पर्सनल लॉ बोर्ड संविधान से ऊपर नहीं : उच्च न्यायालय
तीन तलाक को लेकर चल रहे विवाद के मद्देनजर यह टिप्पणी काफी अहमियत रखती है।


इलाहाबाद : इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि एक मुस्लिम व्यक्ति द्वारा उसकी पत्नी को तलाक देने के लिए ऐसा तरीका नहीं अपनाया जा सकता जिससे उसकी पत्नी को इस संविधान के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन होता हो। तीन तलाक को लेकर चल रहे विवाद के मद्देनजर यह टिप्पणी काफी अहमियत रखती है।

हाल ही में एक आदेश में न्यायमूर्ति सूर्य प्रकाश केसरवानी ने यह व्यवस्था भी दी कि पर्सनल लॉ, संविधान के दायरे में कानून के अधिकार के तहत काम करता है, न कि उस धर्म के तहत काम करता है। पर्सनल लॉ का स्थान हमेशा कानून ले सकता है।

यह आदेश 19 अप्रैल, 2017 को आकिल जमील एवं दो अन्य लोगों द्वारा दायर एक याचिका पर पारित किया गया। जमील की पूर्व पत्नी द्वारा दहेज रोधक कानून एवं भारतीय दंड संहिता की संबद्ध धाराओं के तहत दर्ज कराए एक मामले के संबंध में आगरा की एक अदालत ने जमील और अन्य को समन जारी किए थे। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में इसे चुनौती दी गई थी। 

इन याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि आगरा के सीजेएम की अदालत द्वारा शुरू की गई कार्यवाही अमान्य थी क्योंकि यह शिकायत जमील द्वारा उसकी पत्नी सुमैला अफगानी को तीन बार तलाक कहकर तलाक देने के कुछ दिनों बाद दर्ज कराई गई थी।

याचिकाकर्ताओं ने यह दलील भी दी कि तलाक के बाद जमील ने अपनी पत्नी को उसके मन मुताबिक जिंदगी जीने के लिए स्वतंत्र कर दिया और यहां तक कि एक फतवा जारी करवाया जिसमें मुफ्ती सिटी, आगरा ने इस तलाकनामे की पुष्टि की है।

हालांकि, इस अदालत ने यह याचिका ठुकरा दी और पाया कि सम्मन के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई उचित कारण नजर नहीं आता है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि फतवा जिस भी निकाय द्वारा जारी किया गया वह कानून द्वारा मान्य किसी न्यायिक व्यवस्था से नहीं निकला है और यह किसी पर भी बाध्यकारी नहीं है।

अपने 40 पेज के आदेश में जिसकी शुरआत संस्कृत के इस श्लोक से हुई है कि यत्र नारयस्तु पूज्यते रमंते तत्र देवता :जहां नारी की पूजा की जाती है, वहां देवता निवास करते हैं:, अदालत ने टिप्पणी की जो समाज अपनी महिलाओं का सम्मान नहीं करता, उसे सभ्य नहीं माना जा सकता।

अदालत ने कहा, मुस्लिम महिलाओं सहित सभी नागरिकों के मौलिक अधिकार हैं। पर्सनल लॉ की आंड़ में नागरिकों के व्यक्तिगत या सामूहिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता है।


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