कांग्रेस को कितना फायदा देगी राहुल की घोषणाएं
राहुल गांधी एक के बाद एक बड़े-बड़े एलान


प्रेम शर्मा 


लोकसभा चुनाव तिथि की घोषणाा के साथ ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी एक के बाद एक बड़े-बड़े एलान करने में लगे हुए हैैं। ताजी घोषणा की कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो नीति आयोग को खत्म कर दिया जाएगा। इसके पहले वह जीएसटी में भी बड़े बदलाव की घोषणा कर चुके हैैं। इसके अलावा यह भी कह चुके हैैं कि कांग्रेस के सत्ता में आने पर देश के 20 प्रतिशत सबसे गरीब परिवारों के लिए न्यूनतम आय की योजना लागू की जाएगी। जैसे इस योजना को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि क्या इसका एलान करने के पहले आवश्यक विचार-विमर्श किया गया उसी तरह इस पर भी सवाल खड़े हों तो हैरानी नहीं कि आखिर नीति आयोग को खत्म करने की घोषणा किस आधार पर की जा रही है? ऐसे मंें नीति आयोग को खत्म करके फिर से योजना आयोग का निर्माण करने से क्या हासिल होगा?
फिर भी राहुल गांधी ने यह तर्क  कि भावी योजना आयोग में जाने-माने अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों को रखा जाएगा और इन अर्थशास्त्रियों एवं विशेषज्ञों के साथ कुल स्टाफ की संख्या सौ से कम होगी, लेकिन क्या वह यह कहना चाह रहे हैैं कि नीति आयोग में ऐसे लोगों की कमी है? निः संदेह यह भी समझना कठिन है कि सौ से कम संख्या इतनी महत्वपूर्ण क्यों है? क्या पहले वाला योजना आयोग इसीलिए अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा कि उसमें स्टाफ की संख्या सौ से कम नहीं थी? पता नहीं राहुल गांधी क्या कहना और करना चाहते हैैं, लेकिन आवश्यकता इस बात की है कि संस्थाओं को सक्षम बनाने वाले विचार सामने रखें जाएं और उनमें फेरबदल करने की जरूरत के पीछे ठोस कारण गिनाए जाएं। राहुल गांधी ने ऐसा कुछ करने के बजाय सिर्फ एक ट्वीट कर दिया था। 
इस पर हैरानी नहीं कि राहुल गांधी ने योजना आयोग की जगह बने नीति आयोग को सिरे से खारिज कर दिया, लेकिन उन्हें यह भी स्मरण होना चाहिए कि एक समय राजीव गांधी ने भी योजना आयोग के कामकाज से नाखुशी जताते हुए कहा था कि आखिर यह करता क्या है? राहुल गांधी को इसकी भी अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि मनमोहन सरकार के समय योजना आयोग को निष्प्रभावी करने का काम एक बड़ी हद तक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने किया था। यह संभव है कि नीति आयोग राहुल गांधी के मन मुताबिक काम न कर रहा हो, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उसे खत्म करके वह पुरानी व्यवस्था बहाल करने का वादा किया जाए जिसके बारे में आम धारणा यही थी कि वह अप्रासंगिक हो चुकी है।बेहतर होता कि राहुल गांधी ऐसा कोई विचार सामने रखते जिससे नीति आयोग को अधिक प्रभावी और उपयोगी बनाने में मदद मिलती। योजना आयोग फिर से बनाने की उनकी घोषणा से तो यही लगता है कि वह हर पुरानी व्यवस्था को बहाल करना बेहतर समझ रहे हैैं। ध्यान रहे कि उन्होंने अपनी न्यूनतम आय योजना को मनरेगा-2 का नाम दिया है।लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी 2 अप्रैल को पार्टी मुख्यालय में चुनाव घोषणा पत्र जारी करेंगे। घोषणा पत्र में न्यूनतम आय योजना  के तहत गरीबों को 72,000 रुपये सालाना देने के वादे के साथ-साथ कुछ अन्य अहम वादों को जगह मिल सकती हैं। कांग्रेस अध्यक्ष ने पहले ही ऐलान कर दिया है कि उनकी पार्टी सत्ता में आई तो गरीबी हटाने के लिए न्यूनतम आय योजना शुरू की जाएगी। इसके तहत प्रति देश के 5 करोड़ गरीब परिवारों को प्रति माह 6,000 तक रुपये दिए जाएंगे। इसके अलावा पार्टी ने स्वास्थ्य और शिक्षा के बजट बढ़ाने का वादा किया है। कांग्रेस अपने घोषणापत्र में 2008 की यूपीए सरकार की तरह किसानों की कर्ज माफी की घोषणा कर सकती है। पार्टी के अन्य वादों में सबके लिए हेल्थकेयर, सभी बेघर अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को जमीन का अधिकार, प्रमोशन में आरक्षण के लिए संविधान में संशोधन करना और महिला आरक्षण विधेयक को पारित करना शामिल हैं। घोषणापत्र में कृषि क्षेत्र में ‘‘ बड़ी संभावनाओं ‘‘ का फायदा उठाने के लिए कोल्ड स्टोरेज प्लांट, फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज और रोजगार उपलब्ध कराने के लिए कृषि आधारित इंडस्ट्रीज लगाना भी शामिल है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित किसी भी बेघर व्यक्ति को जमीन या आवास उपलब्ध कराने का वादा किया जा सकता है।लोकसभा के अगले सियासी महासंग्राम में कांग्रेस के लिए गठबंधन की अहमियत कितनी है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2014 के चुनाव में पांच बड़े राज्यों की 226 सीटों में से अपने खाते में दहाई सीट का आंकड़ा भी नहीं छू पायी थी। 2019 की सियासी लड़ाई के लिहाज से कांग्रेस के लिए जाहिर तौर पर यह उसकी सबसे कमजोर कड़ी है। उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश की अपनी कमजोर सियासी पिच को भांपते हुए ही कांग्रेस हर हाल में गठबंधन के सहारे यहाॅ जमने की कोशिश कर रहे है। कांग्रेस इन पांच बड़े राज्यों की सवा दो सौ सीटों में गठबंधन के सहारे 2019 में अपनी सीटों की संख्या को करीब 40 तक ले जाने की महत्वाकांक्षी रणनीति पर काम कर रही है। इन सूबों में यह आंकड़ा हासिल किये बिना पार्टी उस 150 के अपने लक्ष्य के आस-पास नहीं पहुंच सकती जिसका ब्लूप्रिंट नवगठित कांग्रेस कार्यसमिति की पहली बैठक में वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने रखा था। कांग्रेस के सीटों की संख्या मौजूदा लोकसभा में 50 का आंकड़ा पार नहीं कर पायी तो इसकी बड़ी वजह इन पांच राज्यों में उसका सबसे खराब प्रदर्शन रहा। उत्तरप्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में कांग्रेस को 2014 में केवल दो सीटें मिली। रायबरेली से सोनिया गांधी और अमेठी से राहुल गांधी के अलावा कोई सीट उसके खाते में नहीं आयी। बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से राजद के साथ गठबंधन के बाद भी कांग्रेस को दो सीट ही मिल पायी। पश्चिम बंगाल में माकपा के साथ तालमेल के बावजूद पार्टी कांग्रेस 42 में से केवल चार सीटें ही हासिल कर सकी।तमिलनाडु की 39 सीट में पार्टी को एक सीट भी नसीब नहीं हुई। जबकि आंध्रप्रदेश का बंटवारा करने का ऐसा भारी खामियाजा भुगतना पड़ा कि सूबे की 25 लोकसभा सीटों में कांग्रेस का खाता भी नहीं खुल पाया। साफ है कि पांच राज्यों की 226 लोकसभा सीट में से कांग्रेस 2014 में केवल 8 सीट जीत पायी। उत्तरप्रदेश व बिहार की दो-दो और पश्चिम बंगाल की चार सीट के अलावा दो सूबों में खाता नहीं खुला। वहीं भाजपा को इन पांच सूबों में 97 लोकसभा सीटों पर जीत मिली थी। कुल मिलाकर तीन राज्यों में सफलता के बाद कांग्रेस के युवराज को यह जरूर सोचना चाहिए की घोषणाओं से पहले वह उस पर अच्छे से विचार अवश्य कर ले। 



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