जाॅच का विषय: नेताओं की सुरसा सी बढ़ती सम्पत्ति
नेताओं की सुरसा सी बढ़ती सम्पत्ति


प्रेम शर्मा
भारत के लगभग 80 प्रतिशत नेताओं की सम्पति में बेतहाशा वृद्धि होना इस बाॅत का प्रमाण है कि राजनीति अब सेवा नही कमाई का जरिया बन गई है। क्योकि उच्चतम न्यायालय ने एनजीओ लोक प्रहरी द्वारा दायर अवमानना याचिका की सुनवाईं करते हुए जनप्रतिनिधियों की आय और संपत्ति की निगरानी का स्थाईं तंत्र बनाने पर अपने फैसले पर अभी तक अमल न हो पाने पर नाराजगी जताते हुए केन्द्र  सरकार से जवाब दाखिल करने के लिए कहा है। पिछले साल माननीय अदालत ने जनप्रतिनिधियों की संपत्ति पर निगरानी रखने लिए सरकार को एकाधिक कदम उठाने का आदेश दिया था। न जाने कितने सांसद हैं जो एक कार्यंकाल में ही अप्रत्याशित तरीके से अमीर हो जाते हैं। लगभग ऐसी ही स्थिति विधायकों के मामले में भी देखने को मिलती है। जब ऐसे विधायक या सांसद दिन दूनी रात चैगनी आर्थिक तरक्की करते हैं तब कहीं अधिक संदेह होता है जो न तो कारोबार ही करते हैं और न ही सियासत के अलावा और वुछ करते हैं। हाल में सामने एक आंकड़े के मुताबिक 2014 में फिर से निर्वाचित हुए 153 सांसदों की औसत संपत्ति में 142 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गईं। यह प्रति सांसद औसतन 13.32 करोड़ रुपए रही। यह आंकड़ा यह भी कहता है कि भाजपा के 72 सांसदों की संपत्ति में 7.54 करोड़ रुपए की औसत से उछाल आईं और कांग्रेस के 28 सांसदों की संपत्ति में औसतन 6.35 करोड़ रुपए की। क्या इसे सामान्य कहा जा सकता है ? जिस देश में 26.3 करोड लोग कृषि क्षेत्र में लगे, इनमें से आधे कृषि मजदूर है वो भी 2011 की जनगणना के अनुसार, देश का 7.06 करोड़ लोग बेहद गरीबी यानि दो जून की रोटी को मोहताज हो वहाॅ के जनप्रतिनिधियों की सम्मति में कई गुना इजाफा होना वाकई बड़ी जाॅच का मामला है। हालाकि कानून मंत्रालय के विधायी ’विभाग ने शपथपत्र में कहा कि स्थायी तंत्र विकसित करने के लिए विस्तृत विचार विमर्श और परामर्श करने की जरूरत है। ऐसे में समय लगना तय है। इस मामले को लेकर गंभीर सरकार है। लिहाजा अदालत से अनुरोध है कि इसके लिए कुछ और समय दिया जाए। आकड़ों के अनुसार लोकसभा के 430 सांसद (479 में जिनका विश्लेषण किया) करोड़पति हैं।  कृषि क्षेत्र से जुड़े 19 फीसदी सांसद ’भी सालाना 12.64 लाख रुपये किसानी से कमाते हैं। केंद्र के जवाब से तय है कि इस बार चुनाव लड़ रहे नेताओं की संपत्ति में बेहिसाब वृद्धि की जांच के लिए कोई तंत्र उपलब्ध नहीं होगा। कई नेताओं ने जो शपथपत्र दिए हैं उसमें उनकी संपत्ति में कई गुना वृद्धि सामने आई है। ताजा मामले में गाधीनगर से भाजपा प्रत्याशी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष  अमित शाह की संपत्ति में 7 सालों के दौरान 3 गुना बढ़ोतरी हुई। अभी उनके पास 38.81 करोड़ रुपये की कुल संपत्ति है
साल 2012 में यह 11.79 करोड़ रुपये थी। पिछले दिनों बिहार सरकार की वेबसाइट पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी समेत सभी मंत्रियों के संपत्ति का ब्यौरा अपलोड किया गया है. दी गई जानकारी के अनुसार, नीतीश कुमार से ज्यादा धनी उनके बेटे निशांत हैं. नीतीश कुमार के पास हाथ में कैश सिर्फ 46566 रुपये हैं. इसके अलावा उनके पास 11 लाख की एक गाड़ी है। सीएम नीतीश 9 गायें और 7 बछड़े भी पाल रखे हैं. अगर चल संपत्ति की बात करें तो नीतीश कुमार के पास कुल 1623571 रुपये हैं तो वहीं उनके बेटे की चल संपत्ति 1 करोड़ 18 लाख 44 हजार 837 रुपये है। वहीं, उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी