नोटबंदी, जीएसटी, कच्चे तेल के बढ़ते दाम का असर, पांच बड़े सेठों को 1.02 लाख करोड़ की चपत
इन पांचों बड़े सेठों की कई कम्पनियों के शेयर 5 माह से नीचे आने के कारण इन्हें लगभग 1.02 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है।


नई दिल्ली : बीते 05 माह से शेयर बाजार में अच्छे दिन गायब होकर लुढ़कते जाने के कारण देश के जिन 05 बड़े सेठों/उद्योगपतियों को धंधे में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है, उनमें से 3 गुजराती सेठ हैं। ये हैं गौतम अडानी, मुकेश अंबानी और दिलीप सांघवी। बाकी दो सेठ हैं अजीम प्रेमजी व कुमार मंगलम बिड़ला। इन पांचों बड़े सेठों की कई कम्पनियों के शेयर 5 माह से नीचे आने के कारण इन्हें लगभग 1.02 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। इसी तरह से देश के अन्य तमाम उद्योगपतियों को भी नुकसान हुआ है। ब्लूमवर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के 20 बड़े उद्योगपतियों को बीते पांच माह में कुल 1.22 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। 

सबसे अधिक नुकसान गौतम अडानी की स्वामित्व वाली कम्पनियों को 25,154 करोड़ रुपये हुआ है। मालूम हो कि 2014 में केन्द्र में नई सरकार बनने के बाद सबसे अधिक अच्छे दिन इनकी ही कम्पनियों के आये थे। सबसे अधिक मालामाल इनकी ही कम्पनियां हुई थीं| 02 साल में इनके शेयर के दाम जेट की गति से ऊपर उठे थे। पिछले 05 माह में इनकी कम्पनियों के शेयर के दाम 07 से लेकर 45 प्रतिशत तक नीचे आ गए हैं। इसके बाद एक अन्य गुजराती उद्योगपति दिलीप संघाणी को 23,787 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। गुजराती मुकेश अंबानी को इस दौरान 19 ,344 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। अजीम प्रेमजी को 22, 010 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। कुमार मंगलम बिड़ला को 15,311 करोड़ रुपये की चपत लगी है। 

शेयर बाजार के बड़े दलालों को डर है कि बाजार और नीचे जाएगा। क्योंकि, अन्तरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का दाम तीन वर्ष में सबसे अधिक हो गया है। उसके बढ़ते जाने, 110 डालर प्रति बैरल तक पहुंचने की संभावना है। भारत में जो अकस्मात नोटबंदी की घोषणा की गई उसका असली असर अब दिखने लगा है। रही-सही कसर बिना पूरी तैयारी के जल्दी बाजी में लागू की गई नोटबंदी ने पूरी कर दी है। धंधा साहबाई व नौकरशाही के चंगुल में पीसकर बहुत मंदा हो गया है।राजनीतिक हालात भी बदलने की संभावना लगने लगी है। सो, विदेशी निवेशक अपनी रकम निकालने लगे हैं। इसके चलते शेयर बाजार धीरे-धीरे नीचे की तरफ लुढ़कने लगा है। इससे 5 माह में ही देश के बड़े-बड़े सेठों के अच्छे दिन के सपने टूटने लगे हैं। धुकधुकी बढ़ती जा रही है। संभलने की कोशिश भी सफल नहीं हो पा रही है। 


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