बैंक के भगौड़े तो नही दे रहे पार्टियों को चंदा ?
सुप्रीम कोर्ट



प्रेम शर्मा 
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राजनैतिक दलों को चुनावी बांड से मिलने वाली राशि और देने वाले का नाम 30 मई तक आयोग को देने के निर्देश दिये है। यह कोई छोटा निर्णय नही है बल्कि राजनैतिक स्वच्छता के लिए लिए एक बड़ा कदम कहा जाएगा। कारण स्पष्ट है कि चुनावी बांड के माध्यम से जो पैसा राजनैतिक दलों को मिला है उसके पीछे चर्चा यह आ रही थी कि देश की बैंकों को हजारों करोड़ों का चुना लगाकर भागे लोग पिछले दरवाजे से राजनैतिक दलों को चंदा देकर अपना रक्षा कवच तैयार कर रहे है। 
पिछले पाॅच वर्ष में 80 प्रतिशत बैंक कर्ज पूजीपतियों का माफ कर दिया गया। दस लाख करोड़ लेकर भाग गए है। इन भागने वालों के नाम छुपाए जा रहे है। चुनावी बांड लेकर भाजपा सरकार लेकर आई सबसे खास बाॅत यह कि इसमें तीन नियम है इसमें कितना फण्ड दिया है किस पार्टी को दिया और किसने दिया है इसे गुप्त रखा जाएगा।  जहां एक तरफ सरकार करदाताओं के पैसों से बैंकों को पूंजी उपलब्ध करा रही है, वहीं दूसरी तरफ बैंक भारी मात्रा में लोन न लौटाने वालों के कर्ज को ठंडे बस्ते में डाल रहे हैं। आलम ये है कि बैंकों ने वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान दिसंबर 2018 तक में ही 1,56,702 करोड़ रुपये के बैड लोन को राइट ऑफ (बट्टा खाते में डालना) किया है। इस हिसाब से रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के आंकड़ों के मुताबिक पिछले 10 सालों में सात लाख करोड़ से ज्यादा के बैड लोन को राइट ऑफ किया गया है। पिछले लगभग दस वर्षो में बैंक के घोटाले करने वालों की जो मदद की गई वह वाकई चैकाने वाली है। सन 09-10 में 25 करेाड़, 10-11 में 23 करोड़, 11-12 में 20 करोड़ और 12-13 में 32  करोड़,13-14 में 42 करोड़,तो मोदी सरकार के आने के बाद 14-15 में 58 करोड़, 15-16 में 70, 16-17 में 1 हजार आठ करोड़, 17-18 में 1 हजार 16 और 18-19 में 1 हजार 56 करोड़ रूपये की कर्ज माफी की गई। एक अहम बाॅत और जिस देश में गरीब, किसान अगर बैंक का कर्ज वापस न कर पाए तो उस पर अपराधिक मुकदमा दर्ज कर जेल में डाल दिया जाता है। वही इन बड़े पूर्जी पतियों के डिफालटर होने पर उसे अपराधिक कृत्य नही माना जाता। खैर यह बाॅत तो चुनावी चंद से ही स्पष्ट हो जाती है कि जब जिस दल की सरकार होती है उस दल का चुनावी चंदा अन्य दलों की अपेक्षा कई गुना अधिक होता है। जैसे ही सरकार आती है उस दल के चंदें के साथ ही संसाधनों की संख्या में जबरदस्त इजाफा होता है। वह राष्ट्रीय दल हो या फिर क्षेत्रीय दल। इसके पीछे सीधा सा लाजिक यही है कि उक्त चंदा देने वालों को सत्तारूढ़ सरकार से  सरकार आने पर उस दल से अपने कुछ काम निकालने रहते हैं। अपरोक्ष रूप से यह कहना कतई गलत नही होगा कि बड़े पूजीपति चंदें नाम पर राजनैतिक दलों को रिश्वत देते है। अब बाॅत करें बैंको के कर्ज डूबने की तो आरबीआई की रिपोर्ट के हिसाब से देश के बैंकों को दस लाख करोड़ की दरकार है। भाजपा सरकार के वित्त मंत्री अरूण जेटली ने पिछले दिनों बैंकों की दयनीय स्थिति देखकर जनता की गाढ़ी कमाई से जो धनराशि लगभग दो लाख करोड़ दी थी उससे बैंकों का भला नही हो सका। अब चर्चा उसकी कर ले जिसे लेकर सुप्रीम कोर्ट को दखल देनी पड़ी तो वह यह की चंदे के रूप में सत्तारूढ़ भाजपा को वर्ष 16-17 में 997 करोड़ और 17-18 में 990 करोड़ मिला तो वही कांग्रेस को  16-17 में 42 करोड़ और 17-18 में168 करोड़ से ही संतोष करना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बांड की व्यवस्था खत्म करने को लेकर दी गई एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्घ्स (एडीआर) की याचिका पर सुनवाई करते हुए सभी राजनीतिक दलों को आदेश दिया है कि वे इस बांड के जरिये हासिल किए गए चंदे का विवरण सीलबंद लिफाफे में निर्वाचन आयोग को 30 मई तक सौंपें। इसी के साथ चुनावी चंदे की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने को लेकर चुनावी बांड की वर्तमान व्यवस्था में भी अपारदर्शिता का मामला तूल पकड़ चुका है।