CBI vs CBI: वर्मा के वकील बोले- ये बिल्लियों की लड़ाई नहीं थी, अस्थाना पर थे आरोप
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केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई में दो शीर्ष अधिकारियों आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच छिड़ी जंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को भी सुनवाई हुई. मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि इस मामले में सरकार इस मामले में निष्‍पक्ष क्‍यों नहीं है? सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से सवाल किया कि वर्मा को हटाने से पहले सिलेक्शन कमिटी से सलाह लेने में आखिर बुराई क्या थी? उन्हें रातोंरात क्यों हटा दिया गया?

आलोक वर्मा की ओर से वकील नरीमन फली ने सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि सीबीआई में एक निदेशक के रहते हुए कार्यकारी निदेशक नहीं हो सकते. जैसे एक प्रधान न्यायाधीश के होते हुए दूसरे कार्यकारी प्रधान न्यायाधीश की नियुक्ति नहीं हो सकती, उसी तरह सीबीआई में ऐसा कोई नियम नहीं है. फली नरीमन ने कहा कि 15 अक्टूबर को अस्थाना के खिलाफ FIR दर्ज की गई. ये कोई बिल्ली वाली लड़ाई नहीं है.

इस मामले की सुनवाई प्रधान न्यायाधीश (CJI) रंजन गोगोई की बेंच कर रही है. सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कहा, 'सीबीआई के दो वरिष्ठ अधिकारियों के बीच लड़ाई एक रात में शुरू नहीं हुई. ऐसे में सरकार ने चयन समिति से परामर्श लिए बिना कैसे सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा को उनकी शक्तियों से वंचित कर दिया?'

बुधवार को केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल के. वेणुगोपाल ने सीजेआई गोगोई, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस केएम जोसफ की बेंच में अपनी बहस जारी रखते हुए कहा कि इन अधिकारियों के झगड़े से जांच एजेंसी की छवि और प्रतिष्ठा प्रभावित हो रही थी. अटॉर्नी जनरल ने कहा कि केंद्र का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि जनता में इस प्रतिष्ठित संस्थान के प्रति भरोसा बना रहे.

कोर्ट ने 29 नवंबर को कहा था कि वह पहले इस सवाल पर विचार करेगा कि क्या सरकार को किसी भी परिस्थिति में जांच ब्यूरो के निदेशक को उसके अधिकारों से वंचित करने का अधिकार है; या उसे निदेशक के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों में कोई कार्रवाई करने से पहले प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति के पास जाना चाहिए था.

कोर्ट ने इससे पहले यह स्पष्ट कर दिया था कि वह जांच एजेंसी के दोनों शीर्ष अधिकारियों से संबंधित आरोपों और प्रत्यारोपों पर गौर नहीं करेगा.


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