नेताओं की गंदी,मोटी जुबान पर ताले की जरूरत
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प्रेम शर्मा 
चुनाव के दौरान राजनेताओं की बदजुबानी लगातार जारी है। शिवसेना के राज्यसभा सांसद और प्रवक्ता संजय राउत एक सभा में यह बयान तो सीधे सीधे लोकतंत्र हमला है। इसकी अनदेखी न जनता कर सकती है न ही निर्वाचन आयोग को करनी चाहिए और न ही सुप्र्रीम कोर्ट को इसको हल्के में लेना चाहिए। उनका खुले मंच में यह कहना कि ‘‘ भाड़ में जाए कानून, आचार संहिता भी हम देख लेंगे।‘‘ चुनाव प्रचार के दौरान लोकतांत्रिक मूल्यों और मर्यादा के खुले उल्लंघन को देखते हुए निर्वाचन आयोग के लिए यह आवश्यक हो गया था कि वह सख्ती का परिचय दे। मुसलमानों के वोट बंटने न देने की खुली अपील करने वाली मायावती और उन्हें जवाब देने की कोशिश में अली और बजरंगबली की बात कहने वाले योगी आदित्यनाथ के चुनाव प्रचार पर क्रमशः दो और तीन दिन की पाबंदी का निर्वाचन आयोग का फैसला उन अन्य नेताओं के लिए सबक बनना चाहिए जो बेलगाम हुए जा रहे हैं। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि जहां माया, योगी और मेनका गांधी जैसे नेता केवल आदर्श आचार संहिता का ही उल्लंघन करते पाए गए वहीं कुछ इस संहिता के साथ ही सामान्य शिष्टाचार और लोक-लाज को ताक पर रखकर राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ ऐसी अभद्र बातें करते पाए गए जिनका उल्लेख भी नहीं किया जा सकता। रामपुर से सपा- बसपा गठबंधन के प्रत्याशी आजम खान ने भाजपा प्रत्याशी जयाप्रदा पर जैसी बेहूदा टिप्पणी की वह समस्त महिलाओं का अपमान करने और साथ ही सभ्य समाज को शर्मिंदा करने वाली है। इसमें संदेह है कि चुनाव आयोग ने आजम खान को तीन दिन के लिए चुनाव प्रचार से रोकने का जो फैसला किया वह पर्याप्त है और उससे वह कोई सही सबक सीखने को तैयार होंगे। आखिर यह वही आजम खान हैं जिन पर पिछले चुनाव में पाबंदी तो लगाई ही गई थी, सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें उनकी उस अभद्र टिप्पणी के लिए माफी मांगने को भी बाध्य किया था जो उन्होंने बुलंदशहर सामूहिक दुष्कर्म कांड को लेकर की थी।
आजम खान बेहूदा टिप्पणियों के लिए कुख्यात हैं, लेकिन वह अनापशनाप बोलने वाले इकलौते नेता नहीं। उनके जैसे नेताओं की कतार लंबी ही होती जा रही है और इसका कारण यह है कि पार्टियों का शीर्ष नेतृत्व उन पर कायदे से लगाम नहीं लगाता। उलटे कई बार वह अपने बेलगाम नेताओं का बचाव करने की ही कोशिश करता है। सपा नेता अखिलेश यादव ने मायावती के खिलाफ निर्वाचन आयोग की कार्रवाई पर सवाल खड़ा करते हुए प्रधानमंत्री के बालाकोट हमले से जुड़े बयान का उल्लेख कर जवाबी सवाल तो उछाल दिया, लेकिन आजम का बचाव करना ही बेहतर समझा। यह समझ आता है कि चुनावी माहौल में नेता एक-दूसरे के खिलाफ कठोर बातें कहने में संकोच नहीं करते, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे भाषा की मर्यादा त्यागकर गाली-गलौज पर उतर आएं। विडंबना यह है कि वे केवल यही नहीं करते, बल्कि छल और झूठ का भी सहारा लेते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी राफेल सौदे के बहाने यही कर रहे हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का हवाला देकर प्रधानमंत्री के खिलाफ ऐसी बातें कह डालीं जो कभी कही ही नहीं गईं। भले ही सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी को अवमानना नोटिस जारी किया हो, लेकिन हैरानी नहीं कि उनके वकील उनके झूठ का बचाव करते हुए दिखें। चूंकि राजनीतिक विमर्श का स्तर हद से ज्यादा खराब होता जा रहा है। अब कुछ और टिप्पणी पर चर्चा कर ले जैसे गुजरात के फतेहपुरा से भाजपा विधायक रमेश कटारा ने कहा है कि आप ईवीएम पर दाहोद से भादपा उम्मीदवार जसवंत सिंह भाभोर की तस्वीर और कमल का निशान देखें और बटन दबा दें। इसमें कोई त्रुटि की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए, क्योंकि मोदी साहब ने इस बार कैमरे लगाए हैं।