गर्भावस्था में खानपान में कमी से शिशु को हो सकती है मिर्गी
गर्भावस्था में खानपान में कमी से शिशु को हो सकती है मिर्गी


गर्भावस्था के दौरान गर्भवती पौष्टिक आहार नहीं लेती है तो शिशु में मिर्गी की समस्या हो सकती है। अगर प्रसव सही से नहीं कराया गया या प्रसव के समय अधिक समय लगा तो शिशु के दिमाग में ऑक्सीजन की कमी व ब्रेन में डैमेज भी हो सकता है। इससे भी शिशु में मिर्गी की समस्या हो सकती है। गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक दवाओं का सेवन भी शिशु के दिमाग के विकास को प्रभावित कर सकता है। यह जानकारी केजीएमयू के न्यूरोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. नीरज कुमार ने सोमवार को पर्पल डे : इंटरनेशनल एपिलेप्सी अवेयरनेस डे की पूर्व संध्या पर दी। उन्होंने बताया कि गर्भवती को गर्भावस्था की शुरुआत से बेहतर खानपान के साथ नियमित रूप से जांच और संस्थागत प्रसव ही कराना चाहिए।

केजीएमयू के न्यूरो सर्जरी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अवधेश यादव ने बताया कि गर्भावस्था में शिशु के ब्रेन के विकास के लिए विटामिंस, आयरन और फॉलिक एसिड का बड़ा महत्व होता है। ऐसे में गर्भवती को इस दौरान अपने खानपान में अधिक से अधिक पौष्टिक आहार लेने चाहिए, साथ ही अस्पताल जाकर नियमित एएनसी चेकअप व विशेषज्ञ की सलाह लेते रहना चाहिए। गर्भावस्था में वायरल व बैक्टीरियल किसी भी तरह के संक्रमण का असर सीधे शिशु के दिमाग पर पड़ता है। इससे उसे एपिलेप्सी व सीजर्स की समस्या हो सकती है। अगर गर्भवती नियमित रूप से अस्पताल जाती रहती है तो उसे इन संक्रमणों से बचाया जा सकता है।

गर्भनिरोधक गोलियां भी नहीं हैं सुरक्षित
डॉ. नीरज कुमार ने बताया कि गर्भनिरोधक गोलियां भी मिर्गी के रिस्क फैक्टर में आती हैं। ऐसी महिलाएं जो शराब का सेवन या स्मोकिंग करती हैं या वो महिलाएं जो मोटापे से पीड़ित हैं, वो अगर गर्भनिरोधक गोलियां खाती हैं तो उनमें ब्लड क्लॉटिंग हो सकती है, जिससे एपिलेप्सी की आशंका बढ़ जाती है। डॉ. अवधेश यादव ने बताया कि ऐसी महिलाएं जिन्हें पहले से ही मिर्गी की समस्या है, अगर वे गर्भनिरोधक गोलियां खाती हैं तो उन्हें ज्यादा दौरे पड़ने लगते हैं। डॉ. नीरज ने बताया कि कभी-कभी ज्यादा स्ट्रेस लेने से भी दौरे आने लगते हैं।

अच्छी तरह धोकर खाएं सब्जियां
डॉ. नीरज कुमार ने बताया कि नवजात को मिर्गी की समस्या गर्भावस्था में बरती जाने वाली लापरवाही या ब्रेन का विकास न होने से होती है, किशोर या युवावस्था में शराब के सेवन, हेड इंजरी से भी यह समस्या हो जाती है। वृद्धावस्था में ब्लड प्रेशर या शुगर की दवाओं से भी कभी सोडियम की मात्रा कम या ज्यादा होने से यह बीमारी हो जाती है। प्रदेश में यह बीमारी सबसे ज्यादा है और आम हो गई है। इसका कारण न्यूरा ेसिस्टिसरकोसिस है। यह बीमारी सुअर के पैरासिटिक अंडों के कारण होती है। अगर साग-सब्जी की सिंचाई गंदे पानी से की गई हो जहां सुअर रहे हों तो उसके पैरासिटिक एग सब्जियों में चिपक जाते हैं। ऐसी साग सब्जियों के सेवन से भी मिर्गी के दौरे आ सकते हैं।

जूता सुंघाने से नहीं आता है होश
डॉ. नीरज कुमार ने बताया कि जूता सुंघाने से मिर्गी का दौरे पर कोई असर नहीं होता। जूते सुंघाने से होश आ जाना महज भ्रम है। असल में मिर्गी के दौरे की अवधि 20 सेकेंड से एक मिनट तक हो सकती है। इस अवधि के बाद मरीज को खुद होश आ जाता है। कभी-कभी न्यूरोलॉजिकल इमरजेंसी की स्थिति में मरीज पांच मिनट तक भी बेहोश रह सकता है लेकिन यह समस्या महज 5 प्रतिशत मरीजों में ही देखी जाती है।

इन बातों का रखें खयाल-
- गर्भावस्था में पौष्टिक आहार खाएं
- संस्थागत प्रसव कराएं
- गर्भावस्था के दौरान किसी भी तरह के संक्रमण से बचें
- शराब व सिगरेट का सेवन न करें
- मोटापा है तो गर्भनिरोधक गोलियां डॉक्टरी सलाह से ही लें
- मिर्गी के मरीज नियमित रूप से दवाओं का सेवन करें
- बीच में दवा कताई न छोड़ें
- मिर्गी के मरीज तनाव, देर रात तक जागने, अधिक टीवी देखने व तेज लाइटों से बचें
- अधिक समय तक भूखे न रहें

अधिक सेहत/एजुकेशन की खबरें