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क्या आप जानते है क्या अर्थ होता है योगी मोदी और आज़म
योगी मोदी और आज़म



लखनऊ: पिछली बार लोकसभा चुनाव में जिस दिन अंतिम दौर का प्रचार थमा, उस शाम मुल्क के लाखों मर्यादापसंद नागरिकों ने राहत की सांस ली थी। यूं तो चुनाव-दर-चुनाव हमारे राजनेता लोगों की सामाजिक आस्थाओं पर आघात करते आए हैं, लेकिन 2014 पतन की लंबी परछाइयों पर लोटता नजर आया था। चैन की घर वापसी की वह बेबस आस महज कुछ दिन टिक सकी। बाद के पांच वर्षों में विधानसभा के 25 चुनाव लड़े गए और हर बार समूचा देश ऊंचे पदों के प्रत्याशियों की गिरावट का दर्दनाक मंजर देख बेबसी से तिलमिलाता रहा। इन दिनों हम फिर से वैचारिक पतन की उसी घिनौनी बजबजाहट के शिकार हैं।

अंतत: चुनाव आयोग ने कुछ कठोर फैसले लेकर थोड़ा ढांढ़स बंधाने की कोशिश की है, पर उसका रास्ता कम दुरूह नहीं। वजह? जब देश की हर पार्टी के शीर्षस्थ नेताओं पर आदर्श चुनाव आचार संहिता की सरेआम चिंदियां उड़ाने के आरोप हों, तो ऐसा होना लाजिमी है। गंगा अगर अपनी मैदानी बहावट में गंदली हो रही हो, तो उसे साफ किया जा सकता है, पर गंगोत्री ही गंदगी उगलने लगे, तो उसे भला कौन साफ करेगा? ऐसे में टी एन शेषन याद आते हैं। उन्होंने केंद्र सरकार को तीन मंत्रियों की बेदखली के लिए बाध्य कर दिया था। उन जैसा जिगर बाद के चुनाव आयुक्तों में नहीं देखने को मिला।

हालांकि, हमारे नेता भी अब अधिक चतुर हो गए हैं। नियम-कायदे और विधि-विधान की ऐसी कौन-सी बारीकी है, जिसकी वे काट न कर सकते हों? आयोग ने योगी आदित्यनाथ, मायावती, मेनका गांधी और मोहम्मद आजम खान के 48 से 72 घंटे तक चुनाव प्रचार पर पाबंदी लगा दी। लोक-लाज और राजनीतिक मर्यादा का तकाजा था कि वे चुप बैठ प्रायश्चित करते, पर नहीं, उन्होंने सुर्खियां जुटाने के दूसरे तरीके ईजाद कर लिए। 
मायावती ने इस निर्णय के कुछ घंटे के भीतर प्रेस कांफ्रेंस कर आरोप जड़ दिया कि यह निर्णय नई दिल्ली की हुकूमत पर बिराज रही भारतीय जनता पार्टी के इशारे पर किया गया है। उन्होंने आयोग को दलित-विरोधी करार देते हुए उसकी जमकर लानत-मलामत की। खबरें जब डिजिटल ज्वार की तरंगों पर तिरने को बेचैन हों, तो ऐसे बयान सिर्फ सुर्खियों में नहीं आते, बल्कि बिना वक्त गंवाए वायरल हो जाते हैं। डिजिटल मीडिया के आंकडे़ चीख-चीखकर मुनादी करते हैं कि सदाचारी सियासी प्रवचनों के मुकाबले तीखे आरोप और विवादास्पद बोल लोगों का ज्यादा ध्यान आकर्षित करते हैं। ‘बहनजी’ ने ऐसा किया और बाजी मार ली। चुनाव आयोग के फैसलों के साथ उनका बयान भी रात गहराने के साथ फैलता चला गया। 

गेरुआ वस्त्रधारी योगी आदित्यनाथ जानते हैं कि उनके प्रशंसक उन्हें एक काबिल प्रशासक से ज्यादा धर्माचार्य के तौर पर पसंद करते हैं। उन्होंने अगली सुबह से दूसरी युक्ति अपनाई। वह लखनऊ में गोमती नदी के तट पर स्थित हनुमान सेतु मंदिर में जा विराजे। टीवी और मोबाइल कैमरों के जरिए उनके मुदित मुख के साथ समर्थकों के ‘जय सियाराम’ की अनुगूंज पूरी दुनिया तक ‘लाइव’ पहुंच रही थी। चुनाव आयोग को जो करना था, कर लिया, पर किसी को पूजा करने से तो रोका नहीं जा सकता। योगी की मंदिर यात्रा ‘वायरल’ होनी थी, हुई। वह यहीं नहीं रुके, अगले दो दिन उन्होंने अयोध्या में रामलला, देवीपाटन में दलित के यहां भोज और काशी में आश्रम दर्शन पर लगाए। मीडिया ने बिना बोले ही उनके संदेश को मतदाता तक पहुंचा दिया। 


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