तो इनके नाम पर शुरू हुआ दादा साहब फाल्‍के अवॉर्ड
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क्‍या आप जानते हैं क‍ि हि‍ंदी सि‍नेमा में प्रति‍ष्ठि‍त अवॉर्ड दादा साहब फाल्‍के कि‍सके नाम पर शुरू कि‍ए गए हैं, कौन हैं वाे शख्‍स जि‍नके नाम पर मि‍ला अवॉर्ड फि‍ल्मी सि‍तारों को गौरव का अहसास कराता है. साथ ही क्‍यों उन्‍हें भारतीय सि‍नेमा का पि‍तामह कहा जाता है. भारतीय सिनेमा के 'पितामह' का खिताब पाने वाले दादा साहेब फाल्के उर्फ धुंदीराज फाल्के ने हि‍ंदी सि‍नेमा का चेहरा बदल कर रख दिया.

वे हि‍ंदी सि‍नेमा से जुड़े इकलौते ऐसे शख्‍स थे, ज‍िन्‍होंने सिने जगत में क्रांत‍ि ला दी थी. उन्‍होंने  सिनेमा में इस्तेमाल होने वाली तकनीकों और मशीनों के लिए भी, जब हम विदेश पर निर्भर थे, उस समय फाल्के भारत की पहली मूक फीचर फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' लेकर आए. फिल्म के निर्माण में लगभग 15 हजार रुपये खर्च हुए. उस समय यह एक बहुत बड़ी राशि थी. लेकि‍न फि‍र भी उन्‍होंने हार नहीं मानी. उन्‍होंने इसे प्रमोट करने के लि‍ए बि‍ल्‍कुल अलग तरह की तरीका नि‍काला. 'सिर्फ तीन आने में देखिए दो मील लंबी फिल्म में 57 हजार चित्र'.

उनके इस अनोखे आइडि‍ए ने काम कि‍या और पहली मूक फि‍ल्‍म लेकर आए. उनके इस सहयोग की वजह से हि‍ंदी सि‍नेेमा पूरी तरह बदल गयाा. भारत की पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' का विज्ञापन कुछ इसी प्रकार का था. दादा साहब ने भारतीय सिनेमा में को बसाने में विशेष भूमिका निभाई.

फाल्के का जन्म नासि‍क से तकरीबन 30 कि‍लाेमीटर  दूर त्रयम्बकेश्वर में 30 अप्रैल, 1870 को हुआ था. बचपन से ही उनमें कला के प्रति रुझान था. उन्होंने 1885 में मुंबई के सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट में प्रवेश लिया. साल 1890 में यहां से पास होने के बाद फाल्के ने बड़ौदा के कला भवन में प्रवेश लिया, जहां उन्होंने मूर्तिशिल्प, इंजीनियरिंग, ड्राइंग, पेंटिंग और फोटोग्राफी का ज्ञान प्राप्त किया. फाल्के के जीवन में फिल्म निर्माण से जुड़ा रचनात्मक मोड़ 1910 में 'लाइफ ऑफ क्राइस्ट' देखने के बाद आया. इसी से उन्हें फिल्म निर्माण की प्रेरणा मिली.

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