आंकड़ों की कसौटी पर खरा नहीं उतरा मायावती का गठबंधन तोड़ने का पैंतरा
मायावती और अखिलेश की राहें अब अलग होने के बाद उत्तर प्रदेश में उपचुनाव का दंगल रोचक होने के आसार हैं।


लखनऊ। मायावती की राजनीति को समझने वाले अच्छी तरह से जानते हैं कि वह कभी नुकसान का सौदा नहीं करतीं। उनकी राजनीति का अपना एक तरीका है और वह सत्ता में रहें या फिर बाहर, इससे समझौता करना उन्हें गवारा नहीं। वह विरोधियों पर न सिर्फ खुलकर तीखे हमले करती हैं, बल्कि मौका मिलने पर उन्हें सबक सिखाना नहीं भूलती। उन्होंने कांशीराम के साथ काम करने वाले उन नेताओं को नहीं बख्शा जो उनकी राह का रोड़ा बन रहे थे तो फिर अखिलेश क्या हस्ती हैं। चुनाव आयोग के अंतरिम आंकड़ों से साफ हो गया है कि मायावती ने अखिलेश से गठबंधन तोड़ने की जो दलीलें दीं, वह सही नहीं हैं। चुनाव में बसपा को तो सपा का लाभ मिला, लेकिन सपा नुकसान में रह गई। 

ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि जिस दिन गठबंधन की बुनियाद पड़ रही थी, उसी दिन मायावती ने सभी सम्भावित स्थितियों को आकलन करते हुए इसे तोड़ने का भी खाका तैयार कर लिया होगा। बसपा सुप्रीमो के इसी मूल स्वभाव को नजरअंदाज करना ही अखिलेश यादव की सबसे बड़ी भूल रही। मायावती के अब ‘एकला चलो’ के ऐलान के बाद अखिलेश भले ही खुद भी अकेले चुनाव लड़ने की बात कह रहे हों, लेकिन हकीकत में यह ‘बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से निकलने’ जैसा है।

मायावती को मामूली अखिलेश को हुआ ज्यादा नुकसान
17वीं लोकसभा के लिए हुये चुनाव नतीजों की गणित को समझें तो इस चुनाव में बसपा को 19.26 प्रतिशत वोट मिले, जबकि 2014 में पार्टी का वोट प्रतिशत 19.77 रहा। इस लिहाज से दस सीटें जीतने के बाद भी मायावती को ये घाटे का का सौदा नजर आया। इसीलिए उन्होंने सपा के वोटबैंक बसपा में ट्रांसफर नहीं होने का आरोप लगाया। इसके लिए उन्होंने यादव परिवार के सदस्यों की हार का भी हवाला दिया। मायावती ने दलील दी कि जब सपा अध्यक्ष ‘यादव’ वोट अपने कुनबे के उम्मीदवारों को ही नहीं दिला पाये तो बसपा को क्या मिले होंगे।

हालांकि चुनाव आयोग के अंतरिम आंकड़ों ने मायावती की पोल खोल दी है। इनसे साफ हो गया है कि बसपा उम्मीदवारों को तो सपा के मत मिले, लेकिन बसपा समर्थकों ने सपा उम्मीदवारों को वोट देने में ज्यादा दिचलस्पी नहीं दिखायी। ये तस्वीर इसलिए भी साफ है, क्योंकि 2014 में बसपा ने उत्तर प्रदेश की सभी 80 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़कर 19.77 प्रतिशत वोट हासिल किये, जबकि इस बार गठबंधन में इससे आधे से भी कम 38 सीटों पर चुनाव लड़ने पर उसे 19.26 प्रतिशत वोट मिले। जाहिर है इतनी कम सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद अगर उसका मत प्रतिशत लगभग बराबर रहा तो इसका सीधा अर्थ है कि सपा के वोट उसे ट्रांसफर हुये।

इसके विपरीत देखा जाए तो सपा के लिए यह गठबंधन घाटे का सैदा साबित हुआ। इस बार पार्टी को   17.96 प्रतिशत वोट मिले, जबकि 2014 में वोट पाने के मामले में समाजवादी पार्टी दूसरे स्थान पर रही थी। उसे 22.35 प्रतिशत वोटों के साथ पांच सीटें मिली। इस तरह सपा को 4.39 प्रतिशत वोटों का नुकसान हुआ। इस लिहाज से अखिलेश का ये नुकसान बसपा के 0.51 प्रतिशत नुकसान से कहीं ज्यादा है और पार्टी की सीटें भी नहीं बढ़ी। इतना ही नहीं सपा भी 2014 के मुकाबले आधी सीटें लड़ने के बावजूद जिस तरह 17.96 प्रतिशत वोट ही हासिल कर पायी। उससे पता चलता है कि उसका कितना ज्यादा नुकसान हुआ। 
अगर पार्टी उम्मीदवारों को बसपा का वोटबैंक स्थानान्तरित हुआ होता, तो उनकी इतनी बुरी दुर्गति नहीं होती। ऐसे में जो आरोप अखिलेश को लगाने चाहिए थे, वह उल्टा मायावती ने लगाकर अपने चिर परिचित अंदाज को ही जगजाहिर किया है।

