इस तरह करें छठ की पूजा, माता की बरसेगी कृपा
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आज से छठ पूजा की शुरूआत हो रही है। चारों तरफ लोगों ने जोर शोर से तैयारियां कर रहे हैं। सूर्य आराधना को समर्पित यह त्यौहार भक्तिभाव, स्वच्छता और शुद्धता के साथ मनाया जाता है। इस व्रत का पालन महिला और पुरुष दोनों ही करते हैं।  



31 अक्टूबर को नहाय खाय - आज के लिए लोग घरों की सफाई करके शुद्ध और पवित्र महौल में प्रवेश करेंगे।

1 नवंबर को खरना - इन दिन व्रती दिन में एक बार खाना खाना होता है। इसके लिए कद्दू या सीताफल की सब्जी और पूरी व खीर ही खाई जाती है। खरना में जो प्रसाद तैयार किया जाता है उसके लिए नया चूल्हा या साफ सुथरी रसोई का ही इस्तेमाल किया जाता है। कुछ लोग आम की लकड़ी से ही खाना पकाते हैं। खरना के दिन से ही व्रत शुरू होना माना जाता है।

2 नवंबर को सायंकालीन सूर्य को अर्घ्य - दो नवंबर को पूरा दिन व्रत रखने के बाद व्रती शाम को डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं और रात भर जागकर सूर्य देवता के जल्दी उदय होने की कामना करते हैं। व्रती को सूर्योदय तक पानी तक नहीं पीना होता। इसीलिए इस व्रत को काफी कठिन व्रत माना जाता है।

3 नवंबर को उगते सूर्य को अर्घ्य - व्रत के आखिरी दिन 3 नवंबर को जब उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। अर्घ्य देने के बाद ही व्रती पारण करता है और प्रसाद ग्रहण करता है। इस अवसर पर छठी मइया यानी भगवान सूर्य से आशीर्वाद के लिए बहुत से लोग सपरिवार व्रत रखते हैं।



छठ पूजा सामग्री की सूची  

  • प्रसाद रखने के लिए बांस की दो तीन बड़ी टोकरी।
  • बांस या पीतल के बने तीन सूप, लोटा, थाली, दूध और जल के लिए ग्लास।
  • नए वस्त्र साड़ी-कुर्ता पजामा/धोती और अंगरखा।
  • चावल, लाल सिंदूर, धूप और बड़ा दीपक।
  • पानी वाला नारियल, गन्ना जिसमें पत्ता लगा हो।
  • सुथनी और शकरकंदी।
  • हल्दी और अदरक का पौधा हरा हो तो अच्छा।
  • नाशपाती और बड़ा वाला मीठा नींबू, जिसे टाब भी कहते हैं।
  • शहद की डिब्बी, पान और साबुत सुपारी।
  • कैराव, कपूर, कुमकुम, चन्दन, मिठाई।
  • इसके साथ ही ठेकुआ, मालपुआ, खीर-पूड़ी, खजूर, सूजी का हलवा, चावल का बना लड्डू, जिसे लडु़आ भी कहते हैं आदि प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाएगा।



पकवान और पूजा सामग्री

कार्तिक शुक्ल छठ के दिन घरों में सूर्यदेव को चढ़ाने के लिए कई तरह के पकवान बनाये जाते है और सूर्यास्त होने के साथ ही सारे पकवानों को बड़े-बड़े बांस के डालों में भरकर नजदीक की नदी या सरोवर के घाट पर ले जाया जाता है। नदी के तट पर ईख का घर बनाकर दीप जलाया जाता है। व्रत करने वाले सभी स्त्री और पुरूष नदी या सरोवर के जल में स्नान कर पकवान और पूजा सामग्री से भरे डालों को हाथ में उठाकर छठी माता और भगवान सूर्य को अर्घ्य देते हैं। सूर्यास्त के पश्चात व्रति अपने-अपने घरों को लौट जाते हैं और सूर्य देवता के लिए रात्रि जागरण करते हैं। रातभर छठ के गीत गाए जाते हैं।



कार्तिक शुक्ल सप्तमी के दिन सूर्योदय से पहले ब्रम्ह मुहूर्त में सभी व्रती एक डाले में मिष्ठान्न, नारियल और फल रखकर नदी के तट पर सारे व्रती जमा होते हैं। सप्तमी की सुबह व्रती उगते हुए सूर्य को अर्ध्य देते हैं। अर्ध्य देने के बाद छठ व्रत की कथा का वाचन किया जाता है और प्रसाद का वितरण होता है। व्रती प्रसाद को ग्रहण कर व्रत का पारण करते हैं।

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