जल प्रबंधन के मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान साथ काम करेगा
सीमा पार से होने वाले आतंकवाद और भारतीय सैनिकों के शवों से बर्बरता को लेकर भारत-पाकिस्तान के रिश्ते इन दिनों काफी तनावपूर्ण हैं.


इस्लामाबाद : सीमा पार से होने वाले आतंकवाद और भारतीय सैनिकों के शवों से बर्बरता को लेकर भारत-पाकिस्तान के रिश्ते इन दिनों काफी तनावपूर्ण हैं, लेकिन जल प्रबंधन के मुद्दे पर पाकिस्तान को भारत को याद करना पड़ सकता है। दरअसल विकास परियोजनाओं के नकारात्मक असर को कम करने के लिए पाकिस्तान भारत और अफगानिस्तान के साथ मिलकर वॉटरशेड मैनेजमेंट और सीमा पार ऐक्विफर (जलभर) को साझा रखने की संयुक्त प्रणाली चाह रहा है।

 द डॉन की खबर के अनुसार, यह पाकिस्तान की राष्ट्रीय जल नीति का हिस्सा है, जो पीने और सफाई समेत शहरी पानी के 100 प्रतिशत मापन की बात कहती है। वॉटरशेड मैनेजमेंट का संबंध जल प्रबंधन और थल प्रबंधन प्रणालियों से है। ये प्रणालियां जल की गुणवत्ता की सुरक्षा और सुधार में मदद कर सकती हैं। वहीं ऐक्विफर का अर्थ जमीन के नीचे चट्टान या खनिजों की उस परत से है, जो पानी को रोककर रखती है।

अखबार ने कहा कि सरकार और प्रांतों द्वारा जिस नीति को अंतिम रूप दिया गया है, वह कल काउंसिल ऑफ कॉमन इंटरेस्ट्स के अजेंडे में थी लेकिन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की राजनीतिक व्यस्तताओं के चलते इसे उठाया नहीं जा सका। अखबार में कहा गया कि यह नीति इस बात को स्वीकार करती है कि ‘सिंधु जल संधि ने भारत के साथ जल के बंटवारे पर एक पूरी प्रणाली उपलब्ध करवाई लेकिन नियंत्रण रेखा के पास पनबिजली (हाइड्रोइलेक्ट्रिसिटी) विकास से जुड़े इसके प्रावधान कम प्रवाह वाली अवधियों में पाकिस्तान के लिए जल उपलब्धता का संकट पैदा कर सकते हैं।’

यह संधि अंतरराष्ट्रीय सीमा से नीचे की ओर पूर्वी नदियों, जिनका जल भारत के पास रहता है, के लिए न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह उपलब्ध नहीं करवाती, जिससे निचले इलाकों में रहने वाले लोगों पर गंभीर संकट पैदा हो जाते हैं। इसमें कहा गया, ‘दो से अधिक पड़ोसियों से जुड़ीं क्षेत्रीय प्रणालियों में तलाश की जानी चाहिए ताकि सीमा पार से सर्दी के समय पानी छोड़े जाने पर या मॉनसून में रबी एवं खरीफ की फसल बोने के समय पानी रोके जाने की स्थिति में पाकिस्तान की बढ़ती कमजोरी का उपयुक्त समाधान निकाला जा सके।’

पश्चिमी नदियों पर विकास के चलते पैदा होने वाली चुनौतियों के असर के विश्लेषण के लिए भी अध्ययन होगा। इसके अलावा इस असर को न्यूनतम करने के लिए सिंधु जल संधि और अंतरराष्ट्रीय जल नियमों के तहत उठाए गए कदमों की भी पड़ताल होगी।


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