पीएम की कुर्सी नहीं दिलाने वाले को सीएम बनाना गवारा नहीं
दरअसल मायावती ने लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी का सपा से गठबंधन प्रधानमंत्री पद की महत्वकांक्षा के चलते किया था। उन्हें लग रहा था कि किसी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में गठबंधन की अच्छी सीटों की संख्या के सहारे वह अपना ख्वाब पूरा कर पायेंगी। लेकिन अब निकट भविष्य में उनके सामने सिर्फ विधानसभा चुनाव की विकल्प है। ऐसे में वह 2022 में अखिलेश को गठबंधन के मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट कर अपने पैर पर कुल्हाड़ी नहीं मारना चाहती हैं। इसीलिए उन्होंने ये कहानी गढ़ी। सीधे तौर पर कहा जाए तो यह कुछ ऐसा है कि तुम अपना वादा पूरा नहीं कर सकें तो मैं अपना क्यूं निभाऊं।  

कुछ सवालों पर मायावती का रुख स्पष्ट नहीं
अपनी आगामी रणनीति के तहत मायावती अब संगठन को मजबूत करने में जुट गई हैं। उन्होंने भाजपा की तर्ज पर बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने का निर्देश दिया है। इसके लिए 2007 की तरह हर विधानसभा क्षेत्र में भाईचारा कमेटियों पर काम करने को बोला गया है। मायावती ने पार्टी के बेस वोट के साथ सोशल इंजीनियरिंग की राह पर पर चलते हुए सर्वसमाज को साधने की बात कही है। उनकी रणनीति इस तरह पचास से साठ प्रतिशत वोट जुटाने की है। जाहिर है ऐसे में अखिलेश या फिर कोई और उनके लक्ष्य में मददगार न होकर रोड़ा ही बनेगा। इसलिए वह 2022 का लक्ष्य बनाकर काम कर रही हैं। इन सबके बीच मायावती इस बात को स्पष्ट नहीं दे पायी हैं कि अगर वह चुनाव हारने के लिए ईवीएम को दोष दे रहीं थीं तो उन्होंने अब सपा से गठबंधन क्यों तोड़ा। अखिलेश-डिम्पल की इतनी ही इज्जत करती हैं तो उन्हें मीडिया से पहले क्यों नहीं बताया। अगर बसपा का वोटबैंक नहीं खिसका है, तो उन्होंने संगठन के स्तर पर फेरबदल क्यों किये हैं।

फायदे का सौदा ही मायावती की पहली प्राथमिकता
देखा जाए तो मायावती के लिए ऐसा करना कोई नई बात नहीं है। उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रह चुकी मायावती पहली बार जून 1995 में सपा के साथ गठबंधन तोड़ कर भाजपा और अन्य दलों के समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं थीं। दरअसल मुलायम-कांशीराम के नेतृत्व में 1993 में सपा-बसपा गठबंधन ने चुनाव लड़ा और जीत के बाद मुलायम मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन जैसे ही कांशीराम ने मायावती को पार्टी उपाध्यक्ष और उत्तर प्रदेश प्रभारी बनाया, उनका सपा से विवाद हुआ और उन्होंने सरकार गिरा दी। फिर वह स्वयं मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन हुई। इसके बाद वह दूसरी बार 1997 और तीसरी बार 2002 में मुख्यमंत्री बनीं और तब उनकी पार्टी का भाजपा के साथ गठबंधन था।

गठबंधन में मायावती के अंदाज की बात करें तो भाजपा के साथ छह-छह महीने मुख्यमंत्री बनाने के फार्मूले में भी मायावती स्वयं तो कुर्सी पर आसीन हुईं, लेकिन कल्याण सिंह के विराजमान होते ही उन्हे यह अखरने लगा और उन्होंने समर्थन वापस ले लिया। इसके बाद से भाजपा आज तक उनके निशाने पर है। इसी तरह लखनऊ में 1995 के स्टेट गेस्ट हाउस कांड के बाद मायावती हमेशा सपा पर हमलावर रहीं। उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव से पहले हुए उपचुनाव में ये दुश्मनी चन्द दिनों के लिए दोस्ती में बदली, लेकिन अब मायावती ने एक बार फिर अखिलेश से मुंह मोड़ लिया है। इसी तरह वह 1996 में कांग्रेस से गठबंधन कर चुकी हैं, लेकिन चुनाव नतीजों के बाद उन्होंने बसपा का वोट कांग्रेस में ट्रांसफर होने लेकिन कांग्रेस का वोट बसपा को नहीं मिलने का आरोप लगाते हुए पार्टी से किनारा कर लिया था। खुले शब्दों में कहा जाए तो मायावती की राजनीति यूज एण्ड थ्रो की तरह है।

उपचुनाव में फिर एक दूसरे पर हमला बोलेंगे मायावती और अखिलेश
मायावती और अखिलेश की राहें अब अलग होने के बाद उत्तर प्रदेश में उपचुनाव का दंगल रोचक होने के आसार हैं। लोकसभा चुनाव में संयुक्त रैलियां करने वाले ये दोनों नेता भले ही एक दूसरे के खिलाफ अभी जुबान नहीं खोल रहे हों, लेकिन उपचुनाव की तारीखों का ऐलान होने के साथ ही एक दूसरे को निशाना बनाते दिखेंगे। सपा और बसपा दोनों के लिए ही ये उपचुनाव अहम हैं। यही वजह है कि मायावती के गठबंधन से अलग होने के बाद सपा नेताओं की तल्खी नजर आने लगी है। पार्टी महाचिव रामगोपाल यादव कहते हैं कि अगर सपा के वोट ट्रांसफर नहीं हुए होते बसपा उम्मीदवार जीत नहीं दर्ज करते। सपा, बसपा से बड़ी और पुरानी पार्टी है। हम भी उपचुनाव अकेले लड़ेंगे।

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