की बात करें तो वो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से ज्यादा अमीर हैं, मगर उनसे भी ज्यादा अमीर उनकी पत्नी हैं। सुशील मोदी के पास हाथ में 42600 रुपये हैं तो वहीं बैंक बैलेंस की बात करें तो सुशील मोदी के खाते में 4654764 रुपये जमा हैं। उनकी पत्नी के खाते में 7328280 रुपये हैं. इसके अलावे सुशील मोदी की पत्नी के पास 12.60 लाख रुपये के आभूषण भी हैं। नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में सबसे ज्यादा अमीर मंत्री नगर विकाश मंत्री सुरेश शर्मा हैं। सुरेश शर्मा के पास 3. 60 करोड़ तो इनकी पत्नी के पास 3. 18 करोड़ की आवासीय एवं व्यवसायिक संपत्ति है। गौरतलब है कि साल 2005 में नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री बनने के बाद यह परंपरा शुरू की थी, जिसमें मंत्रिमंडल के सभी मंत्रियों की संपत्ति का ब्यौरा आम जनता के सामने पेश करना था। अब बाॅत कर ले 2014 के दौरान कुछ नेताओं की सम्पत्ति का जो खुलासा हुआ था  वह भी चैकाने वाला था। पांच साल का वक्त एक आम शख्स के लिए संपत्ति बनाने के लिहाज से कुछ खास नहीं होता। लेकिन हमारे नेताओं और मंत्रियों के मामले में ऐसा नहीं है। पांच साल के दौरान उनकी संपत्ति में 200 प्रतिशत से लेकर करीब 1500 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो जाती है। मनमोहन सरकार में मंत्री पद पर काबिज रहे नेता इसकी मिसाल हैं। एक तरफ जहां कमलनाथ की संपत्ति में पांच साल के दौरान 1471 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो गई वहीं किसी की संपत्ति में 400 प्रतिशत तो किसी की 300 प्रतिशत। कुल मिलाकर देखें तो मनमोहन सरकार के मंत्रियों की संपत्ति में औसतन 280 प्रतिशत का इजाफा हुआ है।  इस दौरान कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं की सम्पत्ति का जो खुलासा सामने आया था वह इस प्रकार था। कमलनाथ
2009 में संपत्ति 14 करोड़ तो 2014 में 206 करोड़ यानि 1471 प्रतिशत बढ़ोत्तरी, गिरिजा व्यास 2009 में संपत्ति 87 लाख जो 2014 में 2.34 करोड़ बढ़ोत्तरी 268 प्रतिशत,मल्लिकार्जुन खड़गे 2009 में 5 करोड़ 2014 में 9.49 करोड़ यानि189 प्रतिशत बढ़ोत्तरी, जितेंद्र सिंह 2009 में 6 करोड़ 2014 में 9.96 करोड़ बढ़ोत्री 146 प्रतिशत,कपिल सिब्बल 2009 में 30 करोड़ 2014 में 114 करोड़ यानि 358 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई। अब 2019 में जो एडीआर की रिपोर्ट आएगी वह और चैकाने वाली होगा।बसपा प्रमुख मायावती से लेकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव, मुलायम सिंह सहित शिवसेना के नेताओं की बाॅत करे या फिर अन्य दलों के बड़े नामों की इनके सम्पतियों तो ऐसा इजाफा हुआ मानों कुबेर का आर्शीवाद इन्ही नेताओं को मिल गया हो।  यह तो बाॅत हुई केवल मंत्री, सांसद और विधायकों की हम अगर निचले स्तर पर ग्राम प्रधान, बीडीसी, जिला पंचायत सदस्य , प्रमुख और नगर निगम के पार्षद, कारपोरेटर आदि की बाॅत करें तो इनकी आय भी पद पाने के पाॅच के अन्दर कई सौ  गुनी बढ़ जाती है। हालाकि  केंद्र सरकार ने गत दिवस ही सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया कि नेताओं की बढ़ती आय का पता लगाना मुश्किल है। इसके लिए स्थायी तंत्र विकसित करने में समय लगेगा इसलिए कुछ और मोहलत दी जाए। अवमानना नोटिस के जवाब में दिए हलफनामे में सरकार ने यह बात कही है। कानून मंत्रालय के विधायी विभाग ने शपथपत्र में कहा कि पिछले वर्षनवंबर माह में राज्यसभा के सभापति की अध्यक्षता