उनके मुताबिक, भाजपा को किसने वोट दिया और किसने कांग्रेस को, यह देखा जा सकता है। आधार कार्ड और सभी कार्ड में अब आपका फोटो है, अगर आपके बूथ से कम वोट हैं तो पता चल जाएगा कि किसने वोट नहीं दिया और फिर आपको काम नहीं मिलेगा। इनके अलावा हिमाचल भाजपा के चीफ सतपाल सिंह सत्ती और बसपा नेता गुड्घ्डु पंडित के अभद्र भाषण का वीडियो इंटरनेट पर जमकर वायरल हुआ। बावजूद राजनीतिक मंचों पर अश्लील और अभद्र बयानबाजी जारी है। वैसे तो लोकसभा चुनाव 2019 की शुरूआत ही, संभवतः राजनीति के अब तक के सबसे निचले स्तर की भाषा से हुई। लोकसभा चुनाव के पहले चरण (11 अप्रैल) के मतदान के बाद दूसरे चरण (18 अप्रैल) से ठीक पहले इन नेताओं की बदजुबानी मां-बहन की गालियों और सड़क छाप गुंडों की फूहड़ता तक पहुंच चुकी है। हैरानी की बात तो ये हैं कि जिनके खिलाफ इस भाषा का प्रयोग किया जा रहा है, वो संसद में उनके साथी हैं या पूर्व में कभी साथ रहे भी हैं। चुनाव आयोग की तमाम हिदायत और सख्तियों के बावजूद ऐसे बयान बढ़ रहे हैं। इनमें कुछ नेताओं की भाषा इतनी अमर्यादित है कि उन्हें हूबहू न तो लिखा जा सकता है और न ही उनके भाषणों का पूरा वीडियो दिखाया जाना उचित है। ऐसे में हम आपको यहां, कुछ नेताओं के बिगड़े बोल के संपादित भाषण का हिस्सा पढ़ाते हैं। 15 अप्रैल 2019 को बसपा उम्मीदवार गुड्डु पंडित ने फतेहपुर सीकरी में एक रैली के दौरान विवादित बयान दिया। उन्होंने कहा, ‘सुन लो राज बब्बर के कुत्तों, तुमको और तुम्हारे नेता-नचनिया को दौड़ा-दौड़ा के जूतों से मारूंगा जो झूट फैलाया समाज में। जहां मिलेगा, गंगा मां की सौगंध तुझे जूतों से मारूंगा, तुझे और तेरे दलालों को।’ सुल्तानपुर से भाजपा उम्मीदवार मेनका गांधी ने पीलीभीत में अपने बेटे और पार्टी के उम्मीदवार वरुण गांधी के समर्थन में रैली की। इस दौरान उन्होंने कहा था, ‘जिस इलाके से जितना मत हासिल होगा, वहां उतना काम होगा।’ उन्होंने वोट के आधार पर इलाकों को ए,बी,सी,डी श्रेणी में बांटने की बात कही थी। इससे पहले मेनका ने सुल्तानपुर की एक सभा में कहा था, ‘अगर उन्हें मुसलमान वोट नहीं देंगे, तो अच्छा नहीं लगेगा। वो बिना मुसलमानों के समर्थन से भी चुनाव जीत सकती हैं। लेकिन अगर मुसलमान सहयोग करेंगे तो अच्छा लगेगा।’सपा नेता आजम खान ने भाजपा के टिकट से रामपुर में उनके खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ रहीं जया प्रदा को लेकर अश्लील टिप्पणी की। जया प्रदा, कुछ समय पहले तक सपा में ही थीं। आजम खान ने उन पर अश्लील टिप्पणी करते हुए कहा था, ‘रामपुर वालों, उत्तर प्रदेश वालों, हिन्दुस्तान वालों, उसकी असलियत समझने में आपको 17 बरस लग गए। मैं 17 दिनों में पहचान गया था कि ----, खाकी रंग का है।’बात हिन्दू मुस्लिम कि चल रही है तो हम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और सपा सरकार में मंत्री रह चुके आजम खान को कैसे भूल सकते हैं. अभी कुछ दिनों पहले की बात है. एक जनसभा के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यामंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश में महागठबंधन को आड़े हाथों लेते हुए बजरंगबली-अली का मुद्दा उठा दिया था।योगी आदित्यनाथ के उस बयान का पलटवार सपा सरकार में मंत्री आजम खान ने अपनी एक जनसभा में किया है। यानि दोनों ने ही संवैधानिक व्यवस्था पर हमला किया जबकि आयोग के निर्देश सख्त है कि जाति और मजहब के नाम पर वोट नही मांगे जाएगे।उन्नाव में चुनाव प्रचार के सिलसिले में आए साक्षी महाराज ने कहा है कि मैं एक संन्यासी हूं और एक संन्यासी जब भिक्षा मांगता है और उसे भिक्षा नहीं मिलती तो गृहस्थी के पुण्य ले जाता है। अगर एक संन्यासी को वोट नहीं दिया तो मैं अपने श्राप आपको दे जाऊंगा।बहरहाल, क्या मेनका गांधी और क्या आजम खान और साक्षी महाराज गलती इनकी नहीं है. ये अपने आप में दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी के एक लम्बे समय के बाद आज भी इस देश में राजनीति का आधार और नेताओं को चुने जाने का पैमाना हिंदू-मुस्लिम, जात-पात और धर्म ही है. कह सकते हैं कि हम अपने नेताओं से वही हासिल कर रहे हैं जो हम सोचते हैं। यदि हम वाकई अपने नेताओं को सुधरते हुए देखना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें अपनी खुद की सोच बदलनी होगी।यदि ऐसा हुआ तो बहुत अच्छी बात है वरना आज भी और कल भी हमारा नेताओं का चयन इसी बात पर निर्भर करेगा कि कौन किस मात्रा में जहर उगल सकता है और उस उगले हुए जहर से मुख्य मुद्दों को ढक सकता है।इसलिए बेहतर होगा कि निर्वाचन आयोग और अधिक अधिकारों से लैस हो, ताकि चुनाव प्रचार के नाम पर न तो दुष्प्रचार हो सके और न ही लोकतांत्रिक मर्यादा का हनन।यही नही निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट को भी इस मामले में सख्ती का परिचय देना होगा। बदजुबान नेताओं को अब एक ताले की जरूरत है। 
   


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