...शायद फिर फुदकती नजर आएं गौरैया
गर्मियों के दिनों में मसूर या उड़द की छाली घर के आंगन में धूप लगाने पर बिछाने के दौरान दर्जनों गौरैया आ जाती थीं।


लखनऊ : 'भोली-भाली प्यारी-प्यारी, नन्ही चिड़िया तुझ बिन सूने घर-आंगन और द्वार-अटरिया चूं-चूं करती आती चिड़िया मुंह में दाना भर उड़ जाती चिड़िया तिनका-तिनका जोड़ घोंसला, कारीगर बन जाती चिड़िया नन्हे बच्चों की चोंचों में, दाना रख-रख आती चिड़िया चिड़िया चिड़ा दुलारा उड़ते संग-संग, मन ही मन हशार्ती चिड़िया इक दिन उड़ें तो लौटें न घर, बच्चों बिन अकेली रह जाती चिड़िया रोज सुबह दस्तक देती है, मन उपवन महकाती चिड़िया नन्ही जान है गौरैया, फुदक-फुदक कर मन बहलाती चिड़िया'... गौरैया यानी ऐसी चिड़िया जिससे आमजन सबसे ज्यादा तरह से रू-ब-रू होता था। एक वक्त था जब घर-कालोनी सभी जगह इस सामाजिक पक्षी के घोंसले मिल जाते थे, लेकिन अब इसमें तेजी से कमी आ रही है और अब तो ये गौरैया विलुप्त होने की कगार पर है। 



पुरानी दिनचर्या और जीवन से जुड़ी चीजों पर नजर डालें तो घर के आस-पास मौजूद पेड़ों की नीची शाखों पर छलांग लगाती हुई गौरैया कब चारपाई के एकदम बगल में उतर बैठ जाती थी, पता ही नहीं चलता था। लोगों की मौजूदगी में वह घर में इधर-उधर फुदकती मिल जाती थी। अपनी छोटी सी चमकीली चोंच में पानी भर आसमान की ओर उड़ जाती थी। घरों का माहौल भी ऐसा होता था कि कि एक बर्तन में गौरैया के लिए पानी का इंतजाम करना लोग नहीं भूलते थे। मकान में बने रौशनदान तो मानो गौरैया का ठिकाना होते थे। घरों में लगे दर्पण पर गौरैया का चोंच मारना तो जैसे मामूली बात थी। गौरैया दर्पण में अपना प्रतिबिंब देख कई बार बड़ी देर तक दर्पण में तब तक चोंच मार मारकर लड़ती रहती थी, जब तक वह हार न जाती थी। बड़े-बुजर्ग भी गौरैयों को पानी नहाते देख बरसात के आने की भविष्यवाणी कर देते थे। 

गर्मियों के दिनों में मसूर या उड़द की छाली घर के आंगन में धूप लगाने पर बिछाने के दौरान दर्जनों गौरैया आ जाती थीं। तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि जिस गौरैया के साथ पूरा बचपन गुजरा एक दिन वह नजर भी नहीं आएगी। विश्व गौरैया दिवस पर 20 मार्च को एक बार फिर पर्यावरण प्रेमियों को गौरैया याद आएगी। उसके संरक्षण को लेकर बातें भी होंगी, लेकिन फिर हर साल की तरह ये बातें सिर्फ चर्चा तक सीमित रह जाएंगी। दरअसल, गौरैया के अचानक इस तरह विलुप्त होने के बीच प्रकृति नहीं इंसान जिम्मेदार हैं, जिसने न घरों के ईद-गिर्द और घरों में ही गौरैया को आने-ठहरने की जगह दी। 



मोबाइल टॉवर की बढ़ती संख्या ने भी गौरैया को हमसे दूर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब न बच्चों के लिए उनकी प्यार दोस्त ही मौजूद है और बड़े भी सिर्फ पुरानी यादों के सहारे या फिर कहीं अचानक गौरैया नजर आने पर खुश होकर तस्सली कर लेते हैं। ऐसे में अगर वास्तव में गौरैया को फिर अपने जीवन का हिस्सा बनाना है तो प्रयास स्वयं करने होंगे। घरों में उनके लिए घोंसला या दूसरा ठिकाना बनाकर, छत पर दाना डालकर इसकी शुरुआत की जा सकती है। इससे घर आंगन में फुदक-फुदक कर मन को प्रफुल्लित करने वाली, रूठी गौरैया शायद एक बार फिर नजर आ जाए।

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