5 मुस्लिम महिलाओं की मौत से भड़का था मेरठ, हाशिमपुरा कांड की दास्तां...
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31 साल बीत जाने के बाद भी मई 1987 का मेरठ दंगा हाशिमपुरा और मोहल्ला इमलियान के लोगों को एक कहानी की तरह आज भी याद है. 78 साल के मुस्तकीम हों या फिर उन्हीं की हमउम्र हाजरा, दोनों को उन दिनों घर के अंदर और सड़क पर हुई एक-एक घटना तारीख और वक्त के साथ याद है.

घटना का जिक्र होते ही 48 साल के शम्सउद्दीन की आंखें आज भी नम हो जाती है. घर के अंदर ही पीएसी से छिपकर शम्सउद्दीन ने अपनी जान बचाई थी. उस दिन की दास्तां जानने के लिए एक निजी न्यूज चैनल की टीम पहुंची हाशिमपुरा.

मोहम्मद मुस्तकीम अंसारी बताते हैं, “20 मई 1987 को जनाजा (अर्थी) निकलने के दौरान लाउडस्पीकर बजाने पर दो मोहल्लों के बीच मामूली सा तनाव हो गया था. लेकिन ये तनाव ऐसा कतई नहीं था कि पूरा मेरठ दंगे की चपेट में आ जाए."

"तनाव की इस आग में घी डालने का काम किया इलाके की पुलिस ने. सिर्फ मोहल्ला इमलियान के लोगों पर कार्रवाई करते हुए उनकी धरपकड़ शुरू कर दी. जब पुलिस मोहल्ले के मर्दों को पकड़कर ले जा रही थी तो महिलाएं सड़क पर पुलिस की गाड़ी के सामने लेट गईं. महिलाओं ने एकतरफा कार्रवाई का विरोध किया. लेकिन बिना कोई चेतावनी दिए पुलिस ने महिलाओं के ऊपर गाड़ी चढ़ा दी. 5 महिलाओं की मौत हो गई. कुछ घायल भी हुईं.”

कैसे 5 महिलाओं की मौत हाशिमपुरा के 45 युवकों की मौत की भी वजह बनी इस बारे में शम्सउद्दीन अंसारी बताते हैं, “इस घटना के बाद उसी रात को मेरठ में भीड़ बेकाबू हो गई. सरकारी गाड़ियों को आग लगा दी गई. पुलिस के साथ भी झड़प हुई. धीरे-धीरे गुस्से की इस आग ने पूरे शहर को लपेटे में ले लिया. पुलिस के साथ शुरू हुआ झगड़ा हिन्दू-मुस्लिम झगड़े में बदल गया."

इसके बाद पुलिस और पीएसी ने मुस्लिम मर्दों को चुन-चुनकर निशाना बनाया. खासतौर से नौजवानों को. बुर्जुगों के हाथ-पैर तोड़कर उन्हें जेल में डाल दिया या दो दिन थाने और पुलिस लाइन में रखने के बाद छोड़ दिया. गनीमत ये रही कि 10-12 साल से कम उम्र के बच्चों को बख्श दिया गया.

लेकिन सजा उन बच्चों को भी मिली. उन्होंने यतीम होने का दर्द झेला. पूरे 10 साल तक हम हाशिमपुरा की दो गलियों में नौजवान देखने को तरस गए. कई महीने तक इन दो गलियों के घरों में रोने की आवाज़े बंद नहीं हुईं.”

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