में बैठक की गई थी। इसमें राज्यों और विधायी निकायों के प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया। इसमें दो भिन्न मत निकलकर आए कि क्या यह संस्थागत जांच तंत्र राज्यों के विधायी विभागों के अधीन हों या यह अलग मॉडल पर हो जिसमें ज्यादा स्वायत्तता और निष्पक्षता हो। शीर्षअदालत ने निजी संस्था ‘‘लोकप्रहरी ‘‘ के अध्यक्ष एसएन शुक्ला द्वारा नेताओं की आय में बेतहाशा वृद्धि को लेकर दायर अवमानना याचिका पर पिछले माह केंद्र को नोटिस जारी किया था। कोर्ट ने पूछा था कि दो सप्ताह में बताया जाए कि सरकार ने नेताओं की संपत्ति की जांच का तंत्र विकसित करने के लिए क्या कदम उठाए हैं। सरकार ने कहा कि उसने राज्यसभा के महासचिव से दोबारा बैठक बुलाने को कहा है।लेकिन उन्होंने कहा कि यह मंत्रालय को देखना चाहिए क्योंकि उसके पास सभी जानकारियां उपलब्ध हैं। ऊपरी सदन के इस जवाब के बाद इस मुद्दे पर नए सिरे से विचार किया जाएगा। इसलिए सरकार को और समय दिया जाए। 
प्रश्न यह उठता है कि क्या यह आंकड़ा यह नहीं इंगित करता है कि वुछ लोगों के लिए राजनीति अवैध कमाईं का जरिया बन गया है। संभव है कि वुछ सांसद ऐसे हैं जो बड़े कारोबारी, व्यवसायी हों या फिर पुश्तैनी अमीर हैं। लेकिन आखिर इसका क्या मतलब कि सामान्य पृष्ठभूमि और केवल राजनीति ही करने वालों की संपत्ति पांच साल में दो-तीन गुना हो जाएं, क्या दाल में वुछ काला नहीं लगता? नामांकन भरते समय हर उम्मीदवार को एक हलफनामे के द्वारा अपनी पत्नी या पति तथा आश्रितों की संपत्ति का स्रोत बताना होता है तथा फार्म 26 में संशोधन करने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश जिससे उस जनप्रतिनिधि को जनप्रतिनिधित्व कानून के आधीन यह लिखा जाना कि वह इस कानून के किसी भी प्रावधान के तहत चुनाव लड़ने के अयोग्य है पर सरकार ने न केवल आंशिक अमल किया, बल्कि सबसे अखरने वाली बात यह है कि जन प्रतिनिधियों की आय और संपत्ति पर निगरानी रखने की स्थायी तंत्र गठित करने में उससे कोईं रुचि नहीं ली। यह उदासीनता तब है जब सांसदों, विधायकों की संपत्ति में भारी बढ़ोतरी के आंकड़े निरंतर आ रहे हैं। यह न तो किसी पार्टी विशेष तक सीमित है और न ही किसी एक राज्य तक। करीब डेढ़ साल पहले आयकर विभाग ने वुछ सांसदों और विधायकों की सूची सुप्रीम कोर्ट को सौंपी थी जिनकी आय दो चुनावों के बाद बेतहाशा बढ़ी है। एसोसिएशन फॉर डेमोव्रेटिक रिफॉम्र्स बता चुका है कि 16वीं लोकसभा अब तक की सबसे अमीर लोकसभा थी। कटु सत्य तो यह है कि जब पार्टियां टिकट बेचने में लगी हैं तो सांसद, विधायक पहले तो अपने चुनाव में खर्च हुईं राशि कमाता है और फिर वह अगर अगला चुनाव हार जाए तो उसके लिए भी प्रबंध करना चाहता है और यह सब आता कहां से है? राजनीति से। इसलिए टिकटों का बिकना, इतने महंगे चुनावों पर अंवुश लगाना भी जरूरी है। राजनीति को कमाईं का जरिया नहीं बनाना चाहिए। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ’ने सरकार से पूछा था कि कानून मंत्रालय नेताओं की संपत्ति में बेतहाशा वृद्धि की वजह जानने वाली प्रणाली तैयार क्यों नहीं कर पाया। सरकार इसकी जांच के लिए स्थायी तंत्र बनाए। कोर्ट का कहना था कि नेताओं की संपत्ति में कई ’गुना इजाफा ’उन्हें अयोग्य ठहराने का अच्छा आधार बन जाता है। निश्चित तौर पर जिस देश में बेरोजगारी, भूखमरी और किसानों की बेहाली का आलम हो उस देश में जनप्रतिधियों की सम्पत्ति का यह इजाफा शर्मनाक ही नही बल्कि भ्रष्टाचार का प्रमाण है। 





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