चूंकि राजनीतिक दल यह बताने के लिए बाध्य नहीं कि उन्हें किसने चुनावी बांड दिया? निर्वाचन आयोग और साथ ही चुनाव प्रक्रिया साफ-सुथरी बनाने के लिए सक्रिय संगठनों की मांग है कि चुनावी बांड खरीदने वाले का नाम सार्वजनिक किया जाए ताकि यह पता चल सके कि कहीं किसी ने किसी फायदे के एवज में तो चुनावी बांड के जरिये चंदा नहीं दिया? निः संदेह चुनावी बांड के जरिये चंदा देने वालों की गोपनीयता बनाए रखने के पक्ष में यह एक तर्क तो है कि उन्हें वे राजनीतिक दल परेशान कर सकते हैं जिन्हें चंदा नहीं मिला, लेकिन यह आशंका दूर की जानी भी जरूरी है कि कहीं किसी लाभ-लोभ के फेर में तो चुनावी चंदा नहीं दिया जा रहा ?यह सही है कि बिना धन के राजनीतिक दलों का संचालन संभव नहीं है। छोटे-बड़े राजनीतिक दल चुनावों के दौरान पैसा पानी की तरह बहाते हैं। अगर चुनावी चंदे की पारदर्शी व्यवस्था नहीं बनती तो राजनीति के कालेधन से संचालित होने की आशंका को दूर नहीं किया जा सकता। राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता का अभाव किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता है। ऐसे में किसी स्वस्थ लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के आय-व्यय सहित पूरी पारदर्शी कार्यप्रणाली की जरूरत आज हम सबके लिए बड़ा मुद्दा है।चुनाव में लोग समाजसेवा के तथाकथित मकसद से उतरते हैं। सत्ता में आकर लोगों के कल्याण के लिए बेहतर नीतियों और योजनाओं का लोग सृजन कर सकें, राजनीति का रुख करने के पीछे राजनेता यही तर्क दे सकते हैं। अगर इसे सही माना जाए तो उनका आकलन भी जनकल्याण के पैमाने पर ही किया जाएगा। यानी जिसने इस क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है उसके जीतकर आने में कोई संशय नहीं होना चाहिए। असलियत में ऐसा होता नहीं है। राजनीति में आकर काम करने वालों को अंगुलियों पर गिना जा सकता है। ऐसे में 534 लोगों को विजयश्री दिलाने के लिए अन्य संसाधनों का सहारा लेना पड़ता है। सत्ता सचमुच बड़ी चीज होती है। सत्ता के आगे सब नतमस्तक तो दिखते हैं, उसे खुश करने के लिए पैर के अंगूठे पर भी खड़े होते दिखते हैं। सत्ता प्रसन्न होगी तभी वे ‘वरदान’ मांग सकेंगे। अब ये ‘वरदान’ निजी और कारोबारी समेत तमाम रूपों में हो सकता है। चुनावी चंदों को दिए जाने की प्रवृत्ति बताती है कि जिस दल की जब सरकार रहती है तो उसे मिलने वाले चंदे का ग्राफ ऊपर रहता है। विपक्ष में बैठे दलों को कमतर आंका जाता है। बाकी तो जनता जनार्दन है ही, वह सब जानती भी है। चुनावों के दौरान सियासत से जुड़े हर क्षेत्र में धन का अंधाधुंध इस्तेमाल किया जाता है। मतदाताओं को नकदी के रूप में देने के लिए या फिर अन्य किसी रूप में। हर साल चुनावी मौसम में चुनाव आयोग बेनामी नकदी की भारी मात्रा में जब्ती करती है। इस बार इसका चलन कुछ ज्यादा ही दिख रहा है। 20 अप्रैल19 तक 3210 करोड़ रुपये के लगभग नकदी व अन्य चीजें जब्त की जा चुकी हैं।
इनमें 1112 करोड़ रुपये की नकदी भी है। शेष शराब, कीमती धातुएं, मुफ्त के उपहार आदि हैं। 1105 करोड़ रुपये के ड्रग्स और नशे से जुड़ी चीजें हैं। पिछले चुनाव यानी 2014 के लोकसभा चुनाव के इसी अवधि में हुई जब्ती 1200 करोड़ की यह दोगुना से अधिक है। पार्टियों की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार 2017-18 में कांग्रेस ने चंदे से कुल 199 करोड़ रुपये जुटाए जबकि इसी साल भाजपा के खाते में 1027 करोड़ रुपये आए। सत्ताधारी दल और विपक्षी दल के चंदे में यह असमानता पिछले 14 साल के शीर्ष पर है। 2005-06 में तत्कालीन सत्ताधारी दल कांग्रेस को भाजपा से 3.25 गुना ज्यादा चंदा मिला था। चंदे के इस अनुपात को भाजपा ने पहली बार 2016- 17 में बदला जब उसे कांग्रेस से 4.5 गुना अधिक चंदा मिला। 2017-18 में कांग्रेस से भाजपा के चंदे में 5.1 गुना बढ़ोतरी हुई। धन के इस खेल में राजनीतिक दलों को मिलने वाले बेतहाशा चुनावी चंदों पर उगली तो उठेगी, दूसरी बाॅत यह कि जब हर क्षेत्र में ईमानदारी की बाॅत की जा रही है तो चंदे की रकम और रकम देने वाले का नाम उजागर करने में क्या दिक्कत है। अगर वास्तव में बैंक से हजारों करोड़ लेकर भागे भगोड़ों राजनैतिक दलों को चंदा नही दिया तो फिर नाम उजागर करने में देर क्यों ?





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