को कुछ समय के लिए भ्रमित कर सकती है परंतु इसका प्रभाव लंबे समय तक नहीं रह सकता। लोग अपने रोजमर्रा के जीवन की समस्याओं को नहीं भुला सकते। जो मूलभूत मुद्दे विपक्ष उठा रहा है, उन पर देश की जनता अवश्य ध्यान देगी।
यह जनता के जश्न मनाने का समय है। खुद की ताकत पर इतराने का समय है। यह देखकर आनंद लेने का समय है, कि दिग्गज, कद्दावर, बाहुबली, अजेय और ना जाने क्या क्या विशेषण लगाने वाले नेता कैसे थरथर कांप रहे हैं। चुनाव से पहले सभी राजनीतिक दल मुखर थे, मतदाता मौन था। फिलहाल अलग-अलग राजनीतिक दल अपने-अपने स्टाल लगाए खेल-तमाशे दिखा रहे है। ये खेल-तमाशे भी बेहद लाउड, भड़कीले और अश्लील थे।
प्रचार अभियान नहीं प्रचार युद्ध में उतरे इन दलों ने मतदाताओं को लुभाने के लिए ‘‘ विदेशी नृत्य जिसमें नर्तकी अपने वस्त्र उतारती है ‘‘ नुमा हरकतों से भी परहेज नहीं किया। ये तमाशा दिखा रहे थे और मतदाता तमाशबीन था। प्रदेश की प्रमुख दोनों राजनीतिक पार्टियों के विज्ञापनों  और वायदों का  पिटारा खुलने लगा है। जनता के सतरंगी भविष्य का जिक्र हो रहा है। लेकिन मंचों के सामने खड़ा वोटर इस बार मैच्योर था। जब जनता के जिस्म की चमड़ी जरूरत के कोड़े उधेड़ने लगे तो खलबली मची। जनता ने इस बात को भी समझा, कि ये लोकतंत्र है। यहां बगावत नहीं होगी, क्रांति नहीं होगी, विद्रोह नहीं होगा। यहां सही समय का इंतजार करना होगा। इन 18 साल में वोटर्स की एक पीढ़ी तैयार हो गई है जो लोकतंत्र का अर्थ ज्यादा बेहतर समझती है, संविधान समझती है और सेवा और सत्ता का अर्थ समझती है। यह पीढ़ी अंग्रेजी के “मोनोपाली” शब्द का अर्थ और उसके नुकसान भी समझती है। यह प्रमाणित थ्योरी है कि सत्ता का एकाधिकार, तानाशाही में बदल जाता है। 23 मई  को आने वाला रिजल्ट जो भी हो, इस बात का संदेश और चेतावनी तो जरूर देगा कि देश़ के शहर स्मार्ट हुए ना हुए लेकिन वोटर जरूर स्मार्ट हो गया है।


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